अंगदान की मिसाल: 20 महीने की बच्ची बचा गई कई जानें | भारत | DW | 15.01.2021
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भारत

अंगदान की मिसाल: 20 महीने की बच्ची बचा गई कई जानें

सिर पर लगी गंभीर चोट से जिसके जीवन का अंत हो गया, 20 महीने की उस बच्ची धनिष्ठा के माता-पिता ने उसके अंगों का दान कर कई जिंदगियां बचा लीं. भारत में अभी भी अंगदान कम ही होता है और बच्चों के शव का अंगदान तो काफी दुर्लभ है.

धनिष्ठा आठ जनवरी को दिल्ली के रोहिणी स्थित अपने घर में खेलते खेलते बालकनी से नीचे गिर गई थी. नीचे गिरने की वजह से उसे सिर पर गंभीर चोट आई. उसके माता-पिता उसे सर गंगा राम अस्पताल ले गए लेकिन चोट इतनी गंभीर थी कि डॉक्टर उसकी जान नहीं बचा सके. 11 जनवरी को 20 महीने की धनिष्ठा को दिमागी तौर पर मृत घोषित कर दिया गया.

धनिष्ठा की मां बबिता ने एक साक्षात्कार में बताया है कि अपने दुख की घड़ी में उन्होंने अस्पताल में देखा कि कई माता-पिता अपने बीमार बच्चों के लिए अंगदान करने वालों के इंतजार में तड़प रहे थे. तब उन्होंने और उनके पति ने निर्णय लिया कि उन्हें जो दर्द मिला है वो कुछ दूसरे लोगों को उस दर्द से बचा सकते हैं.

तब उन्होंने अपनी बेटी के अंगों को दान करने का निश्चय किया और अस्पताल के सहयोग से यह काम पूरा किया. जिन लोगों को धनिष्ठा के अंग मिले उनमें यमन का रहने वाला एक पांच महीनों का बच्चा भी है, जिसका ह्रदय जन्म-दोष की वजह से काम करना बंद चुका था. दिल्ली के ही इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में धनिष्ठा के ह्रदय का उस यमनी बच्चे के शरीर में सफलतापूर्वक प्रतिरोपण कर दिया गया.

इसी तरह धनिष्ठा के कलेजे को एक नौ महीने के बच्चे के शरीर में प्रतिरोपित किया गया, उसके गुर्दों को एक 34-वर्षीय व्यक्ति के शरीर में प्रतिरोपित किया गया और उसकी आंखों के कॉर्निया के टिशू को भी भविष्य में इस्तेमाल के लिए संभाल कर रख लिया गया है.

धनिष्ठा की मां का कहना है कि वो इस बात से खुश हैं कि उनकी बच्ची ने इतने लोगों को जीवन दिया और वो अभी भी उन सब के अंदर जिंदा है. बबिता ने दूसरे लोगों से भी अपील की है कि वो अंगदान को लेकर रूढ़िवादी सोच से आगे बढ़ें, अंगदान करें और उनकी बेटी की तरह दूसरों का जीवन बचाएं.

आवश्यक है अंगदान

डॉक्टरों का कहना है कि भारत में विशेष रूप से इतने छोटे बच्चों में ह्रदय प्रतिरोपण बहुत दुर्लभ है और इसका मुख्य कारण है छोटे बच्चों के शवों के अंगों को दान करने वाले लोगों की कमी. एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर साल 15,000 से 20,000 बच्चों को ह्रदय प्रतिरोपण की जरूरत होती है.

इसके अलावा ह्रदय को मृतक के शव से निकाल लेने के बाद उसे चार घंटों के अंदर एक नए शरीर में प्रतिरोपित कर देना आवश्यक होता है क्योंकि शरीर से निकाले जाने के बाद अंग खराब होने लगते हैं. इस मामले में धनिष्ठा के ह्रदय को अपोलो अस्पताल जल्द से जल्द पहुंचाने के लिए दोनों अस्पतालों के बीच एक ग्रीन गलियारा बनाया गया. इसमें ट्रैफिक पुलिस अंग के मूल स्थान से गंतव्य तक ऐसी व्यवस्था कर देती है कि अंग ले जा रहे वाहन को कहीं भी रुकना नहीं पड़ता.

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