अरुण जेटली के राजनीतिक सफर की पूरी कहानी | भारत | DW | 24.08.2019
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भारत

अरुण जेटली के राजनीतिक सफर की पूरी कहानी

जेटली खुद बीजेपी की राजनीति करते थे लेकिन उनकी पत्नी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता की बेटी हैं. जेटली को बीजेपी के बुद्धिजीवियों में से माना जाता था.

अरुण जेटली की कहानी पाकिस्तान से भारत में आकर बसे एक परिवार से शुरू होती है. लेकिन उन्होंने अपने दम पर राजनीति में बड़े मुकाम हासिल किए. उनके जितने दोस्त अपनी पार्टी में थे उतने ही दूसरी पार्टियों और मीडिया में भी हुआ करते थे.

2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार को पिछली बार से भी ज्यादा बड़ा बहुमत मिला था. 303 सांसदों वाली बीजेपी के नेता नरेंद्र मोदी अपने मंत्रीमंडल गठन की तैयारियों में लगे हुए थे. उनका सहयोग कर रहे थे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह. मीडिया कयास लगा रहा था कि किसे मोदी अपने कैबिनेट में शामिल करेंगे और किसे नहीं. इसी बीच मीडिया में एक पत्र आता है जिसे मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सबसे ताकतवर मंत्री रहे अरुण जेटली ने लिखा था. उन्होंने पीएम मोदी से गुजारिश की थी कि स्वास्थ्य कारणों के चलते वे मोदी सरकार में शामिल नहीं होना चाहते. यह नरेंद्र मोदी के लिए निजी तौर पर बड़ा नुकसान था क्योंकि रफाल से लेकर ओआरओपी तक या अर्थव्यवस्था की गिरावट के सवाल पर अरुण जेटली ढाल बनकर खड़े हो जाते थे. लेकिन इससे बड़ी क्षति 24 अगस्त को हुई जब अरुण जेटली का दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया.

पाकिस्तान से आया था परिवार

अरुण जेटली का परिवार विभाजन के बाद पाकिस्तान से आया था. उनके पिता महाराज किशन जेटली वकील हुआ करते थे. 28 दिसंबर 1952 को दिल्ली में अरुण जेटली का जन्म हुआ. जेटली ने स्कूली पढ़ाई दिल्ली के सिविल लाइंस में स्थित सेंट जेवियर स्कूल से की थी. जेटली स्कूली पढ़ाई में औसत छात्र थे लेकिन भाषण देने में कुशल थे. जेटली के स्कूली दोस्तों के मुताबिक स्कूल में इंजिनियर बनने का इरादा रखते थे लेकिन बड़े होकर इरादा बदल गया. उन्होंने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में दाखिला लिया. यहां वे कॉलेज डिबेटिंग टीम के कप्तान बन गए जिसने कई गोल्ड मेडल जीते थे.

सत्तर के दशक में जेटली का राजनीति में पर्दापण हुआ. देश में इंदिरा गांधी की सरकार थी. सरकार के खिलाफ गुजरात से शुरू हुआ छात्र आंदोलन देशभर में फैल गया. कॉलेज के शुरुआती दिनों में जेटली का रुझान वामपंथ की तरफ था. लेकिन 1971 में आरएसएस की छात्र इकाई एबीवीपी के नेता श्रीराम खन्ना से मिलने के बाद एबीवीपी से जुड़ गए. 1972 में जब खन्ना दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के अध्यक्ष बन गए तो जेटली कॉलेज यूनियन के अध्यक्ष बने. 1973 में जेटली ने पिता और चाचा की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए दिल्ली विश्विद्यालय में वकालत की पढ़ाई शुरू की.

जेटली नेतागिरी के लिए प्रतिभाशाली थे क्योंकि भाषण देना अच्छे से जानते थे और पढ़ाई-लिखाई करने के चलते राजनीतिक समझ अच्छी थी. 1973 में जेटली को उम्मीद थी कि उन्हें दिल्ली विश्विद्यालय छात्रसंघ का चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और एबीवीपी ने आलोक कुमार को मौका दे दिया. जेटली इसके बाद कुछ दिन के लिए कोपभवन में चले गए. कांग्रेस की विद्यार्थी इकाई एनएसयूआई के नेताओं ने इस नाराजगी को भांप कर जेटली को अपनी ओर करने की कोशिश की. 1974 का चुनाव आते-आते जेटली ने यूनिवर्सिटी में इतनी पकड़ बना ली थी कि वे किसी भी पार्टी से लड़कर जीत सकते थे. असमंजस यह था कि वे एनएसयूआई से लड़ेंगे या एबीवीपी से. आखिर एबीवीपी ने उन्हें टिकट दिया और वे चुनाव जीत गए.

