अमेरिका की मानवाधिकार रिपोर्ट पर चीन में हल्ला क्यों? | ब्लॉग | DW | 18.04.2022

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ब्लॉग

अमेरिका की मानवाधिकार रिपोर्ट पर चीन में हल्ला क्यों?

अमेरिकी सरकार के मानवाधिकार रिपोर्ट पर चीन बिफर गया है. वैसे तो इस रिपोर्ट से रूस, भारत, मलेशिया समेत कई और देश भी नाखुश हैं लेकिन चीन ने तो बकायदा एक जवाबी रिपोर्ट का सहारा लेकर अमेरिका पर ही हमला बोल दिया है.

उइगुरों को कैंप में रखने का कई तरह से विरोध हुआ है

उइगुरों को कैंप में रखने का कई तरह से विरोध हुआ है

अमेरिकी विदेश मंत्रालय का लोकतंत्र, मानवाधिकार, और श्रम से जुड़े मामलों का ब्यूरो पिछले पांच दशकों से दुनिया भर के देशों में संयुक्त राष्ट्र की मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा और दूसरे मानदंडों के अनुसार एक सालाना मानवाधिकार रिपोर्ट तैयार करता है.

12 अप्रैल को जारी की गयी इस रिपोर्ट की दिलचस्प बात यह भी है कि इस रिपोर्ट में 198 देश शामिल हैं.

2021 की रिपोर्ट में अमेरिका से सहायता ले रहे और संयुक्त राष्ट्र संघ से जुड़े देशों में राज्य, प्रशासन, पुलिस, आम इंसान की स्वतंत्रताओं और अधिकारों से जुड़े मामलों पर व्यापक टिप्पणी की गयी है.

शिनजियांग में स्थिति चिंताजनक

रिपोर्ट के अनुसार पिछले लगभग पांच सालों में चीनी सरकार ने 20 लाख से अधिक उइगुर अल्पसंख्यकों को री-एजुकेशन कैम्पों में डाला है, उनसे कपास कारखानों, खेतों, मिलों, और खदानों में बंधुआ मजदूरी कराई है. और ना मानने वालों का नामोनिशान मिट चुका है.

अमेरिकी प्रशासन चीन की शिनजियांग में सरकार की देखरेख में चल रही अमानवीय हरकतों पर पहले भी उंगलियां उठाता रहा है. हालांकि बीते दो - तीन सालों में उसके तेवर काफी तीखे हुए हैंमिसाल के तौर पर 2020 की रिपोर्ट में भी चीन पर ऐसे ही आरोप लगे थे. गौरतलब है कि चीन को नरसंहार का दोषी मानने का चलन ट्रंप प्रशासन के आखिरी दिनों से चला आ रहा है. अमेरिकी रिपोर्ट में शिनजियांग के मुद्दे के अलावा व्यापक स्तर पर आम नागरिकों की गुमशुदगी के मामलों पर भी चिंता जताई गयी है.यह भी पढ़ेंः श्रीलंका की खस्ताहाल का कौन जिम्मेदार

भूतपूर्व चीनी उप प्रधानमंत्री चांग काओ ली पर यौन शोषण का आरोप लगाने के बाद जिस तरह चीनी टेनिस स्टार फंग श्वे गायब हुई हैं, उस पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गयी है.

चीन में उइगुरों के कब्रिस्तान को भी मिटा दिया गया

चीन में उइगुरों के कब्रिस्तान को भी मिटा दिया गया

नवंबर 2021 में जब फंग श्वे ने चीनी सोशल मीडिया वाइबो पर इस बात की जानकारी दी तो वो अचानक तीन हफ्ते के लिए गायब हो गयी, उनके सोशल मीडिया पोस्ट डिलीट हो गये और टेनिस शब्द भी सेंसर हो गये. दुनिया भर में इस बात पर बवाल मचने के बाद फंग श्वे मीडिया में तो दिखीं लेकिन यह साफ था कि उन पर निगरानी रखी जा रही थी. अभी भी फंग श्वे आजाद हैं या नहीं इस पर निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता.

तिब्बत और हांगकांग की भी फिक्र

तिब्बत पर भी इस रिपोर्ट में विस्तार से चर्चा की गयी है. तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं के साथ अत्याचार, तिब्बती लोगों के निर्बाध आवागमन पर रोक, उन पर तरह तरह के निगरानी के तरीके जैसे आंखों के सेंसर, अंगुलिओं के निशान से पहचान करना, अभिव्यक्ति की और मनचाहा काम करने पर पाबंदियों जैसे कई मसलों पर चिंता प्रकट की गयी है.

