अफगानिस्तान में लड़ते भारत और पाकिस्तान | दुनिया | DW | 04.12.2011
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दुनिया

अफगानिस्तान में लड़ते भारत और पाकिस्तान

अफगानिस्तान युद्ध का अखाड़ा बना हुआ है. वहां लड़ाई सिर्फ नाटो और तालिबान के बीच ही नहीं हो रही है बल्कि भारत और पाकिस्तान की अपरोक्ष भी छिड़ी हुई है. इस लड़ाई में काफी कुछ दांव पर लगा है.

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''पाकिस्तान हमारा जुड़वां भाई है, भारत हमारा बढ़िया दोस्त है. दोस्त के साथ हमारे समझौते से भाई को फर्क नहीं पड़ेगा." अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई का यह बयान भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के मनमुटाव का सटीक उदाहरण है.

भारत और अफगानिस्तान की दोस्ती पाकिस्तान को चुभती है. पाकिस्तान का आरोप है कि भारत अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है. इस्लामाबाद को चिंता सताती है कि भारत उसे दो तरफ से घेरने की तैयारी कर रहा है. नई दिल्ली इससे इनकार करती है.

अफगानिस्तान में भारत

2001 में तालिबान की सत्ता ढहने के बाद अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव काफी बढ़ा है. वह अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में बड़ी भूमिका निभा रहा है. डेढ़ अरब डॉलर से ज्यादा खर्च कर भारत अफगानिस्तान में सड़कें, रेल, संचार व्यवस्था, इंटरनेट, सैटेलाइट, स्कूल और अस्पताल बना रहा है. अमेरिका भारत के प्रयासों की सराहना करता है. वॉशिंगटन को लगता है कि बॉलीवुड और अन्य सांस्कृतिक संबंधों के जरिए भी भारत अफगानिस्तान में मनोवैज्ञानिक बदलाव ला सकता है.

अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता उखड़ने से भारत को बड़ी राहत मिली है. अफगानिस्तान के गृह युद्ध के दौर में भारत उदारवादी धड़े नॉर्दन एलायंस को समर्थन देता था. काबुल का नियंत्रण तालिबान के हाथ में जाने से नई दिल्ली को काफी परेशानी हुई. भारत आरोप लगाता रहा कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई भारत के खिलाफ तालिबान का इस्तेमाल कर रही है.

इसका सबूत दिसंबर 1999 में मिला, जब पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन हरकत उल मुजाहिद्दीन के आतंकवादी इंडियन एयरलाइंस के विमान को अगवा कर कंधार ले गए. कंधार में आतंकवादियों को तालिबान ने पूरी मदद दी. भारतीय वायु सेना के हमले की आशंका के चलते तालिबान के हथियारबंद लड़ाकों ने विमान को घेर लिया. सात दिन बाद जब भारत ने जेल में बंद पाकिस्तान के तीन कुख्यात आतंकवादियों को छोड़ा तब अपहरण कांड खत्म हुआ. घटना बताती है कि अफगानिस्तान में तालिबान का प्रभाव बढ़ने से भारत क्यों घबराता है.

आर्थिक संबंध

काबुल और नई दिल्ली की दोस्ती व्यापारिक लिहाज से भी दोनों देशों के लिए फायदेमंद है. अफगानिस्तान खनिज तत्वों और ऊर्जा स्त्रोतों से भरा हुआ है. भारत चाहता है कि अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल काबुल भी करे और नई दिल्ली भी. भारत ने इसके लिए 50 करोड़ डॉलर की अतिरिक्त मदद दी. भारत की स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (सेल) की सहायक कंपनी को अफगानिस्तान में लौह अयस्क निकालने का ठेका भी मिल चुका है. अफगानिस्तान चाहता है कि भारत इस दिशा में और आगे बढ़े. काबुल यह बात बिल्कुल नापंसद है कि पाकिस्तान उसकी चौकीदारी करे या दिशा निर्देश दे.

अफगानिस्तान में पाकिस्तान

दोनों देशों की कोशिशों को धराशायी करने के लिए पाकिस्तान कई तरह के हथकंडे अपना रहा है. 2008 में काबुल में भारतीय दूतावास पर बड़ा हमला हुआ, जिसमें 41 लोग मारे गए. अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक हमला पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने कराया. साल भर बाद भी भारतीय दूतावास पर फिर हमला हुआ और 17 लोग मारे गए. इन हमलों के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया जाता है.

