अब पुलिस वालों को कौन बचाए | दुनिया | DW | 04.12.2018
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दुनिया

अब पुलिस वालों को कौन बचाए

राजधानी दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में दंगे को संभालने के लिए पहुंचे पुलिस अधिकारी की भीड़ ने जिस तरह से पीट-पीटकर हत्या कर दी, उससे उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है.

बुलंदशहर के स्याना इलाके में सोमवार को सुबोध कुमार सिंह नाम के एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या कर दी गई. घटना में एक और व्यक्ति की मौत हो गई. पुलिस ने फिलहाल कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है और हमलावरों की पहचान की जा रही है लेकिन मुख्य अभियुक्त अभी भी उसकी पहुंच से बाहर है. सरकार ने घटना की जांच के लिए एसआईटी का भी गठन कर दिया है.

घटना के बाद से पूरे इलाके में दहशत है और हजारों की संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है ताकि इसके बाद भी कोई अनहोनी न होने पाए. घटना के तार एक बार फिर उसी कथित गोहत्या मामले से जुड़े हैं, जिसे लेकर पिछले कुछ सालों में न जाने कितने लोगों की जान गई है.

बुलंदशहर में हिंसक भीड़ के हाथों मारे गए पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की हत्या के तार भी एक अन्य मॉब लिंचिंग के साथ जोड़े जा रहे हैं. ग्रेटर नोएडा के दादरी में तीन साल पहले हुए अख़लाक हत्याकांड में सुबोध कुमार जांच अधिकारी थे.

2015 में हुए इस हत्याकांड के समय सुबोध कुमार जारछा थाने के धानाध्यक्ष थे और कथित तौर पर गोमांस रखने के लिए भीड़ के हाथों मारे गए अख़लाक़ अहमद का गांव इसी थाना क्षेत्र में आता है.

बुलंदशहर में सोमवार को गोहत्या का मामला इतना बढ़ गया कि बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी. भीड़ इतनी बेकाबू हो गई कि थाने पर हमला कर दिया गया, कई वाहन जला दिए गए और पुलिस अधिकारी की हत्या तक कर दी गई.

बताया जा रहा है कि विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रहे इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह को हिंसा पर उतारू भीड़ में से किसी ने गोली मार दी और उनकी लाइसेंसी पिस्तौल भी छीनकर भाग गए. भीड़ में मौजूद लोग इसके बाद भी गोलियां चलाते रहे.

भीड़ के हाथों पुलिसकर्मियों या अन्य सरकारी अफसरों के मार खाने या फिर जान से मार दिए जाने का ये कोई अकेला मामला नहीं है. हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं. करीब ढाई साल पहले मथुरा के जवाहर बाग में न्यायालय के आदेश पर अवैध कब्जा हटाने के लिए वहां पहुंचे अपर पुलिस अधीक्षक मुकुल द्विवेदी की भी हिंसक भीड़ ने हत्या कर दी थी.

सहारनपुर में पिछले साल एक राजनीतिक दल के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने अपने साथियों की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए वहां के एसएसपी का आवास घेर लिया था. एसएसपी ने बाद में सार्वजनिक तौर पर कहा था कि उस समय उनके परिवार में मौजूद पत्नी और बच्चे उस घटना से इस कदर डर गए थे कि उन लोगों ने एसएसपी आवास में रहने से ही मना कर दिया.

बरेली में पशु तस्करों की गाड़ी से कुचलकर मार दिए गए दरोगा मनोज मिश्र या पांच साल पहले प्रतापगढ़ के कुंडा में भीड़ की हिंसा का शिकार हुए पुलिस क्षेत्राधिकारी जियाउल हक का मामला हो, इन सभी मामलों में जांच चाहे जिस स्तर पर हुई हो, अभी तक निकल कर कुछ नहीं आया है.