बौद्ध भिक्षुओं का चीनी सरकार के विरोध में आत्मदाह भी एक बड़ी चिंता का विषय है.

यही हाल हांगकांग से जुड़े दस्तावेज का भी है जिसमें कहा गया है कि प्रशासन और पुलिस ने हांगकांग में अधिकारों की मांग कर रहे लोगों को चुन चुन कर निशाना बनाया है.

हांगकांग को लेकर भी अमेरिकी रिपोर्ट में चिंता जताई गई है

हांगकांग को लेकर भी अमेरिकी रिपोर्ट में चिंता जताई गई है

इस रिपोर्ट से यह साफ होता है कि चीन में मानवाधिकारों की और वहां रह रहे आम इंसान की स्थिति उत्तरी कोरिया या ईरान से बेहतर नहीं है. दुनिया के तमाम देशों को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा.  लेकिन इस ओर कदम उठाने में कई अड़चने हैं.

चीन का जवाब

अमेरिका की इस मानवाधिकार रिपोर्ट की आलोचना करते हुए चीन ने इसे आडंबरपूर्ण और दोहरे मानदंडों से ग्रसित बताया है. दिलचस्प है कि जिस दिन अमेरिका में यह रिपोर्ट आयी उसके 24 घंटे के अंदर वाइबो जैसे सोशल मीडिया चैनलों पर अमेरिका के मानवाधिकारों से जुड़े संदेश ट्रेंड करने लगे.

13 अप्रैल को जारी अपने बयान में चीनी विदेश मंत्रालय ने अमेरिका की जमकर आलोचना की और कहा कि रिपोर्ट और इस संदर्भ में जारी किये गए अमेरिकी विदेश मंत्री ब्लिंकेन के बयान तथ्यों को तोड़मोड़ कर पेश करने की साजिश का हिस्सा हैं. उनका यह भी कहना था कि, "अमेरिका हर साल यह रिपोर्ट लांच करता है और इसके जरिये चीन की छवि खराब करने की कोशिश करता है, और चीन इस बात का पुरजोर विरोध करता है.” चीन ने यह भी कहा कि "अमेरिकी रिपोर्ट झूठ है और चीन के खिलाफ वैचारिक पक्षपात से प्रेरित है”.

चीन को यह बात भी खल गयी कि जब 12 अप्रैल को अपने बयान में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने यूक्रेन मसले पर रूस के आक्रमण को नरसंहार की संज्ञा दी तो साथ में चीन को लपेटे में ले लिया और कहा कि चीन भी ऐसी ही गतिविधियां शिनजियांग प्रांत में पिछले कुछ वर्षों से करता आया है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि चीन शिनजियांग में ज्यादतियां करता रहा है, लेकिन बाइडेन का शिनजियांग को यूक्रेन से जोड़ना चीन को नागवार गुजरा.

अमेरिका में काले लोगों के मानवाधिकारों पर चीन ने उठाए सवाल

अमेरिका में काले लोगों के मानवाधिकारों पर चीन ने उठाए सवाल

चीन के हाथ लगा जवाबी हथियार

चीनी विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा है कि अमेरिका में अल्पसंख्यकों को लेकर वह चिंतित है और अमेरिका का आह्वान करता है कि वह अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों का उल्लंघन ना करे. 

चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार चीनी विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों के प्रति अमेरिकी सरकार के रवैये में सुधार की जरूरत है.

इस सिलसिले में जवाबी कूटनीतिक कार्रवाई करते हुए चीनी सरकार ने नेशनल अरबन लीग की 2022 की "स्टेट आफ ब्लैक अमेरिका रिपोर्ट” को हथियार बनाया.

12 अप्रैल को ही लांच हुई इस रिपोर्ट के अनुसार बीते साल अश्वेत अमेरिकन नागरिकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आई है. रिपोर्ट के अनुसार बीते साल में ही 20 प्रदेशों में कांग्रेसनल परिसीमन हुआ है जिसके चलते क्य अश्वेत अमेरिकी नागरिकों के राजनितिक हितों का हनन हुआ है.