जेटली इंदिरा गांधी के खिलाफ शुरू हुए जेपी आंदोलन से जुड़ गए. उन्हें जेपी आंदोलन के दौरान बनी कमिटी फॉर यूथ एंड स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन का संयोजक बनाया गया. वे अब एबीवीपी की सक्रिय राजनीति का चेहरा बन चुके थे. 26 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा के बाद पुलिस बाकी विपक्षी नेताओं की तरह जेटली की तलाश करते उनके घर पहुंची. जेटली के पिता वकील थे. घर पर पुलिस से वे कानूनी बहस करने लगे, इतने में जेटली वहां से निकल गए. अगले दिन जेटली ने करीब 200 लोगों को इकट्ठा किया और गिरफ्तारी दी. आपातकाल की वजह से सारे विरोध प्रदर्शन बंद थे. ऐसे में 200 लोगों के साथ गिरफ्तारी को काफी सुर्खियां मिलीं. वे करीब 19 महीने तक अंबाला और तिहाड़ जेल में रहे.

वकालत पढ़ कर आये राजनीति में छाये...

जेल जाने के बाद बदल गई किस्मत

आपातकाल के दौरान लगभग सारे विपक्षी नेता सलाखों के पीछे थे. इन्हीं सलाखों के पीछे नौजवान जेटली की मुलाकात कई सारे बड़े नेताओं से हुई. इन नेताओं में अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और संघ के बड़े नेता नानाजी देशमुख भी शामिल थे. जनवरी 1977 में जेटली जेल से रिहा हुए. इतने नेताओं से जान पहचान और जेल में समय गुजारना जेटली के करियर को नई ऊंचाइयों पर ले गया और उन्हें एबीवीपी का राष्ट्रीय सचिव बना दिया गया. मार्च 1977 में उन्हें नई बनी जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल कर लिया गया. जनता पार्टी आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी बनी. 1979 में उन्होंने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गिरधारी लाल डोगरा की बेटी संगीता से शादी की. तब तक जेटली राजनीति में खुद को स्थापित कर चुके थे. इस शादी में वाजपेयी, आडवाणी और इंदिरा गांधी ने भी शिरकत की थी.

1980 में कांग्रेस ने फिर सत्ता में वापसी की. जेटली ने वकालत पर ध्यान लगाना शुरू कर दिया. वे राम जेठमलानी के सहायक बन गए और बीजेपी  से जुड़े नेताओं के मुकदमे लड़ने लगे. जेटली वकील के रूप में खुद को साबित कर रहे थे. 1984-85 के चुनाव में हार के बाद बीजेपी ने अगली पीढ़ी के नेताओं की ओर भी देखना शुरू किया जिनमें प्रमोद महाजन और अरुण जेटली शामिल थे. जेटली की बीजेपी और दूसरी विपक्षी पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व से अच्छी दोस्ती होने लगी थी. 1989 में अरुण जेटली वीपी सिंह के प्रचार अभियान में काफी सक्रिय रहे. वीपी सिंह के प्रचार अभियान का जिम्मा जेटली के पास था.

वीपी सिंह की सरकार बनी तो जेटली को भी इनाम मिला. महज 37 साल की उम्र में उन्हें अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बना दिया गया. जनवरी 1990 में बोफोर्स घोटाले की जांच के लिए वीपी सिंह ने एक जांच दल का गठन किया जो बोफोर्स घोटाले की जांच के लिए स्वीडन और स्विट्जरलैंड गया. इस दल में सीबीआई और दूसरी एजेंसियों के अधिकारियों के अलावा जेटली भी शामिल थे. हालांकि यह जांच दल कोई पुख्ता सबूत नहीं ला सका लेकिन जेटली मीडिया में इस जांच दल का हिस्सा होने के चलते छा गए थे. जेटली का कद एक वकील के रूप में बड़ा होने लगा था. बीजेपी के साथ-साथ दूसरी पार्टियों के नेताओं से भी उनके अच्छे संबंध बन गए थे.

