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तो न लादेन होता, न अफगान जंगः मुशर्रफ

२४ अक्टूबर २०१०

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ का मानना है कि अफगानिस्तान युद्ध टल सकता था. उन्होंने 9 साल से चल रही इस जंग के लिए अमेरिका की जिद को जिम्मेदार ठहराया है और अपने हाथ झाड़ लिए हैं.

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परवेज मुशर्रफतस्वीर: AP

पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक मुशर्रफ ने कहा कि अगर अमेरिका अफगानिस्तान में तालिबान के शासन को मान्यता दे देता तो वहां जंग टल सकती थी.

मुशर्रफ ने कहा, "मैंने हमेशा कहा कि हमें एक अलग रणनीति बनानी होगी. हमें तालिबान को मान्यता देनी होगी और उन्हें भीतर से बदलने की कोशिश करनी होगी." अमेरिका और अन्य विदेशी ताकतों पर जंग की जिम्मेदारी डालते हुए उन्होंने कहा, "हम इस ओसामा बिन लादेन नाम की परेशानी को भी सुलझा सकते थे. बल्कि यह तो पैदा ही न हुई होती."

पाकिस्तान परवेज मुशर्रफ के शासन के दौरान ही अफगान युद्ध में अमेरिका का सबसे बड़ा सहयोगी बना. लेकिन अब मुशर्रफ को लगता है कि युद्ध टाला जाना चाहिए था. वह कहते हैं कि दुनिया को तालिबान के शासन को मान्यता देनी चाहिए थी. उन्होंने कहा कि इससे न सिर्फ जंग टलती बल्कि बामियान में बुद्ध की मूर्तियों को भी बचाया जा सकता था.

मुशर्रफ ने कहा, "अगर वहां अमेरिकी मिशन समेत 18 मिशन होते तो हम बुद्ध की मूर्तियों को बचा सकते थे." मुशर्रफ टेक्सस की एशिया सोसाइटी में बोल रहे थे.

तालिबान ने मार्च 2001 में बामियान में बुद्ध की विशाल मूर्तियों को तोड़ डाला था. उनका मकसद मुल्क से गैर इस्लामी चिन्हों का सफाया करना था. मुशर्रफ ने कहा कि अब अमेरिका के समर्थन से तालिबान से बातचीत की जा रही है ताकि जंग खत्म की जा सके लेकिन अब पक्ष कमजोर है. फिर भी उन्होंने उदारवादी तालिबान के साथ बातचीत का समर्थन किया.

रिपोर्टः एजेंसियां/वी कुमार

संपादनः एन रंजन

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