अति शक्तिशाली चुंबकों से बन सकेगा ″धरती पर सूर्य″ | दुनिया | DW | 10.09.2021
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दुनिया

अति शक्तिशाली चुंबकों से बन सकेगा "धरती पर सूर्य"

दो अलग अलग टीमों ने अति शक्तिशाली चुम्बकें बनाई हैं जिनसे न्यूक्लियर फ्यूजन को ऊर्जा के एक स्त्रोत के रूप में विकसित करने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाया जा सकेगा.

दुनिया के अलग अलग कोनों में काम कर रही ये टीमें ऊर्जा के एक ऐसेस्त्रोत पर काबू पाने की कोशिश कर रही हैं जिसकी जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में काफी महत्वपूर्ण भूमिका है. नौ सितंबर को दक्षिणी फ्रांस स्थित अंतरराष्ट्रीय थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिऐक्टर (आईटीईआर) के वैज्ञानिकों को एक बेहद शक्तिशाली चुंबक का पहला हिस्सा प्राप्त हुआ.

चुंबक इतनी शक्तिशाली है कि उसे बनाने वाली अमेरिकी कंपनी का दावा है कि वो एक विमानवाहक जहाज तक को उठा सकती है. जब इसके सभी हिस्सों को जोड़ दिया जाएगा तब यह लगभग 60 फुट लंबी होगी और इसका 14 फुट का व्यास होगा. यह चुंबक न्यूक्लियर फ्यूजन पर पूरी तरह से निपुणता हासिल करने के 35 देशों की कोशिशों का एक बेहद जरूरी हिस्सा है.

फिशन बनाम फ्यूजन

इसके अलावा एक और निजी कंपनी ने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के साथ इसी सप्ताह घोषणा की कि उन्होंने दुनिया की सबसे मजबूत ऊंचे तापमान वाली सुपरकंडक्टिंग चुंबक का सफलतापूर्वक परीक्षण कर लिया है. इस चुंबक की मदद से यह टीम "धरती पर सूर्य" बनाने की रेस में आईटीईआर को पीछे छोड़ देगी.

Frankreich ITER Kernfusionsreaktor

दक्षिणी फ्रांस में आईटीईआर के निर्माण स्थल पर बना असेंबली हॉल

मौजूदा फिशन रिऐक्टर रेडियोऐक्टिव कचरे का भी उत्पादन करते हैं और कभी कभी तो उनकी वजह से विनाशकारी दुर्घटनाएं हो जाती हैं. इसके विपरीत फ्यूजन की वकालत करने वाले कहते हैं कि उससे बिजली की स्वच्छ और असीमित आपूर्ति मिल सकती है. हां, इसके लिए पहले इसे नियंत्रण में लाना जरूरी है. वैज्ञानिक और इंजीनियर लगभग पिछले 100 सालों से इस समस्या पर काम कर रहे हैं.

अणुओं के विभाजन की जगह फ्यूजन में एक ऐसी प्रक्रिया की नकल करने की कोशिश की जाती है जो सितारों के अंदर प्राकृतिक रूप से होती है. इसमें हाइड्रोजन के दो अणुओं को मिला कर हीलियम का एक अणु बनाया जाता है. ऐसा करने पर बड़ी मात्रा में ऊर्जा भी उत्पन्न होती है.

लेकिन फ्यूजन को हासिल करने के लिए अकल्पनीय मात्रा में गर्मी और दबाव चाहिए होता है. इसे हासिल करने का एक तरीका तो यह है कि हाइड्रोजन को बिजली से चार्ज की हुई एक गैस या प्लाज्मा में बदल दिया जाए जिसे उसके बाद डोनट के आकार के एक वैक्यूम चेंबर में नियंत्रित कर लिया जाए.

2026 में शुरुआत का लक्ष्य

ऐसा करने के लिए शक्तिशाली सुपरकंडक्टिंग चुंबकों की जरूरत पड़ती है. ऐसी ही एक चुंबक 'सेंट्रल सोलेनॉयड' को जनरल एटॉमिक्स कंपनी ने इसी साल गर्मियों के दौरान अमेरिका के सान डिएगो से फ्रांस भेजना शुरू किया. वैज्ञानिकों का कहना है कि आईटीईआर अब 75 प्रतिशत पूरा हो चुका है और रिऐक्टर को 2026 की शुरुआत तक चालू कर देना का लक्ष्य रखा गया है.

Frankreich, Saint-Paul-les-Durance | Kernfusion Forschung

मैगनेटों को जिस वैक्यूम चेंबर में रखा जाएगा उसका निचला सिलिंडर

आईटीईआर की प्रवक्ता लबान कोब्लेंट्ज ने बताया, "हर अहम टुकड़े के पूरा होने के साथ हमारा यह विश्वास बढ़ता जाता है कि हम पूरी मशीन की पेचीदा इंजीनियरिंग को पूरा बना सकते हैं." अंतिम लक्ष्य है प्लाज्मा को गर्म करने के लिए जितनी ऊर्जा चाहिए उससे 10 गुना ज्यादा ऊर्जा 2035 तक बना लेना. इससे साबित हो जाएगा कि फ्यूजन तकनीक व्यवहार्य है.

इस रेस में मैसाचुसेट्स की टीम इस टीम को हरा देनी की उम्मीद कर रही है. उसका कहना है कि वो आईटीआर के चुंबकीय क्षेत्र से दोगुना ज्यादा बड़ा क्षेत्र बना चुकी है और ऐसा उसने एक ऐसी चुंबक की मदद से किया है जो आईटीईआर की चुंबक से करीब 40 गुना कम छोटी है.

एमआईटी और कॉमनवेल्थ फ्यूजन सिस्टम्स के वैज्ञानिकों ने बताया कि संभव है 2030 के दशक की शुरुआत में ही वो एक ऐसा उपकरण बना लें जिसका रोजमर्रा में इस्तेमाल किया जा सके.

सीके/एए (एपी)

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