अफगानिस्तान में प्रेस आजादी कम होने की चिंता | दुनिया | DW | 02.07.2012
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दुनिया

अफगानिस्तान में प्रेस आजादी कम होने की चिंता

मीडिया की आजादी को लेकर अफगानिस्तान के पत्रकारों और राष्ट्रपति हामिद करजई की सरकार के बीच ठन गई है. सरकार विदेशी सैनिकों की वापसी से पहले समाज के अनुदारवादी तबके को लुभाने में लगी है.

संशोधित मीडिया कानून के जरिए जीवंत अफगान प्रेस पर सरकारी शिकंजा कसने की तैयारी हो रही है. इसके अलावा विदेशी प्रोग्रामिंग को सीमित करने का भी इरादा है जो तालिबान को खुश करेगा. काबुल सरकार तालिबान के साथ शांति वार्ता शुरू करना चाहती है. मीडिया एडवोकेसी ग्रुप नई के कार्यकारी निदेश अब्दुल मुजीब खलवतगार कहते हैं, "सरकार 2014 तक तैयार रहना चाहती है और अनुदारवादी तत्वों की वापसी का रास्ता साफ करना चाहती है." नाटो और अमेरिका अपने सैनिकों को 2014 तक अफगानिस्तान से हटाने जा रहा है.

अमेरिकी सेनाओं के हाथों 2001 में हटाए जाने तक तालिबान के पांच साल के शासन के दौरान कट्टरपंथी इस्लामी संगठन ने सिर्फ एक रेडियो स्टेशन और एक अखबार को चलाने की इजाजत दी. महिलाओं को मतदान और ज्यादातर काम करने के मौलिक अधिकारों से वंचित रखा. दैनिक अखबार नुखोस्त के सम्पादक हशमत रदफर कहते हैं, "हम बेहद चिंतित हैं. पहले प्रेस, अभिव्यक्ति की आजादी और फिर महिलाओं की बलि चढ़ जाएगी."

करजई की अहम उपलब्धि

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राष्ट्रपति हामिद करजई 2009 में पास वर्तमान मीडिया कानून की तारीफ करते और उसे अपनी सरकार की अहम उपलब्धि बताते थकते नहीं. हालांकि युद्ध और सजा से मुक्ति ने अफगानिस्तान को पत्रकारों के लिए दुनिया की सबसे खतरनाक जगह बना दिया है. इस कानून को पास करने में वर्षों लगे. अपेक्षाकृत बड़े अफगान मीडिया के लिए पश्चिमी देशों का समर्थन भी भ्रष्टाचार और दूसरी सरकारी कमियों को उजागर करने वाले पत्रकारों को धमकाए जाने, बंधक बनाए जाने या मारे जाने के खतरों से बचा नहीं पाया है.

स्थिति लगातार खराब हो रही है और बहुत से लोगों का कहना है कि 2009 के कानून में संशोधन से हालत और बिगडे़गी. हालांकि संशोधन अभी तक पास नहीं हुआ है, लेकिन 2009 के कानून में संशोधन कर देश की मीडिया का नियंत्रण एक मीडिया काउंसिल को सौंपने का प्रस्ताव है. 13 सदस्यों वाली काउंसिल की अध्यक्षता संस्कृति मंत्री के हाथों होगी जबकि एक धार्मिक विद्वान और नागरिक समाज के प्रतिनिधि उसके सदस्य होंगे. काउंसिल को नैतिक से लेकर कानूनी प्रक्रियाओं पर फैसले का अधिकार होगा.

वर्तमान और प्रस्तावित कानून में एक बड़ा अंतर यह है कि भविष्य में रेडियो और टेलीविजन में विदेशी प्रोग्रामिंग पर सीमाएं होंगी. भविष्य में अत्यंत लोकप्रिय तुर्की सोप ऑपेरा और बॉलीवुड फिल्मों पर रोक लग सकेगी जो महिलाओं और रोमांस पर परंपरागत अफगान समाज में मौजूद रुख से ज्यादा उदारवादी रुख दिखाते हैं. वर्तमान में विदेशी प्रोग्राम को दिखाने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि खास सरकारी मीडिया में विदेशी प्रोग्राम के प्रसारण के लिए काउंसिल की अनुमति जरूरी होगी. दूसरे मामलों में उन्हें तीस फीसदी से ज्यादा एयरटाइम नहीं मिलेगा.

काले दिनों की चिंता

अफगानिस्तान में ह्यूमन राइट्स वॉच की हीथर बार कहती हैं, "आप सोचने को मजबूर होते हैं कि क्या प्रेस का खुलापन पश्चिमी दबाव की वजह से था." मीडिया पर अंकुश लगाने की तैयारियों के बीच वे कहती हैं कि अफगानिस्तान में आजादी के लिए काले दिन आने वाले हैं.

अफगान संस्कृति मंत्री के सलाहकार जलाल नूरानी इन आरोपों से इंकार करते हैं कि सरकार अनुदारवादी तत्वों को संतुष्ट करने की कोशिश कर रही है. वे कहते हैं, "हम इस कानून को बेहतर बनाने के लिए पत्रकारों के साथ मिलकर काम करेंगे." बहुत से मीडिया कर्मी और उनके प्रतिनिधि संशोधित कानून को अस्वीकार ही नहीं कर रहे हैं बल्कि पुराने कानून में सुधार कर बेहतर कानूनी सुरक्षा देने और ज्यादा पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं.

वर्तमान कानून की एक नियमित शिकायत उसकी यह धारा है कि रिपोर्ट को इस्लाम के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए. पत्रकारों का आरोप है कि इस अस्पष्ट धारा का इस्तेमाल सरकार विभिन्न कारणों से पत्रकारों को गिरफ्तार करने और तंग करने में करती है. नई के खलवतगर का कहना है कि पत्रकार, वकील और ट्रेड यूनियन मिलकर अपना संशोधन संस्कृति मंत्रालय को सौंपेंगे.

न्यूयॉर्क का पत्रकार संगठन कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स सीपीजे के अनुसार पत्रकारों को तंग करने के लिए सजा न दिए जाने वाले देशों की सूची में अफगानिस्तान सातवें नम्बर पर है. यह उन देशों की सूची है जहां पत्रकारों की नियमित रूप से हत्या होती है और सरकार अपराधियों को पकड़ने और सजा देने में नाकाम रहती है. सीपीजे ने अप्रैल में जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि अफगानिस्तान में लक्षित हत्याओं में कमी आई है, लेकिन हत्यारों को सजा देने के मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है.

एमजे/आईबी (रॉयटर्स)

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