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'अपराधों के खिलाफ खड़ी हों महिलाएं'

३ अगस्त २०१३

भारत में आम तौर पर यह धारणा रही है कि कोई भी पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी नेताओं की मर्जी के खिलाफ काम नहीं कर सकता. लेकिन किरण बेदी ने उस धारणा को काफी हद तक तोड़ने की हिम्मत दिखाई.

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तस्वीर: picture-alliance/dpa

अपने कामकाज के तरीके की वजह से ‘क्रेन बेदी' कही जाने वाली किरण रिटायरमेंट के बाद भी विभिन्न सामाजिक मुद्दों को लगातार उठाती रही हैं. हाल में वे एक कार्यक्रम के सिलसिले में कोलकाता में थीं. उन्होंने महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों और समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर कई सवालों के जवाब दिए. पेश हैं उसके मुख्य अंशः

आपने तिहाड़ जेल के कार्यकाल के दौरान कई सुधार कार्यक्रम शुरू किए थे. उनकी प्रेरणा कैसे मिली ?

तिहाड़ जेल की पोस्टिंग को किसी पुलिस अधिकारी के लिए आम तौर पर एक सजा माना जाता है. लेकिन मैंने उसे एक चुनौती की तरह लिया और वहां कैदियों की हालत सुधारने और उनको समाज की मुख्यधारा में शामिल होने के लायक बनाने के लिए कई सुधार कार्यक्रमों की शुरूआत की. मुझे लगता है कि जेलों में सुधार के जरिए पूरे समाज को बदला जा सकता है. मैं सोच तो पहले से रही थी. लेकिन तिहाड़ की पोस्टिंग ने मुझे इन विचारों को लागू करने का सुनहरा मौका दे दिया. जेल एक ऐसा उपनगर है जो सुधारों के बिना हिंसक हो उठता है.

आप लोकपाल विधेयक के समर्थन में होने वाले आदोलन में काफी सक्रिय थीं. लेकिन अब उसकी ज्यादा चर्चा नहीं होती ?

दरअसल, इसकी वजह यह है कि पहले आम लोग भारी तादाद में इसके पक्ष में थे. लेकिन समय बीतने के साथ अब इसमें लोगों की दिलचस्पी कम हो गई है. इसी वजह से यह आंदोलन कुछ शिथिल पड़ गया है.

आपका जीवन दर्शन क्या है और इससे आपको कैसे मदद मिली है ?

मैं इस बात पर भरोसा करती हूं कि बदलाव प्रकृति का शाश्वत नियम है. इसलिए मैं हमेशा बदलाव को मानते हुए उसके साथ तालमेल बिठा कर आगे बढ़ने का प्रयास करती रही हूं. इसके अलावा मैं सजा की बजाय रोकथाम की ताकत पर भरोसा करती हूं.

Indien Indian Police Service Kiran Bedi und Anna Hazare
'राजनीति में मेरी कभी दिलचस्पी नहीं रही'- किरण बेदीतस्वीर: AFP/Getty Images

अपने कार्यकाल के दौरान की कोई यादगार घटना ?

मेरा जीवन तो ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है. लेकिन जेलों में धूम्रपान बंद करने का फैसला मेरे लिए सबसे चुनौतीपूर्ण था. धूम्रपान करने वालों ने आमरण अनशन शुरू कर दिया और आत्महत्या तक की धमकी दी. लेकिन मुझ पर उन धमकियों का कोई असर नहीं पड़ा. एक बार फैसला कर लेने के बाद मैं उसे लागू करने के प्रति पक्की थी. इसमें दस दिनों का समय लगा. तिहाड़ भारत की अकेली ऐसी जेल है जहां धूम्रपान की अनुमति नहीं है.

महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों की रोकथाम के लिए आपकी क्या राय है ?

इसके लिए सबसे पहले तो महिलाओं को खुद ही हिम्मत के साथ आगे आना होगा. अत्याचारियों के खिलाफ मुंह खोले बिना पुलिस उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकती. ऐसे में उन लोगों का मनोबल बढ़ता रहेगा. मौजूदा समय में देश के किसी हिस्से में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को आम लोगों, पुलिस और नेताओं को साथ मिल कर काम करना चाहिए.

आप विभिन्न मुद्दों पर काफी सक्रिय रही हैं. राजनीति में शामिल होने की कोई योजना ?

राजनीति में मेरी कभी दिलचस्पी नहीं रही. मैं आजीवन आम लोगों व सरोकारों से जुड़े मुद्दों के लिए संघर्ष करती रहूंगी.

रिपोर्टः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः आभा मोंढे

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