जब लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी रथयात्रा शुरू की तो उसके लिए प्रेस मैनेजमेंट का काम जेटली देखा करते थे. प्रेस के लोगों से जेटली के बड़े अच्छे संबंध माने जाते थे जो उनके निधन तक कायम रहे. वीपी सिंह की सरकार गिरने के छह महीने बाद उन्होंने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के पद से इस्तीफा दे दिया. 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद कुछ दिनों के लिए जेटली ने बीजेपी  से किनारा कर लिया था. वे पार्टी में बने रहे लेकिन सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे पर पार्टी का बचाव नहीं करते थे. लेकिन इसी मामले में अदालत के अंदर वे आडवाणी के वकील थे और उन्होंने अच्छी तरह आडवाणी का बचाव किया. यहां से वे आडवाणी के और प्रिय हो गए थे. उन्हें बीजेपी का महासचिव बना दिया गया था.

1999 के आम चुनावों के दौरान जेटली को बीजेपी का प्रवक्ता बनाया गया. यह वह दौर था जब टीवी चैनलों में बहसों के कार्यक्रम नए नए शुरू हुए थे. जेटली मजबूती से अपनी पार्टी का पक्ष रखते थे. वे टीवी चैनलों के बीच लोकप्रिय थे. यही कारण था कि वाजपेयी ने अपनी सरकार में उन्हें सूचना प्रसारण राज्य मंत्री बना दिया था. 2000 में राम जेठमलानी के कानून मंत्री के पद से इस्तीफे के बाद उन्हें कानून मंत्री बना दिया गया. जेटली आडवाणी के करीबी थे लेकिन वाजपेयी के साथ रिश्तों में उतार चढ़ाव चलता रहता था. इसी वजह से वाजपेयी ने जुलाई 2002 में उन्हें कानून मंत्री के पद से हटा दिया था. हालांकि सालभर बाद उनकी इस पद पर फिर वापसी हुई और वे सरकार के कार्यकाल पूरा होने तक मंत्री बने रहे. वे राज्यसभा से चुनकर आते थे. 2000 से 2018 तक वे गुजरात से राज्यसभा सांसद रहे. आखिरी कार्यकाल में 2018 में वे उत्तर प्रदेश से सांसद चुने गए थे.

विपक्ष में रहकर आगे बढ़ते रहे जेटली

अरुण जेटली उन नेताओं में से थे जो सभी पार्टी के नेताओं और पत्रकारों से अच्छे संबंध रखते थे. लेकिन उनके साथी नेता राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज के साथ अनबन की खबरें आती रहती थीं. जेटली पर उनके आलोचक आरोप लगाते थे कि मीडिया से अच्छे संबंधों के चलते वे अपने पत्रकार मित्रों से कहकर विरोधियों के खिलाफ खबरें प्लांट करवाते थे. लेकिन पार्टी में उनकी जिनसे दोस्ती थी उनका साथ वे मुश्किल में भी नहीं छोड़ते थे. ऐसे ही एक दोस्त थे नरेंद्र मोदी. गुजरात के सीएम बनने से पहले नरेंद्र मोदी बीजेपी के महासचिव और प्रवक्ता हुआ करते थे. मोदी और अरुण जेटली की दोस्ती दिल्ली के उन दिनों से ही परवान चढ़ी. 2002 में गुजरात दंगों के बाद जब वाजपेयी मोदी को पद से हटाना चाहते थे तब इसका विरोध करने वालों में आडवाणी के साथ जेटली भी शामिल थे.

2009 में जेटली राज्यसभा में नेता विपक्ष बने. जेटली बुद्धिजीवी नेता थे लेकिन जननेता नहीं थे. इसलिए वे लोकप्रियतावाद की राजनीति से दूर रहते थे. 2011 में अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान जेटली ने मनमोहन सिंह सरकार का बहुत सक्रिय विरोध किया. मनमोहन सिंह सरकार में हुए कथित घोटालों के चलते कई दिनों तक लगातार संसद ना चलने देने का श्रेय लेने में जेटली पीछे नहीं रहते थे. 2011 से नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की ओर बढ़ने की पृष्टभूमि तैयार होने लगी. यहां जेटली ने अच्छा संतुलन बनाया. जेटली के लिए एक तरफ आडवाणी थे और दूसरी तरफ मोदी. लेकिन भविष्य को देखते हुए तब उन्होंने मोदी का साथ दिया. जेटली दिल्ली में इतने बड़े नेता थे कि वे मीडिया से लेकर लोगों तक को मैनेज कर लेते थे. मोदी को एक ऐसे साथी की बेहद जरूरत थी.

