महिलाओं को टिकट देने में पार्टियों ने फिर कंजूसी दिखाई | दुनिया | DW | 02.02.2017
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दुनिया

महिलाओं को टिकट देने में पार्टियों ने फिर कंजूसी दिखाई

कहने को तो वे आधी आबादी हैं लेकिन राजनीति में जब अधिकार देने की बात आती हैं तो महिलाओं को चुनाव लड़ाने से सभी दल कतराते हैं. उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भी यही हाल दिख रहा हैं.

राजनीतिक रूप से भारत के सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश में चार प्रमुख राजनीतिक दलों ने महिलाओं को उम्मीदवार बनाने में कंजूसी बरती है.

चारों दल यानी भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस की महिला उम्मीदवारों की गिनती भी कर ली जाए तो भी ये अब तक कुल 98 होती है. मतलब 403 की कुल सदस्यों में ये अभी भी 25 प्रतिशत से कम हैं.

वहीं महिला आरक्षण बिल अपनी 20 साल की यात्रा में अभी भी केवल राज्य सभा से पारित हो सका हैं. बिल में भारत के निचले सदन लोक सभा और राज्यों की विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान हैं. पहली बार यह बिल देवेगौड़ा सरकार 1996 में लेकर आई थी.

तमाम पार्टियों का रुख इसमें विरोधी ही नजर आता हैं. कोई भी पार्टी टिकट देने में महिलाओं में ज्यादा रूचि नहीं दिखती. चुनाव के कारण इस मुद्दे को भी कोई उठाना नहीं चाहता. सबका यही राग रहता हैं कि जहां महिलाएं जीतने की स्थिति में हैं वहां टिकट दिया जा रहा हैं बाकी उनके सम्मान में कोई कमी नहीं हैं.

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फिर भी उत्तर प्रदेश में एक आशा की किरण यह भी हैं कि पिछले चुनाव में आजादी के बाद सबसे ज्यादा महिला सदस्य जीती थी. इस समय 36 महिला विधायक हैं. चार विधायकों ने सांसद बनने के बाद इस्तीफा दे दिया था. लेकिन ये गिनती भी 10 प्रतिशत का आंकड़ा नहीं छूती है.

अब जब प्रदेश में सत्रहवीं विधान सभा का चुनाव होने जा रहा हैं, तो महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने का कोई पैमाना नहीं हैं. अभी तक भाजपा ने 370 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा की हैं जिसमें 43 महिलाओं को टिकट दिया हैं. पार्टी ने बाकी बची 13 सीटों पर तीन टिकट और महिलाओं को देने का एलान किया है. भाजपा ने 20 सीटें अपने सहयोगी दलों के लिए छोड़ी हैं. कुल मिलकर भाजपा 46 महिलाओं को मैदान में उतर रही है. इसमें कई बड़े नाम भी शामिल हैं जैसे आगरा की बाह सीट से सपा छोड़ कर आईं रानी पक्षालिका सिंह, लखनऊ कैंट से कांग्रेस से आईं रीता बहुगुणा जोशी, अमेठी से राजा संजय सिंह की पहली पत्नी रानी गरिमा सिंह और भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष स्वाति सिंह. स्वाति सिंह की एंट्री पार्टी में अभी तब हुई जब उनके पति दया शंकर सिंह ने बसपा अध्यक्ष मायावती के प्रति आपत्तिजनक शब्द का कथित रूप से प्रयोग किया और बसपा ने इसको मुद्दा बना दिया.

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सपा में इस समय सबसे ज्यादा 23 महिला विधायक हैं. लेकिन पार्टी ने सिर्फ 29 महिलाओं को टिकट दिया हैं. इस बार सपा 299 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है. पार्टी की इन उम्मीदवारों में पहला नाम मुलायम सिंह की बहू अपर्णा यादव का हैं. इसके अलावा सपा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ की पूर्व अध्यक्ष ऋचा सिंह को इलाहाबाद पश्चिम से और आईएएस अधिकारी पंधारी यादव की रिश्तेदार किरण यादव को पटियाली से खड़ा किया हैं.

महिलाओं को टिकट देने के मामले में बसपा का हाल सबसे बुरा है, जबकि वहां पार्टी की कमान खुद एक महिला के हाथ में है. अब तक घोषित करीब 400 उम्मीदवारों में बसपा ने 21 महिलाओं को टिकट दिया हैं. इनमें मुख्य पूर्व सांसद कादिर राणा की पत्नी सैयदा बेगम हैं. बाकी पार्टी की ज्यादातर महिला उम्मीदवार अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों से लड़ रही हैं.

कांग्रेस वैसे तो अभी तक 105 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रही है लेकिन उसके घोषित 56 उम्मीदवारों की सूची में मात्र पांच महिलाएंहैं. इनमें राज्य सभा सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्र मोना को प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट और चित्रकूट की मानिकपुर सीट से गुलाबी गैंग की लीडर संपत पाल को उतारा गया है.

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उत्तर प्रदेश में मायावती और सुचेता कृपलानी, दो महिला मुख्यमंत्री रह चुकी हैं लेकिन वहां महिला विधायकों की संख्या अब भी बहुत कम है. मौजूदा विधान सभा में भी ज्यादातर महिला विधायक चुप ही रहती थीं. सिर्फ शादाब फातिमा (सपा) और रूबी प्रसाद (निर्दलीय) ही मुद्दे उठाने में आगे रहीं. कुछ महिलाएं जैसे पूजा पाल, रजनी तिवारी, विजमा यादव, गजाला लारी, किस्मतिया, लालमुन्नी सिंह इत्यादि विधायक बनीं, लेकिन तभी जब उनके पति जो विधायक थे और उनकी आकस्मिक मृत्य हो गयी.

आंकड़ों में देखे तो उत्तर प्रदेश में इस समय 14.12 करोड़ वोटर हैं जिनमे 4.68 करोड़ पुरुष और 6.44 करोड़ महिला हैं. मतलब लगभग 45 फीसदी महिलाएं वोटर हैं लेकिन टिकट देने में सब पार्टियाँ मिला कर दस फीसदी महिला उम्मीदवार नहीं देती हैं.

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