अब मशीन देगी मलेरिया का पता | विज्ञान | DW | 13.03.2014
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

विज्ञान

अब मशीन देगी मलेरिया का पता

माइक्रोस्कोप से मलेरिया का पता लगाना आसान नहीं है, इसमें न केवल समय लगता है बल्कि बहुत अनुभव की भी जरूरत है. जर्मन रिसर्चरों ने मलेरिया का जल्द पता लगाने के लिए एक मशीन बनाई है.

इंटीग्रेटेड सर्किट पर काम करने वाले जर्मनी के मशहूर संस्थान फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट ने ऑटोमेटेड माइक्रोस्कोपी मशीन का मॉडल बनाया है. माइक्रोस्कोप वाले सफेद रंग के बॉक्स को कंप्यूटर से जोड़ा गया है. अब अस्पताल या क्लीनिक के स्टाफ को बस इतना करना है कि दस स्लाइड वाला कार्टेज इसमें डाल दिया जाए. फ्राउनहोफर संस्थान के फ्यूचर मलेरिया प्रोजेक्ट के प्रमुख आंद्रेयास राइमन बताते हैं कि सिस्टम एक बार में एक स्लाइड स्कैन करता है.

मलेरिया की जांच के लिए आम तौर पर डॉक्टर मरीज का खून लेकर उसमें कुछ केमिकल डालता है, मलेरिया के परजीवी बैंगनी से रंग के दिखाई देने लगते हैं, लेकिन इन्हें ढूंढना कभी कभी मुश्किल हो जाता है. ये कहती हैं बॉन यूनिवर्सिटी मेडिकल कॉलेज की तकनीकी असिस्टेंट सबीने नाख्टश्टाइन. मेडिकल कॉलेज अस्पताल में माइक्रोबायोलॉजी संस्थान में वरिष्ठ डॉक्टर एर्न्स्ट मोलिटोर कहते हैं, "मलेरिया परजीवी है, ये सुनिश्चित करने के लिए आपको बहुत प्रैक्टिस की जरूरत होती है."

वहीं आंद्रेयास राइमन कहते हैं, "मलेरिया माइक्रोस्कोपी में ऑटोमैटिक मदद की बहुत मांग है. कई बार ऑक्सफोर्ड जैसे मशहूर संस्थानों में भी मलेरिया का पता लगाने के लिए अफ्रीका से विशेषज्ञ मंगवाए जाते हैं." तो मशीन ये मदद कर सकती है.

क्या करेगी नई तकनीक

खून के नमूने की ठीक से जांच करने के लिए माइक्रोस्कोप स्लाइड को एक ओर और ऊपर नीचे खिसकाया जाता है. माइक्रोस्कोप में जो देखा गया, उसकी तस्वीरें एक कैमरा लेता है और उन्हें कंप्यूटर पर सेव कर देता है. अल्गोरिदम की मदद से सॉफ्टवेयर उन सभी गुणों को ढूंढता है जो मलेरिया के परजीवी में मिलते हैं. राइमन कहते हैं, "आखिर में सिस्टम बताता है कि खून में परजीवी हैं या नहीं और अगर हैं तो कितने हैं. डॉक्टर को इसे देख कर बस पुष्टि करनी होती है, और डायग्नोसिस हो जाता है." एक स्लाइड का विश्लेषण करने में 10 मिनट लगते हैं. इससे अस्पताल और डॉक्टरों का काफी समय बच सकता है.

शाम में खून के नमूने वाली कई स्लाइड्स इसमें डाल दी जाएं तो रात भर की स्कैनिंग के बाद मशीन सुबह सभी मरीजों के लिए बता देगी कि किसके शरीर में कितने परजीवी हैं. अफ्रीका में ये काफी लाभदायक हो सकता है ताकी मलेरिया के लिए नया टीका बनाया जा सके.

लेकिन ऐसी कुछ वैकल्पिक और सस्ती तकनीक भी मौजूद हैं, जो कुछ ही मिनटों में मलेरिया का पता दे सकती हैं. इनमें एक है, प्लास्टिक के स्ट्रिप वाली प्वाइंट ऑफ केयर टेस्ट. इसमें खून की एक बूंद प्लास्टिक की पट्टी पर रखने से कुछ ही मिनटों में पता चल जाता है कि मलेरिया है या नहीं. ये उस पदार्थ का पता लगाते हैं जो मलेरिया परजीवी बनाता है. लेकिन मशीन बनाने वालों का दावा है कि इस सस्ते टेस्ट से मलेरिया का शुरुआती दौर में पता नहीं चल सकता. उनका दावा है कि अगर बीमारी शुरुआती दौर में है तो प्रचलित टेस्ट में 100 में से पांच मामलों में मलेरिया टेस्ट निगेटिव आ सकता है.

रिपोर्टः ब्रिगिटे ओस्टेराथ/आभा मोंढे

संपादनः महेश झा

विज्ञापन