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दुनिया

मरीजों के रिश्तेदारों से क्यों पिटते हैं डॉक्टर?

अस्पतालों में डॉक्टरों से होने वाली मारपीट की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए केंद्र सरकार एक नया कानून बनाने पर विचार कर रही है.

मरीज और डॉक्टर का रिश्ता भक्त और भगवान जैसा पवित्र माना जाता है लेकिन जैसे जैसे चिकित्सा पेशे का विस्तार होता जा रहा है, डॉक्टरों के प्रति सम्मान की भावना में कमी आ रही है. इसके आलावा इनके साथ मारपीट की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं. आये दिन होने वाली इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए अब सरकार एक कड़े कानून पर काम कर रही है.

गैर जमानती अपराध

डॉक्टरों के साथ होने वाली मारपीट के बाद अक्सर स्वास्थ्य सेवाएं ठप्प पड़ जाती हैं क्योंकि डॉक्टर अपनी सुरक्षा को लेकर हड़ताल पर चले जाते हैं. इसका सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और कमजोर वर्ग के मरीजों को उठाना पड़ता है. इन घटनाओं में लगातार हो रही वृद्धि से चिंतित केंद्र सरकार ने इस पर एक इंटर मिनिस्ट्रियल कमेटी बनाकर ऐसे मामलों और शिकायतों की जांच करने को कहा था. कमेटी ने हाल ही में स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कुछ कड़े प्रावधानों की सिफारिश की है. अधिकतर राज्यों में पहले से ही लागू कड़े प्रावधानों को राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत कानून के जरिये लागू करने की आवश्यकता जतायी गई है. आंध्र प्रदेश सहित कुछ राज्यों में अस्पतालों के भीतर डॉक्टरों के साथ मारपीट को गैर जमानती अपराध की श्रेणी में रखा गया है. इसे राष्ट्रीय स्तर पर भी लागू किया जा सकता है. इस कमेटी में स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ साथ कानून एवं न्याय, उपभोक्ता मामलों और गृह मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल थे. इसके आलावा इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया से भी प्रतिनिधियों को शामिल किया गया था.

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हिंसा पर आईएमए की रिपोर्ट

डॉक्टर, मरीजों की जान और सेहत की रक्षा करते हैं लेकिन इस दौरान उन्हें मरीजों, मरीजों के परिजनों और दोस्तों से अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता भी सताती है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन यानी आईएमए की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में 75 फीसदी से अधिक डॉक्टर इस तरह की हिंसा सहते हैं. उन्हें मरीजों के परिजनों से खतरा महसूस होता है. आईएमए स्टडी रिपोर्ट-2015 के मुताबिक 4 में से 3 डॉक्टर ऑन ड्यूटी कहीं न कहीं शारीरिक हिंसा के शिकार हुए हैं. अधिकतर डॉक्टर इमरजेंसी सर्विस के दौरान हिंसा का शिकार होते हैं. 48 फीसदी से अधिक हिंसा के मामले आईसीयू सर्विस या सर्जरी के दौरान रिपोर्ट हुए हैं. आईएमए का यह अध्ययन चौंकाने वाला नहीं तो कम से कम आंखें खोलने के लिए काफी है.

असल वजह

हिंसा की अधिकतर घटनाओं के लिए अनावश्यक जांच या फिर मरीज को देखने में हो रही देरी को जिम्मेदार ठहराया जाता है. इमरजेंसी के दौरान डॉक्टरों द्वारा मरीज के इलाज में हो रही देरी या अस्पताल की उदासीनता हिंसा का प्रमुख कारण है. इसी तरह प्राइवेट अस्पतालों में पैसा जमा न करने पर चिकित्सा रोकना दुखी परिजनों को हिंसक बना देता है. अस्पताल प्रबंधन द्वारा डिस्चार्ज न करने या मृत्यु होने पर शव रोकने की स्थिति में भी मारपीट के मामले सामने आते रहते हैं. सरकारी अस्पतालों में मरीजों के बढ़ते दबाव और डॉक्टरों की कमी के चलते परिजनों का आक्रोश उबाल लेता है.

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समाजशास्त्री डॉ. साहेब लाल कहते हैं कि डॉक्टरों के साथ मारपीट कोई नहीं करना चाहता है, आज भी भारतीय समाज में डॉक्टरों के प्रति सम्मान की भावना है. लेकिन अस्पताल प्रशासन और कभी कभी स्वयं डॉक्टरों की तरफ से होने वाली लापरवाही मरीजों के परिजनों के गुस्से को बढ़ा देती है. आंकड़ों से पता चलता है कि 68 फीसदी से ज्यादा मामलों में मरीज की देखरेख कर रहे उसके परिजन या रिश्तेदार डॉक्टरों के साथ मारपीट करते हैं.

सिर्फ कानून काफी नहीं है

डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर ठोस कानून बनाने के बावजूद उनके साथ होने वाली हिंसा थम जाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है. अनुभवी चिकित्सक डॉ. सतीश शुक्ला कहते हैं कि कानून तो ठीक है पर डॉक्टरों को, खासतौर पर प्राइवेट अस्पतालों को, ज्यादा मानवीय दृष्टिकोण अपनाना होगा. डॉ. साहेब लाल कहते हैं कि मरीजों को, उनके परिजनों को आत्मीयता की दवा की ज्यादा जरूरत होती है. उनके अनुसार चिकित्सा सेवा से जुड़े लोगों के लिए मनोविज्ञान की व्यावहारिक ट्रेनिंग अनिवार्य होनी चाहिए. डॉक्टर सहित इस सेवा से जुड़े लोगों को मरीजों व उनके परिजनों से आत्मीय व्यवहार करना होगा और हावभाव में तत्परता लानी होगी, तब मारपीट की नौबत आएगी ही नही.

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