1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

ब्लॉग

उसके कांधे पर अपनी बीवी की नहीं व्यवस्था की लाश है

रोती बेटी के साथ मृत पत्नी की लाश कंधे पर लादकर ले जाते एक व्यक्ति की तस्वीर भारत में हंगामा मचा रही है. मानवीय संवेदना के अलावा यह तस्वीर तीन सवाल पैदा करती है.

भारतीय समाज में इंसानियत का सवाल, रोग और रोगियों के साथ पेश आने का सवाल और प्रशासनिक अकर्मण्यता का सवाल.

इंसान होने के नाते दूसरे इंसान की संवेदनाओं के प्रति हमारी संवेदना इंसानियत है. लेकिन तेजी से बदलते भारत में भावनाएं पीछे छूटती जा रही हैं, समाज अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटता दिख रहा है और दूसरों की तकलीफ कुछ समय के लिए उत्सुकता भर ही पैदा करती है. जब तक दूसरों की तकलीफ परेशान नहीं करेगी तब तक उसका सामूहिक समाधान खोजने की जरूरत भी पैदा नहीं होगी. भारत में नागरिक सुविधाएं बढ़ाने और उन्हें हर नागरिक के लिए उपलब्ध कराने के बदले लोगों पर छोड़ दिया गया है कि वे अपनी जरूरतें कैसे पूरी करें. अगर पैसा है तो जरूरतें पूरी होंगी, अगर नहीं तो इस बात की भी चिंता नहीं है कि उससे समाज को कितना नुकसान होगा.

उड़ीसा का कालाहांडी देश के सबसे गरीब जिलों में से एक है. वहीं के सरकारी अस्पताल में दीना मांझी की पत्नी की मौत टीबी से हुई. और पत्नी की लाश ले जाते मांझी की तस्वीर ठीक उस दिन छपी है जिस दिन विज्ञान पत्रिका लैंसेट यह खबर छापी है कि भारत में टीबी की संख्या उससे कहीं ज्यादा है जितने का अनुमान है. टीबी संक्रामक रोग है और टीबी की वजह से मरे इंसान की लाश को इस तरह ले जाने देना अस्पतालकर्मियों की भारी गलती है. अस्पताल में लाए जाने के साथ ही इलाज और मृत्यु की स्थिति में लाश के सही तरीके से अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी अस्पताल की होनी चाहिए.

संवेदनहीनता की एक और मिसाल, इन तस्वीरों में देखिए

तीसरा मुद्दा प्रशासनिक कमजोरियों का है. भारत के जिलों को देखें तो साफ होता जा रहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर चुने जाने वाले प्रशासनिक अधिकारी जिलों को विकास की राह पर नेतृत्व देने की हालत में नहीं हैं. स्थानीय प्रशासनिक ईकाइयों का काम नागरिकों के लिए मूलभूत सुविधाओं का इंतजाम करने के अलावा उनकी शिक्षा और रोजगार की संभावनाएं बनाना भी है. भारतीय प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ शासन कर रहे हैं, नेतृत्व नहीं दे रहे हैं. इस कमजोरी को राज्यों के स्तर पर क्वॉलिटी वाले प्रशासनिक कॉलेज खोलकर दूर किया जा सकता है, जहां के छात्र तीन साल में न सिर्फ यह सीखकर निकलेंगे कि पंचायतों, नगरपालिकाओं और जिला बोर्डों का संचालन कैसे किया जाए, बल्कि जहां स्थानीय स्तर पर यह रिसर्च और विश्लेषण भी हो पाएगा कि विकास की संरचनाएं किस तरह सुधारी जा सकती हैं और सभी नागरिकों को किस तरह बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं.

आंख मूंदने से समस्याएं खत्म नहीं होंगी. समस्याओं के समाधान के लिए ढांचा बनाने की तो जरूरत है ही, लोगों के लिए सम्मानजनक कमाई देने वाला रोजगार भी जरूरी है. और ये ऐसी चुनौती है जिसका सामना मिलजुलकर ही किया जा सकता है. एक व्यापक बहस अच्छी शुरुआत होगी.

इलाज करने वाले ही हो रहे हैं टीबी का शिकार, देखिए कैसे

DW.COM