यह भी पढ़ेंः क्या इंडो-पैसिफिक में दबदबे के लिए गंभीर हो रहा है अमेरिका

नेशनल अरबन लीग अमेरिकी गैरसरकारी नागरिक अधिकार संगठन है जो 1976 से अमेरिका में अश्वेतों की आर्थिक, सामाजिक, और राजनीतिक स्थिति पर सालाना रिपोर्ट जारी करता रहा है.

रिपोर्ट के इक्वलिटी इंडेक्स के अनुसार अश्वेतों को गोरों के मुकाबले 73.9 % सुविधायें ही उपलब्ध हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि वैसे तो अश्वेतों ने आर्थिक और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे मुद्दों पर विकास किया है लेकिन शिक्षा, सामजिक न्याय और नागरिक संबंधों जैसे मुद्दों में और पिछड़ गये हैं.

अमेरिका में नस्लभेद को लेकर बीते सालों में कई विरोध प्रदर्शन हुए हैं

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अमेरिकी सरकार के दोहरे मानदंड

नेशनल अरबन लीग की रिपोर्ट ने निस्संदेह अमेरिकी सरकार के दोहरे मानदंडों की पोल खोल दी है.

हालांकि अमेरिकी सरकार इसे लेकर चिंतित नहीं दिखती. और क्यों न हो, दुनिया में मानवाधिकारों की ठेकेदारी तो अमेरिका के पास ही है - और यह ठेका भी कुछ इस कदर बड़ा कि रूस, चीन, और बर्मा (म्यांमार) तो छोड़िये, भूटान, स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन जैसे देश भी शामिल हैं लेकिन अपना जिक्र करने की उसे जरूरत नहीं महसूस होती. अमेरिका की मानवाधिकार रिपोर्ट पर चीन और रूस के अलावा भारत और मलेशिया जैसे देश भी खुश नहीं हैं.

हालांकि अमेरिका पर उंगली उठाने से किसी भी देश के मानवाधिकार हनन के दाग हलके नहीं होंगे, लेकिन राजनय और अंतरराष्ट्रीय विश्वव्यवस्था में बड़ा प्रश्न सभी सार्वभौम देशों की बराबरी का है. अमेरिका या कोई भी महाशक्ति इस मूलभूत सिद्धांत को कम से कम नैतिक तौर पर तो नजरअंदाज कर ही नहीं सकती. जमीनी हकीकत से तो खैर हम सभी वाकिफ ही हैं.

चीन जैसे तमाम देशों की नाखुशी की वजह यही है कि पिछले कई सालों में अमेरिका में अश्वेतों, चीनी मूल के लोगों, भारतीयों, खास तौर से सिक्खों के साथ बदसलूकी, रंगभेद, और हिंसा के मामले आये लेकिन अमेरिका ने उस पर दुनिया के सामने कोई सफाई देना जरूरी नहीं समझा. इसे हमेशा अमेरिका का अंदरूनी न्याय और कानून व्यवस्था से जुड़ा मामला माना गया.

बावजूद इसके, हर साल की तरह एक बार फिर अमेरिका का पूरी दुनिया को मानवाधिकार संरक्षण और संवर्धन का पहाड़ा का चलन दुनिया के तमाम देशों को रास नहीं आ रहा.

काले लोगों की पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों पर अमेरिका में बहुत बवाल हुआ

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आखिरकार यह कैसी रिपोर्टें हैं जिनमें जमाल खशोगी की नृशंस हत्या का जिक्र तो है लेकिन विंस्टन स्मिथ की अमेरिकी मार्शलों के हाथों निर्मम हत्या पर चिंता की कोई जगह नहीं है? ऐसा क्यों है कि रूस के आलेक्सी नोवोलनी तो भ्रष्टाचार से लड़ने वाले देवदूत हैं और जूलियन असांज राज्य के गुप्त कागजात लीक करने के और जासूसी के दोषी?

अगर अमेरिका इन रिपोर्टों को लेकर संजीदा है तो उसे अपने आप को और साथ में अपने तमाम सहयोगियों को भी आईने के सामने खड़ा करना पड़ेगा. और अगर वह ऐसा नहीं करता तो चीन जैसे ताकतवर देश उसे खुद आईने के सामने खड़ा करने की कोशिश करेंगे. और ऐसी स्थिति अमेरिका और उसके बनाये इंटरनेशनल लिबरल ऑर्डर वाले निजाम के लिए अच्छी नहीं होगी.

(राहुल मिश्र मलाया विश्वविद्यालय के एशिया-यूरोप संस्थान में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं.)

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