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जोड़ने या तोड़ने वाले मोदी

१४ सितम्बर २०१३

भारतीय जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिया. बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेता एलके आडवाणी मौजूद नहीं थे.

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तस्वीर: Sam Panthaky/AFP/Getty Images

इस साल दिल्ली, राजस्थान, मेघालय, मिजोरम और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. लालकृष्ण आडवाणी की दलील थी कि इन चुनावों से पहले मोदी के नाम की घोषणा करना पार्टी के हित में नहीं होगा, लेकिन इस बिंदु पर वह पार्टी में अकेले पड़ गए. तीन महीने पहले भी वह नरेंद्र मोदी को पार्टी की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के मुद्दे पर अलग-थलग पड़ गए थे. उन्होंने अपना विरोध जताने के लिए पार्टी के सभी पदों और समितियों से इस्तीफा दे दिया लेकिन अन्य नेताओं के मनाने पर उसे वापस भी ले लिया था. इस बार हालांकि वह टस से मस नहीं हुए. न केवल उन्होंने संसदीय बोर्ड की बैठक का बहिष्कार किया बल्कि पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को एक पत्र लिखकर उनकी कार्यशैली से भी अपनी नाराजगी को सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर दिया.

राजनीतिक विश्लेषक इसे वाजपेयी-आडवाणी युग का अंत मान रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि आडवाणी अभी तक प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं और इसलिए नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहे हैं. इसमें कुछ सच हो भी सकता है, लेकिन यह पूरा सच नहीं लगता. अधिक संभावना इसी बात की लगती है कि आडवाणी वास्तव में मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने के संभावित राजनीतिक परिणामों के बारे में चिंतित हैं. राजनाथ सिंह की कार्यशैली से उनकी नाराजगी का भी व्यक्तिगत कम और राजनीतिक संदर्भ अधिक है. यहां यह याद रखना बहुत जरूरी है कि आडवाणी वह नेता हैं जिन्होंने ऐसी राजनीतिक रणनीति तैयार की कि भारतीय जनता पार्टी, जो 1984 के लोकसभा चुनाव में केवल दो सीटों पर सिमट कर रह गई थी, 1989 के चुनाव में 88 सीटों पर जीत हासिल कर सकी. इसके बाद 1991 में हुए चुनाव में उसे 120 सीटें और फिर 1996 के चुनाव में 161 सीटें हासिल हुईं. इतना ही नहीं वह लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. 1996 के चुनाव के पहले ही आडवाणी ने पार्टी अध्यक्ष की हैसियत से घोषणा कर दी थी कि अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे.

आडवाणी ने ऐसा इसलिए किया था क्योंकि तब तक उनकी छवि एक कट्टर हिंदुत्ववादी नेता की बन चुकी थी. बीजेपी अपने बलबूते पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी और उसे अन्य दलों के समर्थन की जरूरत थी. यह समर्थन सामान्य स्थिति में उन्हें मिलना संभव नहीं था लेकिन वाजपेयी को उम्मीदवार के रूप में पेश करके मिल सकता था, और वही हुआ भी. आज भी बीजेपी वैसी ही परिस्थिति में है. नरेंद्र मोदी पर गुजरात के मुस्लिम विरोधी दंगों का दाग लगा हुआ है और उनकी छवि आडवाणी से कहीं अधिक कट्टर हिंदुत्ववादी की है. गुजरात में पार्टी के नेता और सरकार में शामिल मंत्री उनकी असहिष्णुता और तानाशाहीपूर्ण कार्यशैली से परेशान हैं. ऐसे में चुनाव के बाद यदि बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, (पूर्ण बहुमत मिलने की कोई स्पष्ट संभावना फिलहाल नजर भी नहीं आ रही) तो मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए अन्य दलों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी.
कुछ ही समय पहले मोदी के मुद्दे पर ही पार्टी का बहुत पुराना सहयोगी दल जनता दल (यू) उसका साथ छोड़ गया. इस समय राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन में उसके साथ केवल शिवसेना और अकाली दल (बादल) ही बचे हैं. यदि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने में सफल हो भी गई पर अन्य दलों का समर्थन नहीं मिलने के कारण सरकार नहीं बना पाई, तो यह एक बहुत बड़ा राजनीतिक धक्का होगा. आडवाणी की प्रमुख चिंता यही लगती है. उनके निकट सहयोगी रह चुके सुधीन्द्र कुलकर्णी ने तो स्पष्ट कहा है कि मोदी ने तो भाजपा के भीतर ही ध्रुवीकरण और विभाजन कर दिया है और ऐसा ही वह देश में भी करेंगे. प्रधानमंत्री पद के लिए ऐसा व्यक्ति ही उपयुक्त है जिसका व्यक्तित्व देश के विभिन्न वर्गों और समुदायों को बांटने वाला नहीं, बल्कि जोड़ने वाला हो.

BJP Lal Krishna Advani 24.05.2012
तस्वीर: picture-alliance/AP

अगर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी आने वाले चुनाव में 2009 में जीती सीटों से ज्यादा सीटें न जीत पाई, या यह संख्या कम हो गई, तो यह मोदी और भाजपा के लिए बहुत बड़ा झटका होगा. इस स्थिति में आडवाणी एक बार फिर अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं. इसलिए अभी से यह कहना कि आडवाणी युग का अंत हो गया है, जल्दबाजी होगी. आडवाणी की एक चिंता और भी है. वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी जब पार्टी चला रही थी, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका केवल सलाहकार की थी. वह पार्टी पर अपने निर्देश थोपता नहीं था. लेकिन 2005 में यह स्थिति बदलने लगी, जब पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना के बारे में सकारात्मक टिप्पणी के बाद आडवाणी पार्टी में पहली बार अकेले पड़े. तब संघ के दबाव के कारण ही उन्हें इस प्रकरण के शांत होने के कुछ समय बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा था. नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी की घोषणा के पीछे संघ की सीधी-सीधी भूमिका रही है और आडवाणी को पार्टी के कामकाज में संघ का सीधा हस्तक्षेप वांछनीय नहीं लगता.

बीजेपी के मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज जैसे वरिष्ठ नेता भी मोदी के पक्ष में नहीं थे. उनके अंतिम क्षण में पाला बदलने से भी यह आशंका समाप्त नहीं होती कि कार्यकर्ताओं का उत्साहपूर्ण समर्थन प्राप्त होने के बावजूद मोदी को सभी नेताओं का हकीकत में वैसा ही समर्थन मिलेगा. मोदी की निरंकुश कार्यशैली के कारण नेताओं के मन में यह संदेह है कि यदि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद मोदी प्रधानमंत्री बन गए, तो उनके अधीन काम करना आसान नहीं होगा.

ब्लॉगः कुलदीप कुमार, नई दिल्ली
संपादनः आभा मोंढे