2014 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली से मोदी का सबसे ज्यादा साथ अरुण जेटली ही दे रहे थे. मोदी उन्हें लोकसभा से लाना चाहते थे जिससे बड़ा पद देने में आसानी रहे. इसके लिए सुरक्षित सीट की तलाश थी. 2004 से लगातार सांसद बने आ रहे पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू का टिकट काटकर जेटली को अमृतसर भेजा गया. लेकिन कैप्टन अमरिंदर सिंह ने जेटली को हरा दिया. मोदी पर इस हार का कोई असर नहीं हुआ. उन्होंने अरुण जेटली को वित्त, कॉर्पोरेट अफेयर्स और रक्षा मंत्रालय का दायित्व सौंपा. वित्त और रक्षा जैसे दो महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया जाना जेटली की अहमियत को दिखाता था. नवंबर 2014 में रक्षा की जगह उन्हें वित्त के साथ सूचना प्रसारण मंत्री बना दिया गया.

नरेंद्र मोदी की सरकार पर जब भी किसी विवाद का साया आता तो जेटली उसे रोकने के लिए सबसे आगे खडे़ होते. नोटबंदी जैसे बड़े और अस्त व्यस्त कर देने वाले निर्णय के बाद जेटली ने लगाातर दो महीने तक मीडिया में सरकार का पक्ष रखा. अर्थव्यवस्था के सवाल पर जेटली लगातार मीडिया से मुखातिब होते रहते थे. 2018 से जब राफेल मुद्दे ने तूल पकड़ना शुरू किया तो रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से आगे अरुण जेटली खड़े होकर सारे आरोपों के जवाब देते थे. राजनीति अपनी गति से चल रही थी लेकिन जेटली का स्वास्थ्य उसी गति से गिरने लगा था.

वैसे भी जुलाई 2005 में हार्ट अटैक के बाद जेटली की बाईपास सर्जरी हो चुकी थी. इसके बाद मई 2018 में दिल्ली के एम्स अस्पताल में उनकी किडनी का ऑपरेशन हुआ. इस ऑपरेशन के बाद कुछ महीनों तक वे राजनीति से दूर रहे. वे कभी कभी ब्लॉग लिखकर विपक्ष के आरोपों का जवाब देते रहते. ठीक होने के बाद कुछ दिन उन्होंने राज्यसभा की कार्यवाही में भी हिस्सा लिया. लेकिन इस बीमारी के बाद एक दूसरी बीमारी उनका इंतजार कर रही थी जो जान लेकर ही पीछा छोड़ने वाली थी. जनवरी 2019 में उन्हें सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा डायग्नोस हुआ. यह एक तरह का कैंसर है. इलाज के लिए वे न्यूयॉर्क गए. लेकिन उनकी हालत बिगड़ती गई. वे दिल्ली वापस आ गए. राजनीति से दूर हो गए. जेटली जनवरी के बाद सार्वजनिक रूप से देखे भी नहीं गए. 9 अगस्त को उन्हें हालत ज्यादा बिगड़ने के बाद एम्स में भर्ती करवाया गया. 24 अगस्त को 12 बजकर 7 मिनट पर वहां अरुण जेटली की सांसे रुक गईं.

अरुण जेटली को उनके जाने के बाद एक तेज तर्रार राजनेता, एक काबिल वकील और एक दोस्त बनाने वाले इंसान के तौर पर याद किया जाएगा. वे संसद और मीडिया में जितना दूसरी पार्टी के नेताओं पर बरसते थे, शाम की पार्टियों में उन्हीं नेताओं के साथ अपनी दोस्ती के तराने बुनते थे. 7 अगस्त 2019 के सुषमा स्वराज और 24 अगस्त को अरुण जेटली का निधन बीजेपी के सेक्युलर नेताओं की जमात में एक बहुत बड़ा शून्य छोड़ गया है.

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