अपनों के इंतजार का अंत नहीं | दुनिया | DW | 28.06.2013
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दुनिया

अपनों के इंतजार का अंत नहीं

उत्तराखंड में ज्ञात इतिहास की सबसे बड़ी कुदरती आफत में 3000 लोग अब भी लापता हैं. आपदा को आए 12 दिन गुजर चुके हैं और देश भर के लोग सरकार और राहत एजेंसियों से अपनों की गुमशुदगी दर्ज करा रहे हैं.

कई लोगों के परिजन अब भी लापता हैं और तो और देहरादून में आपदा विभाग के कंट्रोल रूम मे बचाए गए लोगों की सूची में भी कोई तारतम्य और निरतंरता नजर नहीं आ रही है. जो बचा लिए गए हैं वे कहां हैं, ऐसे कई मामले भी सामने आ रहे हैं. कंट्रोल रूम के कर्मचारी कहते हैं, “जैसे जैसे हमारे पास सूचना आ रही है हम लगातार अपडेट कर रहे हैं और इस काम में कोई कोताही नहीं हो रही है. आप देख ही रहे हैं.”

राज्य के आपदा प्रबंधन और न्यूनीकरण केंद्र के निदेशक पीयूष रौतेला लिस्ट को लेकर हो रहे भ्रम के बारे में कहते हैं, “हमें जैसे जैसे नाम बताए जा रहे हैं हम अपडेट कर रहे हैं. नाम बताने वाले वे लोग हैं जिन्हें बचाया गया है और ऐसे लोग भी हमें लगातार फोन या ईमेल कर रहे हैं जिनके अपने अभी नहीं मिले हैं.”

इस बीच उत्तराखंड सरकार में सचिव और मिसिंग सेल के इंचार्ज बनाए गए अधिकारी अजय प्रद्योत का कहना है कि उन्हें विभिन्न स्रोतों से जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक तीन हजार लोग अब भी लापता हैं. अजय प्रद्योत ने कहा, “लेकिन ये आंकड़ा घट बढ़ सकता है, 27 जून तक की तो यही स्थिति है. हो सकता है तीन हजार लापता लोगों में से कुछ का पंजीकरण हो जाए यानी वे ट्रेस हो जाएं कि कहां पर हैं तो उनका नाम लापता वाली लिस्ट से हटा दिया जाएगा. ये भी हो सकता है कि और नाम इस आंकड़े में जुड़ जाएं.”

बहरहाल यही बात चिंता का सबब बनी हुई है. लोग जहां कहीं मुमकिन हो सकता है अपनों की तलाश में भटक रहे हैं. जयपुर निवासी ओमप्रकाश केदारनाथ गए बूढ़े मां बाप की फोटो लेकर पांच दिन से इधर उधर भटक रहे हैं. ओमप्रकाश कहते हैं, “मां पिताजी का कोई पता नहीं चल रहा. पिताजी का नाम बचाए गए लोगों की लिस्ट में था, लेकिन वो कहां लाए गए हैं ये कोई नहीं बता पा रहा.” इस बारे में आपदा कंट्रोल के कर्मचारी कहते हैं कि लाए गए लोग देहरादून के सहस्त्रधारा हैलीपैड और जौलीग्रांट एयरपोर्ट लाए जा रहे हैं. लेकिन क्या वहां पर कोई अंतिम निकासी सूची बन रही है तो इस पर वे लाचारी जता देते हैं. पश्चिम बंगाल, राजस्थान, तमिलनाड, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र आदि कई राज्यों के छोटे बड़े अधिकारियों की टीमें देहरादून मे डेरा डाले हुए हैं और बचाव कार्य का मुआयना कर रही हैं. कंट्रोल रूम में आ रही सूची से अपने यहां के लापता लोगों का मिलान कर रही हैं.

सेना ने भी अपनी वेबसाइट में बचाए गए लोगों के नाम और लोकेशन दर्ज की है लेकिन कई लापता लोगों के नाम उनकी लिस्ट में भी नहीं हैं. बहरहाल आने वाले दिनों में एक बड़ी चुनौती होगी कि उत्तराखंड सरकार और उसका राहत तंत्र लापता लोगों के बारे में कोई आधिकारिक सूचना दे कि वे आखिर हैं कहां, हैं भी या नहीं. सरकार का कहना है कि बचाव का काम पूरा होने तक इस बारे में कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की जा सकती. तो ये काम कब पूरा होगा. इस पर आला अधिकारी कहते हैं, “सब कुछ मौसम पर निर्भर करता है, एक लाख से ज्यादा लोग निकाले जा चुके हैं और तीन हजार और बचे हैं. मौसम ने अनुमति दी तो दो दिन मे सबको निकाल लिया जाएगा.”

मौसम विभाग देहरादून के निदेशक आनंद शर्मा पल पल की सूचना दे रहे हैं और उनके मुताबिक, “मौसम पहले के मुकाबले आने वाले दिनों में अपेक्षाकृत बेहतर होगा और राहत के काम चलाए जाने में मुश्किल नहीं आनी चाहिए.”(कुदरती आफत के बाद सेना की मदद)

अमरनाथ की यात्रा को श्रद्धालु निकल पड़ें हैं इधर केदारनाथ में मरघट सा सन्नाटा है. धाम की सफाई के लिए राज्य सरकार की मंदिर समिति की एक टीम शनिवार को जा रही है. बताया जा रहा है कि मंदिर परिसर में और गर्भगृह में काफी मलबा पड़ा हुआ है. कुछ लाशें भी मलबे में दबी हो सकती हैं. कुछ लाशों का दाह संस्कार बुधवार और बृहस्पतिवार को पुलिस टीम की देखरेख में केदारधाम में ही कर दिया गया है. एहतियात बरता जा रहा है कि इलाके में संक्रमण न फैले. सरकार का तो दावा है कि “महामारी या संक्रमण फैलने की कोई सूचना नहीं है और व्यवस्था चाक चौबंद हैं लेकिन स्थानीय सूत्रों की मानें तो कुछ इलाकों में लोग डायरिया से पीड़ित हैं.”

उत्तराखंड में हालात फिलहाल विकट हैं और एक के बाद एक नई चुनौतियां और मुश्किलें सामने हैं. लापता लोगों की बात हो या बीमारी फैलने की आशंका या भूख से बेहाल लोगों की या बरबाद हो चुके गांवों के पुनर्वास की, उत्तराखंड में एक नई लड़ाई का वक्त है.

रिपोर्टः शिवप्रसाद जोशी, देहरादून

संपादनः एन रंजन

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