अंडरवर्ल्ड और बॉलीवुड का रिश्ता | मनोरंजन | DW | 19.04.2013
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मनोरंजन

अंडरवर्ल्ड और बॉलीवुड का रिश्ता

हिन्दी फिल्मों में डर बिकता है. परंपरा, मर्यादा, कानून और दिल या बदन टूटने के डर और उनसे बचने के तरीकों ने बॉलीवुड को हजारों कहानियां दीं पर इस डर में अंडरवर्ल्ड की हिस्सेदारी है यह संजय दत्त की गिरफ्तारी ने बताया.

संजय दत्त की ही नाम फिल्म का विलेन परेश रावल जब हांग कांग की ऊंची इमारत से कहता है, "जुर्म का यह रास्ता वनवे ट्रैफिक है" तो खून ठंडा पड़ने लगता है. यह सच्चाई के बेहद करीब थी. अंडरवर्ल्ड की ऐसी तस्वीर आम तौर पर फिल्मों में नहीं दिखती, बल्कि उन्हें ग्लैमर से जोड़ दिया जाता है.

दत्त सिर्फ फिल्मों में ही नहीं, असल जिंदगी में भी अंडरवर्ल्ड से जुड़े मिले. इसने दिखा दिया कि हिन्दी सिनेमा के पर्दे पर जितना अपराध दिखता है मायानगरी की असल दुनिया में उसकी भूमिका उससे कहीं ज्यादा है. गिरफ्तारी तो महज शुरुआत थी इसके बाद तो एक एक कर कड़ियां खुलती गईं और नए नए नाम सामने आने लगे. लोगों को पता चलने लगा कि कलाकारों को काम सिर्फ हुनर और सफलता से नहीं, बल्कि अंडरवर्ल्ड के रिश्तों से भी मिलता है. नायक नायिका का ऑडिशन स्टूडियो में नहीं अपराधियों के बंगलों पर भी होता है. हर गुजरते दिन के साथ अंडरवर्ल्ड के कदमों की छाप गहरी होकर उभरती गई.

यह वो वक्त था जब हिंदी फिल्मों को पैसों की जरूरत पूरी करने के लिए इधर उधर हाथ पसारना पड़ता था. उधर अंडरवर्ल्ड को कमाई के इस खूबसूरत बाजार का शौक तो पहले से ही था. जरूरत के पता चलने और भारी मुनाफे की उम्मीद ने उनमें लगाव भी पैदा कर दी. फिर शुरू हुआ दोनों की गलबहियों का दौर. कहीं बात से बात बनी तो कहीं आपसी लेन देन से और जहां दोनों काम न आया वहां डर ने अपना असर दिखाया. मायानगरी पर अपना दबदबा हासिल करने की फिराक में लगे अंडरवर्ल्ड को धमकी, जबरन वसूली, यहां तक कि हत्या से भी परहेज नहीं था. कैसेट किंग गुलशन कुमार की जान गई तो अनुपम खेर, हृतिक रोशन और कुछ दूसरे बड़े कलाकारों को पुलिस के पास सुरक्षा मांगने जाना पड़ा.

चमक पर चमक

अंडरवर्ल्ड की पार्टियां फिल्मी सितारों से चमकने लगीं. अपराध की दुनिया को बॉलीवुड की कमाई और जगमगाती शोहरत दोनों में हिस्सेदारी चाहिए थी, वैसे भी सितारों से नजदीकी भारत में हर किसी को लुभाती है. विख्यात फिल्म आलोचक और लंबे समय से मुंबई फिल्म उद्योग पर नजर रख रहे अजय ब्रह्मात्मज कहते हैं, "फिल्मी सितारों के साथ उठना बैठना चाहे राजनेता हों, अंडरवर्ल्ड, रसूख वाले या आम लोग, हर किसी को लुभाता है. जो दबाव डाल कर नहीं बुला सकते वो पैसे दे कर बुलाते और अंडरवर्ल्ड अपनी ताकत के कारण जब चाहे हाथ मरोड़ कर बुला लेता. ऐसी जगहों पर कोई सितारा राजी खुशी नहीं जाता था."

बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड का यह रिश्ता इतना गहरा और असरदार हो गया कि महज फिल्म के कलाकार और किरदार ही नहीं, बल्कि कई बार कहानियां भी तय करने की मांग करता. हालांकि ज्यादातर मामलों में उन्होंने कंटेट में दखल तभी दिया जब किसी गैंगस्टर की छवि जैसी कोई बात हुई. ब्रह्मात्मज बताते हैं, "फिल्मों में अगर खलनायक का कोई चरित्र होता तो उसे कैसे दिखाया जाए यह तय करने में वो मदद कह लें या दखलंदाजी, करते थे, आम तौर पर कंटेंट में उनकी कोई भूमिका नहीं होती थी उनकी नजर मुनाफे पर होती थी या फिर उस ग्लैमर में जो किसी स्टार के साथ रहने से उन्हें मिलता था."

