अवैध हथियारों की वजह से कई राज्यों का सिरदर्द है बिहार का यह जिला | भारत | DW | 09.04.2021
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भारत

अवैध हथियारों की वजह से कई राज्यों का सिरदर्द है बिहार का यह जिला

अवैध हथियारों के लिए चर्चित बिहार का मुंगेर जिला देश के कई राज्यों की पुलिस के लिए सिरदर्द बन गया है. यहां अवैध असलहों के कारीगर इतने निपुण हैं कि जब कहीं भी चुनाव की बात चलती है तो मुंगेर का नाम चर्चा में आ जाता है.

बिहार की राजधानी पटना से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर गंगा नदी के किनारे स्थित है मुंगेर. इस शहर से हथियारों का निर्माण तब जुड़ा जब बंगाल के नवाब मीर कासिम ने मुर्शिदाबाद से हटाकर मुंगेर को अपनी राजधानी बनाया तथा अंग्रेजों का मुकाबला करने के लिए यहां चारों तरफ से करीब 30 फीट गड्ढे से घिरे किले का निर्माण किया एवं तोपखाना व बंदूक फैक्ट्री की स्थापना की. कहा जाता है कि उसके सेनापति गुरगीन खान ने अफगानी कारीगरों से बंदूक निर्माण शुरू करवाया. पाकिस्तान व अफगानिस्तान सीमा क्षेत्र से वह ऐसे कई कारीगरों को अपने साथ यहां ले आया था. इन कारीगरों ने यहां के स्थानीय लोगों को भी प्रशिक्षित किया. बाद में अंग्रेजों ने भी यहां अपने लिए हथियार बनवाए. बाद के दिनों में कई घराने हथियारों का निर्माण करने लगे.

अवैध असलहों का बड़ा बाजार बना मुंगेर

1952 में जब आर्म्स एक्ट कानून लाया गया तो सभी हथियार निर्माताओं को एक छत के नीचे लाया गया. मीर कासिम के समय वाले जेल के अंदर इन्हें जगह दी गई. बीस साल बाद 1972 में बिहार सरकार ने इसे लघु उद्योग का दर्जा दिया तब योगाश्रम के पास करीब दस एकड़ जमीन में ऐसी करीब 36 निर्माण इकाइयों को पुनर्स्थापित किया. कालांतर में बंदूक फैक्ट्रियां बदहाली के कगार पर पहुंच गईं और कारीगरों को काम मिलना बंद हो गया. निर्माण का हिस्सा वैध व अवैध में बंट गया. आज का मुंगेर अवैध हथियारों की असेम्बलिंग व फिनिशिंग के लिए जाना जाता है. असलहों के पार्ट गंगा नदी या अन्य प्रयोजनों से तस्करी कर यहां लाए जाते हैं और फिर पिस्टल से लेकर एके-47 तक तैयार कर उसकी सप्लाई की जाती है. मुंगेर अवैध असलहों का देखते ही देखते बड़ा बाजार बन गया. कहा जाता है कि इन अवैध हथियारों का सालाना टर्न ओवर करोड़ों में है. कहा जाता है कि देशभर के अपराधी सस्ते हथियारों के लिए मुंगेर के तस्करों से संपर्क करते हैं. यही वजह रहा कि इस जिले के कई हिस्सों में अवैध हथियार का निर्माण कुटीर उद्योग के रूप में पनपने लगा.

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अवैध हथियारों का गढ़

जानकार बताते हैं कि समय के साथ-साथ मुंगेर शहर के पास के बरदह, पूरबसराय, श्यामपुर तथा कासिम बाजार थाना क्षेत्र के कई गांवों समेत आसपास के कुछ इलाकों में अवैध हथियार का निर्माण होने लगा. मुफस्सिल थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला बरदह गांव कभी पापड़-तिलौड़ी बनाने के लिए मशहूर था. कहा जाता है कि इस गांव में अस्सी के दशक में देसी कट्टे का निर्माण सबसे पहले शुरू हुआ था जो बाद में कारबाइन तक पहुंच गया. कम लागत में अधिक मुनाफे की लालच ने काफी संख्या में लोगों को इस अवैध कारोबार में आकर्षित किया. हालांकि पुलिस द्वारा लगातार चलाए गए अभियानों से त्रस्त हो हथियार तस्करों ने अपना ठिकाना मालदा-कोलकाता (पश्चिम बंगाल), उत्तर प्रदेश, झारखंड व मुंगेर के सीमावर्ती इलाके खगड़िया, बेगूसराय, भागलपुर व सहरसा जैसे इलाके में बना लिया.

