अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला टलने के मायने | दुनिया | DW | 30.10.2018
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दुनिया

अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला टलने के मायने

अयोध्या में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे की सुनवाई का इंतजार था लेकिन तीन जजों की खंडपीठ ने सोमवार को महज तीन मिनट की बहस के बाद इसे तीन महीने तक के लिए टाल दिया.

ऐसा माना जा रहा था कि शायद ये इस मामले की आखिरी चरण की सुनवाई हो और सुप्रीम कोर्ट जल्द कोई फैसला सुना दे. हालांकि ये विवाद ‘टाइटल सूट' यानी जमीन पर मालिकाना हक का है जिसे साल 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन पक्षों में बराबर-बराबर बांट दिया था. ये तीन पक्ष थे, निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड. सुप्रीम कोर्ट में इसी आदेश को चुनौती दी गई है.

सोमवार को सुनवाई की तिथि तीन महीने तक टालने संबंधी फैसले के बाद राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी महंत सत्येंद्र दास बेहद निराशा के साथ बोले, "सबने तो निराश किया ही था, अब सुप्रीम कोर्ट ने भी निराश कर दिया है. लगता है रामलला को अभी टेंट में ही रहना है, मंदिर निर्माण का कोई रास्ता नहीं निकलने वाला.”

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ ने की. पहले इस मामले की सुनवाई चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर की पीठ कर रही थी.

ये उम्मीद जताई जा रही थी कि लोकसभा चुनाव को नज़दीक आता देख इस मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जनवरी, 2019 से इस मामले में सुनवाई शुरू होगी लेकिन ये सुनवाई यही खंडपीठ करेगी या फिर नई पीठ गठित होगी, ये कुछ भी स्पष्ट नहीं है.

वहीं, इस मामले के टल जाने और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए राम मंदिर निर्माण को लेकर अध्यादेश लाने की मांग चौतरफा उठने लगी है. न सिर्फ तमाम हिन्दू संगठन बल्कि सरकार और भारतीय जनता पार्टी के भीतर से भी ये मांग काफी मुखर हो गई है. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत स्पष्ट तौर पर ये बात कह चुके हैं तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी परोक्ष रूप से इस तरह के संकेत दे चुके हैं.

दो दिन पहले अमित शाह ने केरल में कहा था, "सुप्रीम कोर्ट को लोगों के धार्मिक विश्वास पर आघात पहुंचाने और लागू नहीं हो सकने वाले फैसले नहीं देने चाहिए.” हालांकि उन्होंने ये बयान सबरीमाला मंदिर के संदर्भ में कहा था लेकिन जानकार इसे अयोध्या विवाद से जोड़कर भी देख रहे हैं. वहीं संतों के एक वर्ग ने जहां छह दिसंबर से अयोध्या में मंदिर निर्माण शुरू करने की घोषणा कर दी है तो विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठन लगातार इसके लिए सरकार पर दबाव बना रहे हैं.

जहां तक सरकार के सामने अध्यादेश लाने का सवाल है तो वो इतना आसान भी नहीं है. एक तो अब मौजूदा सरकार के सामने सिर्फ शीतकालीन सत्र का समय बचा है, दूसरे कानून बनाने के लिए राज्यसभा में अभी भी उसके पास पर्याप्त बहुमत नहीं है. हालांकि यहां एक ये भी सवाल अहम है कि इस मुद्दे पर क्या कांग्रेस पार्टी उसका विरोध करेगी? वो भी उस स्थिति में जबकि वो खुद ‘सॉफ्ट हिन्दुत्व' पर चलने की कोशिश कर रही है.

वहीं इस मामले को लेकर अयोध्या के लोगों में एक अलग तरह की नाराजगी और गुस्सा है. अयोध्या के तमाम लोगों से बातचीत करने पर ये पता चलता है कि मंदिर-मस्जिद विवाद पर जो कुछ भी देश भर में हलचल होती है यहां के लोगों को उसकी पीड़ा या दंश झेलना पड़ता है.

अयोध्या के स्थानीय युवा पत्रकार अभिषेक सावंत कहते हैं, "यहां तमाम लोग आते हैं, जुलूस निकालते हैं या फिर जब कभी कोर्ट इत्यादि को लेकर हलचल होती है तो मीडिया के साथ-साथ सुरक्षाकर्मी भी बड़ी संख्या में तैनात कर दिए जाते हैं. शहर की पूरी व्यवस्था एक तरह से बंद हो जाती है. लोग अपने ही घरों में कैद रहने को अभिशप्त होते हैं और बाजार में कई चीजों की कमी हो जाती है या फिर चीजें महंगी हो जाती हैं.”

कुछ लोगों का ये भी कहना है कि अयोध्या को लेकर कोर्ट में ये राजनीतिक स्तर पर क्या चल रहा है, यहां के लोगों को उसकी जानकारी भी नहीं होती और न ही लोगों की कोई दिलचस्पी होती है. सच तो ये है कि तमाम लोगों को ये बातें तब पता चलती हैं जब मीडिया का जमावड़ा होने लगता है और सुरक्षा व्यवस्था अचानक बढने लगती है.

इस विवाद में बाबरी मस्जिद की ओर से पक्षकार इकबाल अंसारी कहते हैं कि इसकी वजह से यहां के हिन्दुओं और मुसलमानों में कोई विवाद नहीं है. उनके मुताबिक़ लगातार बाहर से आने वाले लोगों के उकसावे वाली कार्रवाई के चलते दोनों समुदायों के कुछेक लोग भले ही आपस में लड़ने-भिड़ने की कोशिश करें लेकिन आम अयोध्या वासी अमन-चैन से ही रहता है.

वरिष्ठ पत्रकार शिव कुमार मिश्र कहते हैं कि राजनीतिक तौर पर कुछ लोग इसे हल करने के मूड में बिल्कुल नहीं दिखते क्योंकि उन्हें डर है कि यदि ये मसला हल हो गया तो फिर उनके पास मुद्दा ही क्या रह जाएगा?

अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का विवाद यूं तो आजादी के पहले से ही चला आ रहा है लेकिन 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद केंद्र सरकार ने कानून बनाकर इसके आस-पास की 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया. इस अधिग्रहण के खिलाफ मुस्लिम पक्ष कोर्ट गया लेकिन अदालत ने इसको खारिज कर दिया.

30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाई हाई कोर्ट ने इस विवाद में बड़ा फैसला दिया और विवादित पौने तीन एकड़ जमीन को तीन हिस्सों में बांट दिया. लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को तीनों पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बहाल कर दी. सोमवार से सुप्रीम कोर्ट में इसी मामले की सुनवाई होनी थी जिसे फिलहाल टाल दिया गया है.

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