अमेरिका से दूर और चीन के करीब जाता पाक | दुनिया | DW | 09.03.2017
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दुनिया

अमेरिका से दूर और चीन के करीब जाता पाक

अमेरिका के साथ कमजोर पड़ रहे रिश्तों के चलते अब पाकिस्तान, चीन का हाथ थामता नजर आ रहा है. पाकिस्तानी नेता चीन को अपना गहरा यार कह रहे हैं और भविष्य में देश की मजबूती के दावे भी कर रहे हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इस्लामाबाद के प्रति जो भी रुख अख्तियार करें लेकिन पाकिस्तान बीजिंग के करीब जा रहा है. वहीं बीजिंग भी रणनीतिक रूप से अहम इस साझेदार को पूरी तवज्जो दे रहा है. बीजिंग ने ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और उद्योग में 46 अरब डॉलर की निवेश योजना का वादा किया है. यह निवेश पाक जैसे देश की बेहाल अर्थव्यवस्था को बहाल कर सकता है.

अमेरिका का पाकिस्तान पर भरोसा लगातार कम होता जा रहा है. तमाम अमेरिकी नीतिनिर्माता पाक को आतंकवाद का केंद्र मानते हैं जिसकी सुरक्षा व्यवस्था पर 9/11 के हमले के बाद से अब तक करीब 30 अरब डॉलर का खर्च किये जा चुके हैं. 

अमेरिकी की ओर से पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद साल 2011 के बाद से ही लगातार घटाई जा रही है. इसी दौरान अमेरिकी सेना ने अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में मार गिराया था जिसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आ गये. हाल के वर्षों में अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की मौजूदगी में कमी आई है और पाकिस्तान भी अमेरिकी प्राथमिकताओं से खिसका है.

ऐसी आशंका है कि अमेरिका से इस्लामाबाद को मिलने वाली सहायता और भी कम हो सकती है क्योंकि हाल में ही डॉनल्ड ट्रंप ने कूटनीति और विदेशी सहायता बजट में कटौती से जुड़ा प्रस्ताव रखा था. आशंका तो इस बात की भी है अल कायदा का नया नेता अल जवाहिरी भी पाक में छिपा हो सकता है.

हालांकि चीन भी पाकिस्तान में पनप रहे आतंकवाद पर अपनी चिंता व्यक्त कर चुका है लेकिन इसके बावजूद बीजिंग को पाकिस्तान में रणनीतिक और आर्थिक अवसर नजर आते हैं. यह गठबंधन भी चीन की महत्वकांक्षाओं का अहम हिस्सा है. एशिया को यूरोप से जोड़ने वाले "वन बेल्ट वन रोड” योजना भी चीन की महत्वकांक्षी योजनाओं में से एक है.

चीन की निवेश योजनाओं का पाकिस्तान भी स्वागत कर रहा है. देश के योजना और विकास मंत्री अहसान इकबाल ने चीन के इस निवेश का स्वागत करते हुये कहा कि बिजली की कमी से जूझ रही देश की 20 करोड़ आबादी को इससे राहत मिलेगी. उन्होंने बताया कि चीन की निजी कंपनियों की ऊर्जा क्षेत्र में करीब 35 अरब डॉलर की निवेश योजना है. चीन की ओर से 10 अरब डॉलर का निवेश सड़क, रेल और बंदरगाहों जैसी सुविधाओं के लिये भी किया जाना है.

अमेरिकी थिंक थैंक ने कुछ समय पहले अपने एक लेख में कहा था, द स्टोरी ऑफ पाकिस्तान इज चैंजिंग, इसी का हवाला देते हुये इकबाल ने कहा "हम तैयार हैं लेकिन क्या अमेरिका तैयार है".

पाकिस्तान, भारत को अपना धुर विरोधी मानता है और नई दिल्ली और वॉशिंगटन की बढ़ती नजदीकियां भी उसे रास नहीं आ रही हैं. भारत पाकिस्तान को सीमापार आतंकवाद के लिये जिम्मेदार मानता है. भारत के इस रुख पर अमेरिका के बढ़ते भरोसे को देखते हुये अब इस्लामाबाद चीन के करीब जा रहा है. चीन और भारत के बीच भी सीमा विवाद बना हुआ है.

वॉशिंगटन के विल्सन सेंटर में दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ माइकल कुग्लमैन के मुताबिक "अगर सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से होता है तो पाकिस्तान को निश्चित ही इससे लाभ मिलेगा और ऊर्जा की कमी से जूझ रहे पाकिस्तान के बुनियादी ढांचे में भी सुधार होगा. लेकिन पाकिस्तान, चीन की अनदेखी नहीं कर सकता. पाक को यह भी समझना होगा कि चीन अपने हितों को ही हर सूरत में प्राथमिकता देगा." पाकिस्तान ने चीनी परियोजनाओं की सुरक्षा पुख्ता करने के लिये सुरक्षा बल तैनात किये हैं.

आलोचकों का मानना है कि चीन के साथ पाकिस्तान के सौदे पूरी तरह साफ नहीं हैं. इनमें यह साफ नहीं है कि कैसे स्थानीय लोगों को इससे लाभ मिलेगा. हालांकि पाकिस्तान में चीन की बढ़ती मौजूदगी ने भारत की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.

एए/ओएसजे (एपी)

 

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