इन इलाकों में छापेमारी के दौरान जिन फैक्ट्रियों का पर्दाफाश किया गया और वहां से जिन लोगों को पकड़ा गया वे मुंगेर से वहां हथियार बनाने के लिए लाए गए थे. अब इन जगहों से अर्द्धनिर्मित आग्नेयास्त्र फिनिशिंग व बिक्री के लिए मुंगेर लाए जाते हैं. पुलिस सूत्रों का कहना है कि मुंगेर चूंकि हथियारों की मंडी के रूप में कुख्यात हो चुका है, इसलिए इसके सौदागर सीधे यहां के एजेंटों से संपर्क करते हैं. असलहों के निर्माण से जुड़े लोगों ने काफी संख्या में इलाके के लोगों को जोड़ा और उनसे बतौर कैरियर काम लिया. जब भी कार्रवाई होती है तो पुलिस इन्हीं कैरियर एजेंटों को पकड़ पाती है, असली गुनहगार पकड़ से दूर रहते हैं. इनका नेटवर्क तोड़ पाने में पुलिस की विफलता की यह एक बड़ी वजह मानी जाती है. पुलिस रिकॉर्ड इस बात की पुष्टि करती है कि कई मामलों में जिन जिलों में लोग पकड़े गए हैं, वे या तो दूसरे जिलों या फिर अन्य राज्यों के निवासी हैं जो हथियारों की खरीद-फरोख्त के सिलसिले में वहां पहुंचे थे.

आतंकी-नक्सली भी हैं खरीददार

जांच एजेंसियों व पुलिस की कई कार्रवाइयों से भी यह साफ हुआ है कि अवैध असलहों के इन सौदागरों के तार आतंकियों व नक्सलियों से भी जुड़े हैं. मुंबई पुलिस द्वारा 2007 में पकड़े वंशराज नामक शख्स ने स्वीकार किया था कि मुंगेर से अवैध हथियार खरीदकर उसने दाउद एंड कंपनी को सप्लाई किया था. जांच के क्रम में यह भी खुलासा हुआ कि इसी कड़ी में मुंगेर के एक व्यक्ति के खाते में कई लाख रुपये भेजे गए थे जिसे बाद में मुंबई पुलिस ने मुंगेर से गिरफ्तार किया. इसी साल जाली नोटों के रैकेट की पड़ताल करते हुए एनआइए मुंगेर पहुंची थी. एजेंसी को इनपुट मिला था कि कश्मीर निवासी आतंकी फैयाज अहमद मुंगेर में जाली नोट खपाने व हथियारों की तस्करी का नेटवर्क तैयार कर रहा था. इसी तरह 2016 में ढाका की एक बेकरी में हुए आतंकी हमले में भी जांच के क्रम में यह बात सामने आई थी कि विस्फोट के लिए जिम्मेदार संगठन जमात उल मुजाहिदीन द्वारा प्रयुक्त रायफल की खरीद भी मुंगेर से की गई थी. अवैध हथियारों के इन तस्करों के तार जबलपुर आर्डिनेंस फैक्ट्री से एके-47 व इंसास जैसे रायफलों की तस्करी में भी सामने आए थे. अगस्त, 2018 में मुंगेर के जमालपुर से तीन एके-47 की बरामदगी के बाद कार्रवाई के क्रम में पुलिस ने बीस से ज्यादा एके-47 रायफल की बरामदगी की थी. 

राज्य के सीमांचल व मिथिलांचल पहले से ही आतंकियों के सेफ जोन रहे हैं और पिस्टल जैसे छोटे हथियारों के संदर्भ में इन इलाकों की मुंगेर से संपर्कता किसी से छुपी नहीं है. ठीक इसी तरह बिहार एसटीएफ (स्पेशल टास्क फोर्स) व पुलिस द्वारा की गई छापेमारियों में मुंगेर जिले में पकड़ी गई कई अवैध गन फैक्ट्रियों का उद्भेदन हुआ जिसमें नक्सलियों के असलहे बनाए जाने की बात सामने आई. इस बात की ताकीद इससे भी होती है जब बीते फरवरी माह में मुंगेर जिले के पहाड़ी इलाके में घने जंगल के बीच ऋषिकुंड भेलवा में एसटीएफ व स्थानीय पुलिस ने छापेमारी की तो कई संदिग्ध नक्सली पूर्ण रुप से तैयार किए गए हथियार लेकर भागने में सफल रहे थे. इस दौरान मौके से पकड़े गए अखिलेश सिंह नामक शख्स ने खुलासा किया था कि वहां नक्सलियों की देखरेख में हथियार का निर्माण किया जा रहा था.

