असंगठित कामगारों के लिए सरकार की नई पहल | भारत | DW | 26.08.2021
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भारत

असंगठित कामगारों के लिए सरकार की नई पहल

देश के करोड़ों असंगठित कामगारों के पंजीकरण के लिए केंद्र सरकार ने एक नई व्यवस्था शुरू की है. देखना होगा कि ई-श्रम पोर्टल से वाकई असंगठित कामगारों को सामाजिक सुरक्षा मिल पाती है या नहीं.

सरकार ने असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों का एक डेटाबेस बनाया है. ई-श्रम नाम के इस डेटाबेस की शुरुआत केंद्रीय श्रम मंत्री भूपेंदर यादव ने की. इसके जरिए असंगठित क्षेत्र के 38 करोड़ श्रमिकों का पंजीकरण कराना सरकार का लक्ष्य है. इनमें निर्माण क्षेत्र के मजदूर, प्रवासी मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले और घरों में काम करने वाले और अन्य श्रमिक शामिल हैं.

इस डेटाबेस में शामिल किए जाने वाले श्रमिकों को 12 अंकों का एक यूनीक नंबर दिया जाएगा. उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में इसी नंबर के जरिए उन्हें सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ा जाएगा. पंजीकरण तो आज ही से शुरू हो गया लेकिन इस डेटाबेस के इस्तेमाल के बारे में सरकार ने अभी विस्तृत जानकारी नहीं दी है.

90 प्रतिशत कामगार असंगठित

जानकारों का अनुमान है कि भारत में कम से कम 80 प्रतिशत कामगार असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं. संगठित क्षेत्रों में भी कई अनियमित श्रमिक काम करते हैं. उनकी संख्या भी अगर जोड़ दी जाए तो देश में कुल असंगठित कामगारों की तादात 90 प्रतिशत या करीब 45 करोड़ तक पहुंच जाती है.

असंगठित होने की वजह से इन्हें नियमित रोजगार, जायज वेतन, इलाज का खर्च, बीमा और भविष्य निधि जैसी सुविधाएं नहीं मिल पातीं. साथ ही आर्थिक आंकड़े इकट्ठे करने में इनकी गिनती नहीं हो पाती जिसकी वजह से आंकड़े भी असली तस्वीर को दिखा नहीं पाते हैं.

अगर वाकई इस तरह का डेटाबेस बनता है और इसमें असंगठित कामगारों का पंजीकरण होता है तो यह कदम सही दिशा में होगा. हालांकि बात सिर्फ पंजीकरण तक सीमित नहीं है. कई और सवालों पर काम करना होगा.

क्या मिल पाएंगे अधिकार?

नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर एम्प्लॉयमेंट स्टडीज के निदेशक रवि श्रीवास्तव कहते हैं कि अभी यह देखना होगा कि इस पोर्टल पर पंजीकृत होने वाले कामगारों के विशेष कार्ड को आधार के साथ जोड़ा जाएगा या नहीं. उन्होंने यह भी बताया कि पंजीकरण के पीछे ऐसे व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें सभी कामगारों को अधिकार और सुविधाएं मिल पाएं.

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महामारी के दौरान अपने गांव वापस जाने के लिए ट्रेन का इंतजार करते प्रवासी श्रमिक

मुख्य रूप से प्रवासी श्रमिक योजनाओं और सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं, क्योंकि वो जहां से निकल जाते वहां तो उन्हें वो सुविधाएं नहीं ही मिलतीं, जहां जाकर वो काम कर रहे होते हैं वहां भी उन्हें उन सुविधाओं के बिना ही रहना पड़ता है.

रवि श्रीवास्तव ने यह भी बताया कि अगर यह नई व्यवस्था नई श्रम संहिताओं या लेबर कोड के अनुकूल बनेगी तो कॉन्ट्रैक्ट वर्कर, कैजुअल वर्कर आदि जैसे कई श्रमिक इससे बाहर हो जाएंगे. बहरहाल, अभी यह पहल शुरूआती चरण में ही है. आने वाले दिनों में जब इससे संबंधित और जानकारी सामने आएगी तो इसका बेहतर मूल्यांकन संभव हो पाएगा.

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