1. कंटेंट पर जाएं
  2. मेन्यू पर जाएं
  3. डीडब्ल्यू की अन्य साइट देखें

एस्टेरॉयड के अंदर क्या है

५ फ़रवरी २०१४

556 दिन में इटोकावा नाम का एक आकाशीय पिंड धरती के नजदीक आने वाला है. वैज्ञानिकों ने इसके ढांचे के बारे में एक राजफाश किया है.

https://p.dw.com/p/1B3C1
तस्वीर: Akihiro Ikeshita

दोहरी संरचना वाली आकाशीय मूंगफली- पहली बार ऐसा हुआ है कि खगोल विज्ञानी 600 मीटर लंबे क्षुद्रग्रह के अंदर तक देख सके हैं. इटोकावा नाम का यह आकाशीय पिंड दो टुकड़ों की टक्कर से बना लगता है, जिसका एक हिस्सा ग्रेनाइट जैसा कड़ा है और दूसरा हिस्सा एकदम रेत के ढेर जैसा. अंतरराष्ट्रीय शोध टीम की दलील है कि इसी संरचना के कारण यह बहुत तेजी से घूमता है. इससे पहले कभी खगोलविज्ञानी एस्टेरॉयड के भीतर नहीं झांक सके थे, वो इसकी अंदाजन मोटाई ही बता पाते थे.

जमा किए गए डेटा से पता तलता है कि इटोकावा के छोटे हिस्से की मोटाई 2850 किलोग्राम प्रति घनमीटर है जबकि सबसे बड़े हिस्से की मोटाई सिर्फ 1750 किलोग्राम प्रति घनमीटर है. यह बहुत कसकर ठूंसे गए रेत जैसा है. केंट यूनिवर्सिटी के स्टेफन लोरी ने बताया, "पहली बार हम पता लगा सके हैं कि क्षुद्रग्रह के अंदर क्या होता है." इससे सौरमंडल में मिलने वाले पत्थरों के बारे में ज्यादा जानकारी मिल सकेगी. साथ ही धरती से टकराने के खतरे वाले एस्टेरॉयड से बचाव भी संभव हो सकेगा.

अगर क्षुद्रग्रह छोटा और अनियमित ढांचे वाला हो तो सूरज की रोशनी का असर उसके घूर्णन पर पड़ता है. शोधकर्ताओं ने बताया कि ये फोटोन सोख लेते हैं जो ऊष्मा के रूप में बाहर आते हैं. अनियमित आकार के कारण अलग अलग जगह से ये अलग अलग तीव्रता के साथ होता है. इसका असर बहुत छोटा होता है लेकिन इसके कारण लगातार चक्कर चलता है, इसे योर्प (यारकोवस्वस्की ओ कीफ राडजिव्स्की पाडाक) इफेक्ट कहा जाता है.

इस वजह से एक साल में इटोकावा के पूरे चक्कर की अवधि 45 मिलीसेकंड से कम हुई है. जर्मन शहर गोएटिंगन में सौरमंडल पर शोध करने वाले माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट का कहना है कि इसका पता लगाने के लिए 2001 से 2013 के बीच के दस डेटा रिकॉर्डों की जरूरत पड़ी. इन 11 सालों के दौरान अमेरिका, स्पेन और चिली में लगे आठ टेलिस्कोपों के जरिए इस एस्टेरॉड की रोशनी में अंतर देखा गया. इन आंकड़ों को एस्टेरॉयड की ऊष्मा को लेकर सैद्धांतिक गणनाओं से मिलाया गया. एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोफिजिक्स नाम की पत्रिका में प्रकाशित इस शोध में म्यूनिख का संस्थान ईएसओ और ब्रिटेन की केंट यूनिवर्सिटी भी शामिल थे.

पहली बार 2005 में इटोकावा को जापानी अंतरिक्ष यान हायाबुसा ने नापा था और इसी के साथ इसका पदार्थ भी धरती पर परीक्षण के लिए आया. हालांकि एस्टेरॉयड के ऊपरी हिस्से के बारे में अभी भी पता नहीं लग सका है. अब 556 दिन में इटोकावा धरती का चक्कर काटने वाला है और इसी के साथ वह पृथ्वी के पास चक्कर काटने वाले ग्रहिकाओं में शामिल हो जाएगा.

एएम/एमजी (डीपीए)

इस विषय पर और जानकारी को स्किप करें

इस विषय पर और जानकारी