अमेरिकी कॉलेजों से किनारा कर रहे हैं चीनी छात्र | दुनिया | DW | 08.07.2019
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दुनिया

अमेरिकी कॉलेजों से किनारा कर रहे हैं चीनी छात्र

पिछले कई सालों से चीनी छात्र अमेरिकी कॉलेजों में उच्च शिक्षा के लिए जाते रहे हैं. चीनी छात्रों के आने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अरबों रुपये भी आते रहे हैं. लेकिन अब ये पैसा ब्रिटेन और यूरोपीय देशों में जा सकता है.

अमेरिका और चीन के बीच छिड़ी कारोबारी जंग का असर अब चीनी छात्रों पर भी दिखने लगा है. चीन के छात्र अब पढ़ने के लिए अमेरिका का विकल्प तलाश रहे हैं. अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों में तकरीबन एक तिहाई छात्र चीन से आते हैं जिसके चलते अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अरबों रुपये भी आते रहे हैं. लेकिन मार्च 2019 के आंकड़ों के मुताबिक इसमें गिरावट दर्ज की गई, जो पिछले एक दशक में सबसे कम है.

चीनी छात्रों, उनके माता पिता और एडमिशन कंसल्टेंसी कंपनियों ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि वीजा पाने में देरी, रिसर्च प्रोजेक्ट बंद होने का डर और सुरक्षा की चिंता के चलते वे अब अमेरिका से कतरा रहे हैं.

चीन की सबसे बड़ी प्राइवेट एजुकेशन कंपनी न्यू ऑरिएंटल के सर्वे के मुताबिक अमेरिका नहीं जाने का फायदा अब सबसे ज्यादा ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया या कनाडा जैसे देशों को मिल रहा है.

सर्वे में बताया गया है कि चीनी छात्रों के लिए जापान और दक्षिण कोरिया अब तक शिक्षा के पारंपरिक केंद्र रहे हैं. सर्वे के मुताबिक यूरोप में जर्मनी और स्कैंडिनेवियाई देश चीनी छात्रों की पसंद बन रहे हैं. यहां वे इंजीनियरिंग और अन्य कार्यक्रमों के लिए आ रहे हैं.

कोर्स पूरा न कर पाने का डर

साल 2018 में ट्रंप प्रशासन ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में वीजा की अवधि को पांच साल से घटाकर एक साल कर दिया था. जिसके बाद से छात्रों के बीच अनिश्चितता पैदा होनी लगी. एडमिशन के लिए सलाह देने वाली कंपनी बुटीक कॉलेज कंसल्टेंसी के संस्थापक गु हुईनी कहते हैं, "अब इस बात को लेकर छात्रों के बीच बहुत अनिश्चितता है कि वह कोर्स खत्म कर भी पाएंगे या नहीं." 

न्यूयॉर्क के इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन के मुताबिक अमेरिका में पढ़ने वाले तकरीबन 3.6 लाख चीनी छात्रों में से एक तिहाई स्टेम क्षेत्र मतलब साइंस (विज्ञान), टेक्नोलॉजी (तकनीक), इंजीनियरिंग और मैथेमेटिक्स (गणित) की पढ़ाई कर रहे हैं.

वहीं अमेरिकी एजेंसी इमिग्रेशन एंड कस्टम एनफोर्समेंट का डाटा दिखाता है कि साल 2018 की तुलना में साल 2019 में अमेरिका आने वाले चीनी छात्रों की संख्या में करीब दो फीसदी की गिरावट आई है. छात्रों की आवाजाही में कमी सबसे पहले साल 2009 में देखी गई थी.

चीन की राजधानी बीजिंग के हाई स्कूल में पढ़ने वाली मेलिसा झांग ने बताया कि उन्होंने अब अमेरिका जाने की अपनी योजना को रद्द कर दिया है. इसके बजाय अब वह जर्मन भाषा सीख रही हैं ताकि जर्मनी में रोबोटिक्स की पढ़ाई में दाखिला ले पाएं. झांग कहती हैं कि वह पहले ही अमेरिकी यूनिवर्सिटी में दाखिले की तैयारी के चलते अपना एक साल गंवा चुकी हैं. उन्होंने कहा, "अगर मेरे लिए रिसर्च लैब सिर्फ इसलिए बंद कर दी जाए क्योंकि मैं चीन से हूं तो क्या मतलब है अमेरिका जाने का."

दम तोड़ रहा है अमेरिकी सपना

झांग की मां मिंगुए कहती हैं कि अब चीनी छात्रों के बीच अमेरिकी सपना दम तोड़ रहा है. उन्होंने कहा, "अगर अमेरिका हमें बाहरी महसूस कराएगा, हमारा स्वागत नहीं करेगा तो हम कही और चले जाएंगे. यह पीढ़ी महसूस करती हैं कि पूरी दुनिया उनके लिए खुली है." अमेरिका की गैर लाभकारी संस्था एसोसिएशन ऑफ इंटरनेशनल एजुकेटर्स के मुताबिक साल 2018 में चीनी छात्रों के चलते अमेरिकी अर्थव्यवस्था में करीब 13 अरब डॉलर आए थे. इस आंकड़े में ट्यूशन फीस समेत रहने का खर्च शामिल है.

अमेरिका की येल और स्टैनफोर्ड जैसी प्रमुख यूनिवर्सिटी शिकायत कर रही हैं कि ट्रेड वार उनके कैंपस प्लेसमेंट को प्रभावित कर रहा है. वहीं चीन भी अपने लोगों के बीच यह कहने से कतई नहीं चूक रहा कि अमेरिका अब सुरक्षित नहीं रहा. चीन का सरकारी मीडिया अमेरिका में रह रहे चीनी परिवारों पर हो रहे हमलों की रिपोर्ट कर रहा है. रिपोर्ट में उन लोगों की बात भी जा रही है जो चीन से अमेरिका घूमने जाते हैं. शिक्षा उद्योग के जानकारों का मानना है कि अगले कुछ सालों में अमेरिकी कॉलेजों में कुछ ही चीनी छात्र नजर आएंगे. 

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एए/एमजे (एएफपी)

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