2010 में पाकिस्तानी अधिकारियों ने तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में हुए अफगानिस्तान सम्मेलन से भारत को दूर रखा. नई दिल्ली को यह संदेश दिया गया कि अफगानिस्तान के मामले में भारत पाकिस्तान की मर्जी के बिना कुछ नहीं कर सकता. इससे भारतीय कंपनियों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई. भारतीयों को लगा कि क्या बिना सुरक्षा वाले खतरनाक इलाके में इतना ज्यादा पैसा लगाना चाहिए. तभी भारत ने ईरान के साथ बातचीत शुरू की, ताकि दूसरे रास्ते का इस्तेमाल कर अफगानिस्तान में रेल और सड़क परियोजनाएं जारी रखी जाएं. अब भारतीय इंजीनियर ईरान और अफगानिस्तान के बीच रेलवे ट्रैक बना रहे हैं. लेकिन यह आशंका अब भी बनी हुई है कि पाकिस्तान के आतंकवादी दोस्त अफगानिस्तान के लिए जरूरी विकास में अपार बाधा न डालें.

रंजिश के कारण

इतिहास बताता है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान की कभी नहीं बनी. अफगानिस्तान के कबाइली गुट पाक-अफगान बॉर्डर को स्वीकार नहीं करते. उनके मुताबिक पाकिस्तान के कबायली इलाके अफगानिस्तान के हैं.

वहीं भारत और अफगानिस्तान के सदियों से अच्छे रिश्ते हैं. राजा जहीर शाह (1933-1975) के दौर में भी भारत और अफगानिस्तान के संबंध अच्छे थे. 1973 में जहीर के तख्तापलट के बाद भी नई दिल्ली और अफगानिस्तान के सत्ताधारी वामपंथियों के बीच करीबी संबंध रहे.

शीत युद्ध ने बदले हालात

1979 में सोवियत संघ की सेना अफगानिस्तान पहुंच गई. सोवियत सेना को वहां से खदेड़ने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद की. पाकिस्तान को हर साल 3.2 अरब डॉलर की मदद दी. भारत को सोवियत संघ का दखल खराब लगा लेकिन पाकिस्तान को मिली अमेरिकी मदद से उसकी चिंता बढ़ गई. पाकिस्तान और अमेरिका की इस घनिष्ठता के चलते भारत चुप हो गया. उसने सोवियत सेना का विरोध किसी भी खुले मंच पर नहीं किया. अमेरिका की मदद से पाकिस्तान की सैन्य ताकत बढ़ने लगी इसके चलते भारत और सोवियत संघ और करीब आए. नई दिल्ली ने अफगानिस्तान की सोवियत संघ समर्थक सरकार के साथ काम करना सीख लिया.

इसी दौरान पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और अमेरिकी एजेंसी ने अफगानिस्तान के स्थानीय लोगों को हथियार दिए और उन्हें स्वतंत्रा के लिए लड़ने वाले 'मुजाहिदीन' कहा. मुजाहिदीनों के साथ लंबे युद्ध के दौरान सोवियत सेना को भारी नुकसान हुआ. 1989 में सोवियत सेना को अफगानिस्तान से जाना पड़ा. तीन साल बाद 1992 में सोवियत संघ के समर्थन वाली वामपंथी सरकार के अफगानिस्तान में पांव उखड़ गए. इसके बाद पाकिस्तान, ईरान, सऊदी अरब और उजबेकिस्तान के बीच अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाने की होड़ लग गई.

झगड़ा और तालिबान

इसी होड़ के बीच पूर्व मुजाहिदीनों का संगठित समूह तालिबान सामने आया. पाकिस्तान और सऊदी अरब की मदद से खड़े तालिबान ने अफगानिस्तान से ईरान और उजबेक समर्थकों को हाशिए पर डाल दिया. 1996 में तालिबान ने सत्ता पर कब्जा कर लिया और देश का नाम इस्लामी अमीरात अफगानिस्तान रख दिया. धर्म के नाम अंधी ताकतों ने बामियान में बुद्ध की बड़ी बड़ी प्रतिमाएं तोड़ दीं.

लेकिन तस्वीर 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए मानव इतिहास के सबसे बड़े आतंकवादी हमले ने तस्वीर बदल कर रख दी. पता चला कि हमला अफगानिस्तान से चल रहे आतंकवादी संगठन अल कायदा ने किया. तालिबान भी हमले में शामिल रहा. महीने भर के भीतर अमेरिका समेत पश्चिमी देशों की फौजें अफगानिस्तान पहुंच गई और बीते 10 साल से वहां तालिबान को उखाड़ फेंकने की लड़ाई जारी है.

रिपोर्टः ओंकार सिंह जनौटी

संपादनः ए जमाल

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