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दुनिया

खाचे, जहां सितंबर का महीना भुखमरी का होता है

मां-बाप कमाने मुंबई जाते हैं लेकिन बच्चे भूख से मर जाते हैं. महाराष्ट्र के खाचे गांव की दर्दभरी कहानी, जहां सितंबर के महीने को लोग मौत का महीना मानने लगे हैं.

महाराष्ट्र के खाचे गांव में रहने वाली सोनी वाडवी का बेटा सोनू अभी महज एक वर्ष का ही है, लेकिन इतनी कम उम्र में ही मौत का साया सोनू को छू कर गुजर चुका है. अपने बच्चे को दूध पिलाते हुए सोनी याद करती हैं कि आज से चार महीने पहले कैसे कुपोषण के चलते सोनू की जान पर बन आई थी.

तमाम परिवारों की तरह ही इस परिवार ने भी काम के लिए महाराष्ट्र के पालघर जिले के अपने गांव को कुछ महीनों के लिए छोड़ दिया था. लेकिन जब ये वापस आए, तब सोनू काफी कमजोर था जिसके चलते उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. खुशकिस्मती से सोनू की जान तो बच गई लेकिन बीते वर्ष 2016 में अप्रैल से नवंबर के दौरान पालघर में ही कुपोषण और इससे अन्य जुड़ी बीमारियों के चलते तकरीबन 400 बच्चों की जान चली गई.

पिछले तीन सालों में पालघर के तकरीबन 1600 बच्चों की कुपोषण के चलते मौत हुई है. बेरोजगारी और गरीबी से जूझ रहे इस आदिवासी इलाके से ऐसी खबरें आने के चलते सरकार पर इस समस्या के समाधान हेतु कार्रवाई का दबाव तो पड़ा है.

खास बात यह है कि खाचे, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से महज 150 किमी की दूरी पर स्थित है और देश के सबसे संपन्न राज्यों में शुमार गुजरात से भी इसकी सीमाएं सटी हुई हैं. लेकिन इस गांव में बेरोजगारी के चलते लोग शहरों का रुख करने के लिए मजबूर हैं. आदिवासी विकास आंदोलन वयम् के संस्थापक मिलिंद थत्ते पालघर जिले के मजदूरों की इस समस्या पर हैरानी जताते हैं क्योंकि यह इलाका मुंबई से सटा हुआ है, लेकिन वह इस समस्या के लिए मुंबई की ओर होने वाले पलायन को ही जिम्मेदार मानते हैं. थत्ते के मुताबिक, "लोग काम के लिए मुंबई का रुख करते हैं लेकिन वहां रहने का खर्च बहुत अधिक है. इसलिए ये लोग पैसा बचाने के लिए खाना भी नहीं खाते."

ये ग्रामीण लोग अक्सर दिसंबर के मध्य में मुंबई से ही सटे ठाणे और भिवंडी में आने लगते हैं. यहां ये लोग अमूमन निर्माण स्थलों या सड़क परियोजनाओं के निर्माण कार्य से जुड़ जाते हैं. लेकिन मानसून में जब निर्माण कार्य रुक जाता है, तब ये मजदूर जुलाई से अक्टूबर तक के अपने खाली समय को बिताने में गांव आ जाते हैं. चूंकि यह समय गांव में फसल की कटाई का होता है, इसलिए ये लोग खेती से जुड़ जाते हैं.

यहां के स्थानीय लोग सितंबर को भुखमरी का महीना कहते हैं, क्योंकि यही वह महीना होता है जब तमाम लोग बेरोजगार होते हैं और बच्चों की मौत की घटनाएं भी इसी दौरान सबसे अधिक होती हैं. हालांकि दिसंबर की समाप्ति के साथ ही ये ग्रामीण लोग भी शहर वापसी की तैयारी करने लगते हैं. वाडवी बताती हैं कि अभी उनके पास कोई काम नहीं है और वे लोग जल्दी ही वापस जाएंगे, फिलहाल उन्हें अपने सेठ (कॉन्ट्रैक्टर) का इंतजार है, जो आकर इन्हें ले जाएगा.