Ajay Brahmatmaj Filmkritiker Indien

अजय ब्रह्मात्मज

सच्चाई से दूर

लंबे समय तक अंडरवर्ल्ड का पैसा मुंबइया फिल्मों का हिस्सा रहा और उस पर आरोप लगे कि वह अपराध जगत की ऐसी तस्वीर नहीं दिखाता, जो असलियत के करीब हो. सच्ची कहानियों पर बनी कुछ इक्का दुक्का फिल्मों ने कोशिश जरूर की लेकिन उनकी गिनती अंगुलियों पर ही हो जाएगी. हर दूसरी या तीसरी फिल्म में कानून तोड़ने वालों की बात करने वाले हिन्दी सिनेमा में अंडरवर्ल्ड पर कुछ फॉर्मूला टाइप फिल्में ही दिखती हैं.

नाइंसाफी, गरीबी और जुल्म के शिकार नायक नायिका का बंदूक उठाना पर्दे पर इतना वाजिब और स्वाभाविक बना कर पेश किया गया है कि उनसे डर की बजाय हिम्मत और उत्साह का वातावरण बनता रहा. यह दौर बहुत लंबे समय तक कायम रहा. ब्रह्मात्मज बताते हैं, "सबसे पहले सत्या में और फिर कई और फिल्मों में एक गैंगस्टर के प्यार, परिवार और दूसरे मानवीय पक्षों को दिखाया गया जिसे मैं सही नहीं मानता. अपराध, अपराध होता है उसके मानवीय पक्ष को उभारना गलत है."

अंडरवर्ल्ड से आजादी

अपराध जब हद से आगे बढ़ा तो उसके भी पांव उखड़ने शुरू हुए. एक तरफ मुंबई बम धमाकों के बाद दाऊद और उसके गुर्गों को मुंबई छोड़नी पड़ी तो दूसरी तरफ देश भर में फिल्म और अंडरवर्ल्ड के रिश्तों पर कड़ी प्रतिक्रिया देख सरकार और पुलिस को हरकत में आना पड़ा. बॉलीवुड के लेन देन पर निगाह रखी जाने लगी और सितारों के लिए ऐसे लोगों से पीछा छुड़ाना आसान होने लगा. सफलता के शॉर्टकट बिखरने लगे. फिल्म को उद्योग का दर्जा मिला और बैंकों ने कर्ज देना शुरू कर दिया. नतीजा यह कि निजी देनदारों पर फिल्मकारों की निर्भरता खत्म हो गई या घट गई. इनकी बजाय उन लोगों की मुसीबतें बढ़ने लगी जो अंडरवर्ल्ड का पैसा इस्तेमाल कर रहे थे. मशहूर हीरा कारोबारी और फिल्म फाइनेंसर भरत शाह का भरी अदालत में कान पकड़ कर गवाही देना भला कौन भूल सकता है.

नई सदी की शुरुआत से थोड़ा पहले से ही एक बड़ा बदलाव देश की अर्थव्यवस्था भी ला रही थी जिसमें उदारवाद की टॉनिक ने अब अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था. वाजिब तरीकों से पैसा कमाना आसान हो गया और मध्यमवर्ग का दायरा बढ़ने लगा. फिल्मों के लिए भी कमाई के नए रास्ते खुलने लगे. लगान की सफलता के बाद विदेशों में फिल्में रिलीज होने लगीं और विदेशों में वितरण का अधिकार फिल्मों के लिए बड़े मौके ले कर आया. सिर्फ इतना ही नहीं टीवी चैनलों की बाढ़ ने भी उनके लिए पैसे कमाने के रास्ते खोले और अब सचमुच बॉलीवुड को अंडरवर्ल्ड की जरूरत नहीं रह गई थी. अब चोरी छुपे कहीं कोई अपनी किस्मत से खेल रहा हो तो और बात है लेकिन आमतौर पर माना जाता है कि बॉलीवुड अब अंडरवर्ल्ड से आजाद है और फिल्मों के बदलते मिजाज ने भी यह साबित करना शुरू कर दिया है.

रिपोर्टः निखिल रंजन

संपादनः अनवर जे अशरफ

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