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कट्टे से लेकर एके तक

इस जिले के कई थानों में थानेदारी कर चुके एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी कहते हैं, "नेता-अपराधी व पुलिस गठजोड़ के बूते यह धंधा निर्बाध गति से जारी है. सबको सब कुछ पता है. जो लोग पकड़े जाते हैं वे तो केवल माल पहुंचाने या बनाने वाले होते हैं. वे भी अधिकतर मामलों में जमानत पर छूट कर बाहर आने के बाद फिर से इस काम में जुट जाते हैं. हालांकि हाल के दिनों में परिस्थितियां बदलीं हैं. कारीगरों के हुनर का अगर सही इस्तेमाल किया जाए तो इस पर तेजी से लगाम लगाया जा सकेगा." वहीं मुंगेर के पूर्व डीआइजी मनु महाराज कहते हैं, "अब इसमें काफी कमी आई है. पहले बड़ी-बड़ी लेथ मशीनें चलतीं थीं. गांवों में कुछ लोग उसी चीज में इंवॉल्वड थे, कुछ का पुश्तैनी धंधा ही था और फिर बेरोजगारी के कारण भी कुछ लोग इसमें आ गए. पश्चिम बंगाल से कुछ तस्करों का लिंक है, जो कुछ गठजोड़ के टूटने के साथ ही ध्वस्त हो जाएगा."

तस्वीर बदलने की कोशिश

बीते दिनों बंदूक कारखाना निर्माता संघ ने प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत शूटिंग (स्पोर्ट्स) में इस्तेमाल आने वाले एयर पिस्टल व एयर रायफल बनाने का प्रस्ताव दिया है ताकि कारीगरों को काम मिल सके और इस उद्योग को मंदी से उबारा जा सके. संघ का मानना है कि विदेशों से आने वाले स्पोर्ट्स शूटिंग रायफल या अन्य स्पोर्ट वीपेन्स काफी मंहगे होते हैं. यहां के कारीगर अगर उसे बनाते हैं तो वह सस्ती होगी. इससे भी बड़ी बात यह होगी कि वे घातक अवैध हथियारों का निर्माण छोड़ अपने हुनर का बेहतर उपयोग कर सकेंगे. इस आशय का प्रस्ताव संघ के संयुक्त सचिव संदीप शर्मा ने भाजपा विधायक प्रणव कुमार को सौंपा है. उन्होंने कहा ये कारीगर रक्षा क्षेत्र से जुड़े छोटे-छोटे पार्ट-पुर्जे भी बना सकते हैं. इस दिशा में अगर ठोस प्रयास किया गया तो इससे काफी संख्या में लोगों को रोजगार मिल सकेगा और मुंगेर के चेहरे से बदनुमा दाग भी हट जाएगा. हालांकि यहां सिंगल व डबल बैरल वाली बंदूक के अलावा पाइप गन का निर्माण शुरू होने से कुछ संजीवनी मिली है. वैसे अभी यह शुरुआती दौर में ही है. 

यहां के कारीगर इतने हुनरमंद हैं कि वे इस क्षेत्र से जुड़े किसी काम को बखूबी अंजाम दे सकते हैं. कभी 36 बंदूक निर्माण इकाइयां मुंगेर में लाइसेंसी हथियार बनाती थीं, जिनमें अब केवल दस ही कार्यरत हैं. किंतु वे भी बंदी के कगार पर हैं. अगर ये यूनिटें भी बंद हो गईं तो पेट पालने की मजबूरी में इनके कारीगर भी तस्करों के चंगुल में पड़कर अवैध निर्माण की ओर ही अग्रसर होंगे. इधर कई इकाइयों ने सेमी ऑटोमेटिक रिवॉल्वर व पिस्टल जैसे छोटे अत्याधुनिक हथियार बनाने के लिए भारत सरकार से अनुमति मांगी है. गृह मंत्रालय से लाइसेंस मिलते ही निर्माण शुरू होगा तथा कारीगरों के लिए रोजगार सृजन हो सकेगा.

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