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खाने की महंगाई के लिए तैयार रहे दुनिया

१९ अगस्त २०१२

अमेरिका और काले सागर के पास के सूखे खेत, भारत का कमजोर मानसून और अफ्रीका के साहेल इलाके की भूखमरी यह संकेत दे रही है कि आने वाले दिनों में दुनिया का सामना भोजन के संकट से हो सकता है.

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तस्वीर: AP

एशिया चावल की मजबूत पैदावार के दम पर इस संकट को थोड़ा दूर रख सकता है लेकिन औद्योगिक और उभरती अर्थव्यवस्थाएं संकट से बचने के लिए कीमत बढ़ाने के रास्ते पर चल रहे हैं. फ्रांसीसी किसानों के संगठन एनएनसीईए से जुड़े फिलिप पिंटा कहते हैं, "हमारे यहां का मौसम इस साल उतना अच्छा नहीं रहा है जिससे खेती को नुकसान पहुंचा है, खासतौर से अमेरिका में मक्के की और रूस में सोया की खेती को. इससे दबाव बढ़ेगा, ठीक वैसा ही जैसा 2007 और 2008 में हुआ था." 2007-08 में गेंहू और चावल की कीमतें कम पैदावार की आशंका में दोगुनी हो गई थीं. फ्रांस में भोजन उद्योग के राष्ट्रीय संगठन के प्रमुख ज्यां रेने बुइसान कहते हैं, "अनाज से जुड़े हर सामान यहां तक कि मांस की भी कीमत बढ़ेगी, जरूरी नहीं कि यह सितंबर में हो लेकिन 2013 में तो निश्चित रूप से होगा."

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तस्वीर: dapd

भारत के बारे में स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक में रिसर्च के क्षेत्रीय प्रमुख समीरन चक्रबर्ती कहते हैं, "भारत में भी सबकी नजरें खाने पीने की चीजों की महंगाई पर होंगी कि क्या खराब मानसून का असर खाने की कीमतों पर पड़ेगा." अगस्त के मध्य तक भारत में बारिश औसत से करीब 15.2 फीसदी कम रही है. ऐसे में एशिया में चावल की कीमतें आने वाले दिनों में 10 फीसदी तक बढ़ने के अनुमान लगाए जा रहे हैं क्योंकि सप्लाई घटेगी. भारत के खाद्य मंत्री के वी थॉमस ने इसी महीने संसद को बताया कि मौजूदा परिस्थितियां, "पैदावार की संभावना पर असर डाल सकती हैं और इससे जरूरी सामानों की कीमत बढ़ सकती है."

दुनिया मौसम से जुड़े अल नीनो प्रभाव को महसूस कर रही है. यह प्रकृति की ओर से एक चेतावनी की तरह है जो फिलहाल पश्चिमी प्रशांत में सक्रिय है और आशंका लगाई जा रही है कि सर्दियां आते आते यह उत्तरी गोलार्ध तक फैल जाएगा. अमेरिका के खेत 1950 के बाद अब तक के सबसे गंभीर सूखे का सामना कर रहे हैं और वहां के 48 राज्यों को भारी गर्मी वाली जुलाई ने पसीने से नहला दिया है. मक्के की पैदावार पिछले छह सालों में सबसे नीचे चली गई है. अमेरिकी कृषि विभाग का कहना है कि कम पैदावार मक्के और सोयाबीन की कीमतों को बहुत ज्यादा बढ़ा देंगी. कॉमर्त्सबैंक के कमोडिटी एक्सपर्ट ने कहा है कि बढ़ते तापमान और काले सागर के आस पास सूखे की वजह से "गेंहू की फसल काफी घट गई है और यह कमी कितनी होगी फिलहाल ठीक ठीक बता पाना मुश्किल है."

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अफ्रीका का साहेल इलाका लंबे समय से भोजन की कमी से जूझ रहा है. यहां के कुपोषित बच्चों की तादाद इस साल और ज्यादा बढ़ कर 15 लाख तक पहुंच जाने की आशंका जताई जा रही है. इसके अलावा हैजा और टिड्डियां एक बड़े संकट के रूप में सामने आ रहे हैं. राहत एजेंसी वर्ल्ड विजन ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि नाईजर, माली, चाड, मौरितानिया और सेनेगल में 1.8 करोड़ लोग खाने के समस्या से जूझ रहे हैं.

अमेरिका के कॉमोडिटी का विश्लेषण करने वाली कंपनी एजी रिसोर्स के अध्यक्ष डैन बासे ने पिछले हफ्ते कहा कि ऑस्ट्रेलिया की खेती भोजन की कमी को दूर करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है. बासे के मुताबिक, "हमें उस हरेक मीट्रिक टन गेंहू और दूसरे अनाज की जरूरत है जो ऑस्ट्रेलियाई किसान पैदा कर सकें. ऑस्ट्रेलियाई किसान पैदावार बढ़ाने के लिए जो कुछ भी कर सकते हैं वह भोजन के संकट को दूर करने में मददगार होगा." चीन में भोजन की कीमत को राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा माना जाता है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक औसत रूप से लोगों की कमाई का तीसरा हिस्सा खाने पीने में खर्च होता है. हालांकि वहां की अर्थव्यवस्था की रफ्तार थोड़ी कम हुई है लेकिन चीन ने महंगाई पर लगाम लगाई है. इस साल की पहली छमाही वहां 1.3 खरब टन अनाज पैदा हुआ है जो पिछले साल के इसी समय के मुकाबले में 2.8 फीसदी ज्यादा है.

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अमेरिकी खेती पर आए संकट की वजह से जी 20 के बड़े देशों और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने 27 अगस्त को एक बैठक बुलाई है. हालांकि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह बैठक किसी खतरे का संकेत नहीं है लेकिन इस बात की जरूरत है कि एक सहमति बनाई जाए जिससे कि पिछली बार की तरह खाने के नाम पर हुए दंगों जैसी घटना दोहराई न जाए. बैठक में शामिल होने वाले देशों की मुख्य कोशिश यह होगी कि निर्यात पर पाबंदी या अफरातफरी में जरूरत से ज्यादा आयात की कोशिशों को रोकने के लिए कुछ दिशानिर्देश तय किए जाएं. इसके साथ ही अनाज को सीधे खाने पीने की चीज के अलावा पशुओं के चारे और ईंधन पैदा करने में उसके इस्तेमाल के बीच एक संतुलन कायम किया जाए.

एनआर/एमजे (एएफपी)

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