इसके अलावा आए दिन ऐसी तस्वीरें और वीडियो सामने आते रहते हैं जिनमें पुलिस वालों पर कोई नेता हमला करता हुआ, धमकाता हुआ या फिर पुलिस वाले लोगों से पिटते हुए दिखते हैं. कई बार तो अधिकारियों को भी धमकाते हुए लोग दिखते हैं.

Indien Armee Gewalt in Uttar Pradesh 07.09.2013 (picture alliance/AP Photo)

2013 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दंगा रोकने के लिए तैनात पुलिसकर्मी

सवाल उठता है कि इस स्थिति में आम लोगों का भरोसा पुलिस और सरकार पर किस तरह से कायम हो सकेगा. आम लोगों से बात करने पर यही पता चलता है कि इससे वर्दी की प्रतिष्ठा और सम्मान धूमिल होता है जो कि सीधे तौर पर कानून व्यवस्था को प्रभावित करता है.

कई जिलों के एसएसपी और अन्य पदों पर रहे रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी वीएन राय कहते हैं, "सीधी सी बात है, ये सवाल तो हर कोई पूछेगा और उसे पूछने का हक भी है. जब लोगों की रक्षा करने के लिए तैनात वर्दीधारी ही सुरक्षित नहीं हैं तो वो लोगों को सुरक्षा का भरोसा कैसे दिला पाएंगे.”

वीएन राय इसके लिए शासन के हर स्तर पर कथित तौर पर होने वाले राजनीतिक गठजोड़ को भी जिम्मेदार मानते हैं. उनका कहना है, "आज पुलिस या प्रशासन में ऊपर से नीचे तक बैठा हर व्यक्ति किसी न किसी राजनीतिक दल से परोक्ष रूप से जुड़ाव रखता है. ये बात किसी से छिपी नहीं रहती है. पुलिस में यह प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है क्योंकि कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए जब उनकी टीम भेजी जाती है तो आपसी खींचतान भी सामने आ जाती है. हाल की तमाम घटनाओं में यही देखने को मिला है.”

जानकारों का कहना है कि राजनीतिक दलों से जुड़ाव या हमदर्दी शासन के हर स्तर पर न सिर्फ अनुशासन को कमजोर कर रही है बल्कि कार्यकुशलता को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रही है, खासकर पुलिस प्रशासन को. हाल की तमाम घटनाएं ऐसी हुई हैं जिनमें पुलिसकर्मियों पर हमले होने की स्थिति में अन्य पुलिसकर्मी अपने साथियों की मदद करने की बजाय वहां से भाग निकले.

वहीं वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान इन सबके लिए सीधे तौर पर सरकार की कार्यकुशलता पर सवाल उठाते हैं. उनका कहना है, "बुलंदशहर में इतनी बड़ी घटना जिस समय हो रही है उस समय राज्य का मुख्यमंत्री गोरखपुर में अपने साथियों के साथ पूजा-अर्चना कर रहा है, इससे प्रशासन में वो कितनी सख्ती और दृढ़ता ला पाएगा, सोचने वाली बात है. कानून व्यवस्था पूरी तरह से चरमराई हुई है और मुख्यमंत्री दूसरे राज्यों में चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं और वहां इसी कानून व्यवस्था की तारीफ अपने भाषणों में कर रहे हैं.”

बहरहाल, कानून व्यवस्था को बनाए रखने और पुलिस में आम लोगों का भरोसा कायम रखने के लिए जितना जरूरी पुलिस का आम लोगों से बर्ताव है उतना ही जरूरी खुद पुलिस वालों की सुरक्षा भी है. ऐसी घटनाओं का सम्यक संज्ञान लेते हुए यदि कठोर कार्रवाई होने की बजाय फाइलें धूल खाने के लिए दफ्तरों या अदालतों में बंद कर दी जाएंगी तो ऐसी घटनाओं का रुकना मुश्किल नहीं बल्कि नामुमकिन ही होगा.

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