हालात नहीं सामान्य

ऐसा ही एक मामला नामदेव सवारा का है. कथकारी जनजाति के नामदेव सवारा ने अपने घर के एक कमरे में दीवारों पर भगवानों और देवियों का रंगीन चित्रण किया है. बीते सितंबर इनके बेटे ईश्वर की मौत हो गई थी, जिसके बाद नामदेव ने अपने बेटे की एक तस्वीर, भगवान को समर्पित कर दीवार पर लगा दी है. उन्होंने बताया कि वह खाचे को इस साल छोड़कर नही जाएंगे और यहीं एक स्थानीय सड़क परियोजना में अपनी पत्नी के साथ काम करेंगे. यहां रह कर वे अपने अन्य दोनों बच्चों के करीब रहेंगे जो एक स्कूल में पढ़ते हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक करीब 39 फीसदी भारतीय बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और तकरीबन 42.5 फीसदी बच्चे सामान्य से कम वजन के हैं.

पालघर में कुपोषण ने कथकारी जनजाति को सबसे अधिक प्रभावित किया है. दरअसल एक ऐसा वन समुदाय है जो भारतीय जाति व्यवस्था के ताने-बाने से अब तक सबसे कम बाहर निकला है. पालघर के स्थानीय सरकारी कार्यालय की प्रमुख निधि चौधरी के मुताबिक इस साल कुपोषण और इससे जुड़ी बीमारियों से मरने वाले कुल बच्चों में से अधिकतर इसी कथकारी समुदाय से थे.

राज्य विधानसभा में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले विवेक पंडित कहते हैं, "कथकारी समुदाय के लोगों के पास अपनी जमीन नहीं है और इन्हें मेहनत वाले कामों के लिए चुना जाता है. ये अधिकतर निर्माणाधीन जगहों पर, सड़क निर्माण और ईट भट्टों में कार्य करते हैं."

नियोक्ता भी अधिकतर कथकारी जोड़ों को ही काम पर रखना पसंद करते हैं, क्योंकि ये दो आदमियों के मुकाबले अधिक बेहतर व सस्ते में काम करते हैं. पुरुषों को करीब 200 रुपये का रोजाना भुगतान होता है, वही महिलाओं को करीब 50 से 100 रुपये तक मिल जाता है. ये मजदूर चावल पर ही अधिकतर गुजर-बसर करते हैं हालांकि कभी-कभी इनके भोजन में आलू और प्याज को भी जगह मिल जाती है. इनका जोर उन महीनों के लिए पैसा बचाने पर अधिक होता है जिस दौरान इनके पास करने के लिए कोई काम नहीं होता.

कमजोर और अतिसंवेदनशील

डॉक्टरों के मुताबिक, मां-बाप दोनों के काम के घंटे बहुत अधिक होने के कारण बच्चे अनियमित खान-पान से जूझ रहे हैं. पालघर के उप-जिला अस्पताल के अधीक्षक रामदास मराड के मुताबिक, यहां मां-बाप के लिए अपने बच्चों की सेहत नहीं बल्कि रोजाना मिलने वाली मजदूरी अहम होती है. जून और सितंबर के दौरान इस अस्पताल में क्षमता से दोगुने लोग आते हैं. उन्होंने बताया कि कमजोर प्रतिरक्षा के चलते बच्चे निमोनिया और सांस की तकलीफ या दूसरी संक्रामक बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं.

हालांकि सरकार कथकारी जनजाति के सदस्यों की सूची भी तैयार कर रही है, ताकि नौकरी, शिक्षा आदि के क्षेत्र में चलाई जा रही सरकारी योजनाओं से होने वाले लाभों को सुनिश्चित किया जा सके. अब सरकार ने पलायन को कम करने के लिए खाचे में एक नई सड़क परियोजना भी शुरू की है, लेकिन इसका लाभ वही ले सकते हैं जिनके पास अपना बैंक खाता है.

नामदेव के पास बैंक खाता है, लेकिन इनका गांव में ठहरने का फैसला आम लोगों के रवैये से ठीक उलटा है, जहां पलायन पिछले महीने से शुरू हो चुका है. वाडवी जैसे तमाम मजदूर सितंबर में ही जाने के लिए प्रतिबद्ध थे. एक ठेकेदार जब गांव आया था तो उसने इन परिवारों को इसी वादे के साथ पैसा दिया था कि ये उसके लिए काम करेंगे. वाडवी कहती हैं कि मैं जानती हूं कि मेरा बच्चा कुपोषित है, लेकिन अगर मैं काम नहीं करुंगी तो इसे क्या खिलाऊंगी.

एए/वीके (रॉयटर्स)

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