अब नौकरियों से विकास पर जोर | दुनिया | DW | 02.10.2012

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दुनिया

अब नौकरियों से विकास पर जोर

विश्व बैंक का कहना है कि आने वाले 15 सालों में पूरी दुनिया में 60 करोड़ नयी नौकरियां पैदा करनी होंगी. बैंक के मुताबिक एशिया और सहारा मरुस्थल के देशों में रोजगार को वर्तमान स्तर पर रखने के लिए यह बहुत जरूरी होगा.

लेकिन यह सिर्फ आधी बात है. विश्व बैंक के वरिष्ठ अर्थशास्त्री मार्टिन रामा के मुताबिक ज्यादातर देश अपने बेरोजगार नागरिकों को सुरक्षा देने में असमर्थ हैं. उनका कहना है कि ज्यादातर लोग काम में बहुत वक्त बिताते हैं लेकिन इसके बावजूद बहुत कम कमाते हैं. 2013 की विश्व विकास रिपोर्ट में छापी गई इस जानकारी में विश्व बैंक का कहना है कि दुनिया भर में दो करोड़ लोग बेरोजगार हैं और इनमें से ज्यादातर युवा हैं. रिपोर्ट के मुताबिक बेरोजगार लोगों में से 30 प्रतिशत से ज्यादा की उम्र 25 से कम है.

अब तक विश्व बैंक ने ऐसी कुल 34 रिपोर्टें जारी की हैं, लेकिन केवल दो में नौकरियों की स्थिति पर ध्यान दिया है. बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसु कहते हैं कि विकास को बढ़ावा देने के लिए नौकरियों को विकास का केंद्र बनाना होगा क्योंकि नौकरियों से ही विकास हो सकता है. बसु के मुताबिक दक्षिण एशिया में हर महीने 10 लाख लोग श्रम बाजार में शामिल होते हैं.

बसु का कहना है कि केवल आर्थिक विकास से गरीबी खत्म नहीं होगी. अब तक सोचा जा रहा था कि विकास से लोगों के रहन सहन में बेहतरी आएगी और सामाजिक संबंध भी बेहतर होंगे लेकिन अलग अलग देशों में विकास का प्रभाव अलग होता है. रिपोर्ट के मुताबिक विकास की रणनीति के साथ नौकरियों के लिए भी खास रणनीति बनाने की जरूरत है क्योंकि केवल विकास नीति शायद महिलाओं और युवा के लिए नौकरियों पर ध्यान न दे, या छोटे शहरों में नौकरियां पैदा करने के बारे में न सोचे.

विश्व बैंक के नए शोध से पता चला है कि ज्यादातर लोग नौकरियों के जरिए ही गरीबी से बाहर निकलते हैं. बसु का कहना है कि नौकरियों की वजह से ही गरीबी के साथ साथ महिलाओं का उत्थान हुआ है, गांवों में विकास हुआ है और संघर्ष में भी कमी आई है. हालांकि फायदा देने वाली नौकरियां देश और उसकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती हैं. शोधकर्ता अब उन नौकरियों के बारे में पता कर रहे हैं जिनसे इस तरह के सबसे ज्यादा फायदे मिल सकते हैं.

विश्व बैंक के प्रमुख जिम योंग किम का कहना है कि सरकारों को अब निजी क्षेत्र के साथ मिलकर काम करना पड़ेगा क्योंकि, "90 प्रतिशत नौकरियां निजी क्षेत्र में हैं. इसलिए हमें छोटी कंपनियों और खेतों को बढ़ावा देना होगा. नौकरियों से उम्मीद बढ़ती है और शांति भी. इससे संवेदनशील देशों को स्थिरता मिल सकती है."

एमजी/एमजे(डीपीए,आईपीएस)

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