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खतरे में बंगाली मिठाइयों का स्वाद

२ दिसम्बर २०१२

देश में चालू होने वाले फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स रेगुलेशन रूल्स, 2012 से बंगाल की मशहूर मिठाइयों का स्वाद खतरे में पड़ गया है. नए नियम में कहा गया है कि छेने की मिठाई में कोई भी और चीज नहीं मिलाई जा सकती.

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तस्वीर: DW/Prabhakar Mani

लेकिन देश-विदेश में मशहूर बंगाल के रसगुल्ले और संदेश में छेने के साथ अरारूट और काजू बादाम जैसे चीजें मिलाई जाती रही हैं. अब नए नियमों ने इनके स्वाद पर तलवार लटका दी है. इससे मिठाई निर्माता चिंतित और परेशान हैं. बंगाल में मिठाई उद्योग के साथ एक लाख से ज्यादा व्यापारी और लाखों कारीगर जुड़े हैं. मिठाइयां राज्य के सामाजिक जीवन का बेहद अहम हिस्सा हैं. पश्चिम बंगाल में छोटी से बड़ी पूजा और जन्मदिन से श्राद्ध तक कोई भी समारोह संदेश के बिना संपन्न नहीं होता.

क्या कहता है कानून

नए कानून में कहा गया है कि किसी भी मिठाई में छेने के साथ कोई अन्य चीज मिलाने पर वह मिलावट की श्रेणी में आएगा. इसके लिए मिठाई निर्माता को या तो पांच लाख रुपए का जुर्माना अदा करना होगा या फिर सात साल की सजा काटनी होगी. इन नियमों के मुताबिक, अब मिठाइयां बनाने के लिए लोहे की कड़ाही और लकड़ी की कलछुल का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकता. छेने को हाथ से मिलाने पर भी पाबंदी लगा दी गई है.

यही नहीं, कहा गया है कि 12 लाख रुपए या उससे ज्यादा का सालाना कारोबार करने वाले मिठाई दुकान मालिकों को अब माइक्रोबायोलाजिकल लैब की स्थापना करनी होगी. मिठाइयां बनाने से पहले तमाम उपकरणों को जांच के लिए इस लैब में भेजना होगा. मिठाइयां बनाने की जगह पर जल शोधन की व्यवस्था भी करनी होगी. इसके अलावा मिठाई की दुकानों, कारखानों और गोदामों के लिए लाइसेंस लेना होगा.

क्या कहते हैं मिठाई निर्माता

Indien Süßigkeiten Süßspeisen
तस्वीर: DW/Prabhakar Mani

महानगर के मशहूर सत्यनापरायणन मिष्ठान भंडार के समीर कहते हैं, "मैदा और चावल के आटे को मिलाए बिना मिठाइयों में स्वाद ही नहीं आ सकता. अब सदियों से चली आ रही इस परंपरा को क्या हम मिलावट कहेंगे ? छेने में इसे नहीं मिलाया गया तो मिठाइयों का स्वाद ही खो जाएगा." वह कहते हैं कि सरकार जबरन उक्त कानून थोप रही है. हुगली जिले में पौने दो सौ साल पुरानी मिठाई दुकान के मालिक अमिताभ मोदक कहते हैं, "नए नियम का पालन करने की स्थिति में कई मिठाइयों को बनाना ही संभव नहीं होगा. ज्यादातर मिठाइयों को बनाने में छेने को हाथ से ही मलना और मिलाना होता है. लेकिन इन नियमों में कहा गया है कि छेने को मलने के लिए मशीन का इस्तेमाल करना होगा. ऐसे में असली स्वाद भला कहां से आएगा ?"

पश्चिम बंगाल मिष्ठान व्यवसायी समिति के सदस्य शैवाल मौदक सवाल करते हैं, "छेने के साथ मैदा नहीं मिलाने पर पांतुआ या गुलाब जामुन कैसे बन सकता है ? इसी तरह रसगुल्ले को फुलाने के लिए छेने के साथ अरारूट मिलाना पड़ता है. पांच किलो छेने में महज दस ग्राम अरारूट मिलाया जाता है."

आम लोग भी नाराज

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तस्वीर: DW/Prabhakar Mani

मिठाइयों के निर्माण पर लगी इस पाबंदी से आम लोग भी नाराज हैं. एक महिला सुशीला हालदार सवाल करती हैं, "आखिर सरकार बंगाली मिठाइयों का गला घोंटने पर क्यों तुली है ? यहां की मिठाइयों देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक में मशहूर हैं. राज्य से हर साल करोड़ों रुपए की मिठाइयां विदेशों को निर्यात की जाती हैं. लेकिन अगर इनका स्वाद ही खत्म हो जाएगा तो मांग कहां बचेगी. संदेश के शौकीन रमेन भट्टाचार्य कहते हैं कि हम लोग बचपन से ही संदेश और रसगुल्ले खाते आए हैं. इनके स्वाद का कोई मुकाबला नहीं है. लेकिन अब अगर सरकार ही इनकी मिठास और स्वाद तय करने लगे तो इनका वजूद ही खत्म हो जाएगा. यह सही नहीं है."

अब मिठाई निर्माता या उनके शौकीन चाहे कुछ भी दलील दें, बंगाल की मिठाइयों का स्वाद तो खतरे में पड़ ही गया है.

रिपोर्टः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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