″अमेरिका-चीन आर्थिक विवाद तो ′व्यापार के बारे में′ है ही नहीं″ | दुनिया | DW | 14.01.2019
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दुनिया

"अमेरिका-चीन आर्थिक विवाद तो 'व्यापार के बारे में' है ही नहीं"

विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच चला आ रहा विवाद कब खत्म होगा, इसके अब तक कोई ठोस संकेत नहीं हैं. डॉयचे वेले ने अर्थशास्त्री यूकोन हुआंग से चीन और अमेरिका की आर्थिक प्रतिस्पर्धा के बारे में बात की.

अमेरिका चाहता है कि चीन अमेरिकी निवेश, उत्पादों और सेवा क्षेत्र के लिए अपना बाजार खोल दे, साथ ही सुनिश्चित करे कि उनकी बौद्धिक संपदा भी चोरी ना हो. चीन के सरकारी अखबार 'चाइना डेली' में छपे संपादकीय की मानें, तो चीन ऐसी "अनुचित रिआयतें" देने के लिए बिल्कुल राजी नहीं है.

इसके अलावा अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक होड़ को लेकर कई भ्रम भी फैले हुए हैं. अर्थशास्त्री यूकोन हुआंग ने इन दोनों आर्थिक महाशक्तियों के बीच के असली विवाद के बारे में डॉयचे वेले से बात की. हुआंग वॉशिंगटन में कार्नेगी इनडाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के वरिष्ठ फेलो हैं. इसके पहले वह विश्व बैंक में चीन के कंट्री डॉयरेक्टर भी रह चुके हैं.

डॉयचे वेले: क्या सचमुच अमेरिका और चीन के बीच "व्यापारिक युद्ध" छिड़ा है?

यूकोन हुआंग: विडंबना यह है कि दोनों के बीच मुद्दा व्यापार का है ही नहीं. अमेरिकी व्यापार घाटा कम करने के आधार पर आप यह युद्ध नहीं लड़ सकते. अमेरिका पिछले 40 साल से चीन के मुकाबले व्यापार घाटे में है. ना तो आप चीनी आयात पर शुल्क बढ़ाकर इसे हल कर सकते हैं, और ना ही चीन को अमेरिकी उत्पाद बेच कर.

मुझे लगता है कि अमेरिका के व्यापार वार्ताकार ये समझते हैं कि व्यापार घाटा असल मुद्दा नहीं है, लेकिन ट्रंप के लिए है. यह एक सबको नजर आने वाली चीज है जिसे वे राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं. दोनों के बीच निवेश सीमा और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे जो असल मुद्दे हैं, वे सब तो आम जनता की समझ से काफी ऊपर हैं.

Jahresrückblick 2018 (picture alliance/dpa)

शी और ट्रंप की मुलाकात

क्या दोनों पक्षों के बीच हुई हालिया बातचीत से एक मार्च की अंतिम सीमा से पहले कोई हल निकलने की सूरत बनी है?

मुझे लगता है कि डेडलाइन तक बातचीतों का दौर ही चलता रहेगा. तब तक भी सहमति नहीं बनी तो तारीख और आगे बढ़ जाएगी. वैसे अगर समझौता होता भी है तो सवाल होगा कि केवल नाम का समझौता है या फिर वाकई उसमें दम है और अहम मुद्दों को सुलझाया गया है. और मुझे नहीं लगता कि एक मार्च तक कोई भी ठोस समझौता हो पाएगा. यहां जिन अहम बदलावों का सवाल है वे समझौतों से हल होने वाले हैं ही नहीं. यहां बात देश में व्यवहार, नीतियां और संस्थानों को बदलने की है, जो कि कई सालों में ही हो सकता है.

चीन के हिसाब से अमेरिका कैसी "अनुचित रिआयतें" मांग सकता है?

मिसाल के तौर पर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का मुद्दा है, जो कि अमेरिका के लिए अहम है. लेकिन अगर कोई अमेरिकी कंपनी अपनी टेक्नोलॉजी चीनी कंपनी को ट्रांसफर करने से मना करती है, तो चीनी कहेंगे कि ऐसा कैसे होगा. जो भी कंपनी चीन में काम करती है, वो तकनीक तो सौंपती ही है. मुद्दा ये है अगर कोई इस तकनीक को सही तरह से खरीदने के बजाए चुरा ले, बेच दे और अपना बना ले. लेकिन इसका फैसला तो अदालत में ही हो सकता है कि किस तरह की तकनीक का ट्रांसफर वैध है और कैसा नहीं. सच तो यह भी है कि आज तक विश्व व्यापार संगठन में ऐसा कोई दावा पेश नहीं हुआ जिसमें तकनीक के अवैध या जबरन ट्रांसफर का आरोप हो. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि आज तक किसी ने आधिकारिक रूप से तकनीक ट्रांसफर को ठीक से परिभाषित भी नहीं किया है. ऐसे में अगर आप चीन से कहेंगे कि इसे रोक दे, तो वे कहेंगे कि "हमें नहीं पता कि आप क्या हमसे क्या करने को कह रहे हैं."

Porträt Yukon Huang (Carnegie Endowment for International Peace)

यूकोन हुआंग

अमेरिका-चीन विवाद का एशिया से जुड़ी सप्लाई चेन पर क्या असर पड़ेगा और क्या उत्पादन का काम सस्ते दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों को चला जाएगा?

ज्यादातर लोगों को लगता है कि मैनुफैक्चरिंग का काम विएतनाम, भारत, बांग्लादेश, म्यांमार और बाकी ऐसे देशों में चला जाएगा जहां श्रम और प्रोडक्शन सस्ता है. बीते एक साल में ही करीब 80 फीसदी प्रोडक्शन का ट्रांसफर हो भी चुका है क्योंकि ऐसे व्यापारिक युद्ध की आशंका पहले से ही थी. लेकिन यह सारा काम सस्ते दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में नहीं बल्कि अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों में गया.

अब तक जिन उच्च तकनीक वाले उत्पादों पर टैरिफ बढ़ा है, वे ऐसे देशों में ही बनाई जा सकती थीं. फिलहाल चीन को अपनी उच्च तकनीक वाले सेक्टर पर अमेरिका के लगाए गए 25 फीसदी टैरिफ को संभालने में ज्यादा दिक्कत आ रही है. जब ऐसी चीजों पर शुल्क बढ़ेगा जिनमें तकनीक से ज्यादा श्रम की भूमिका होती है, तो सस्ते देशों में काम जाएगा.  

यूकोन हुआंग वॉशिंगटन में कार्नेगी इनडाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के वरिष्ठ फेलो हैं. इसके पहले वह विश्व बैंक में चीन के कंट्री डॉयरेक्टर भी रह चुके हैं.

वेस्ली रान/आरपी

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