तेजी से उभरते भारत में किसान क्यों बेहाल | ब्लॉग | DW | 12.03.2018
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ब्लॉग

तेजी से उभरते भारत में किसान क्यों बेहाल

महाराष्ट्र में 180 किलोमीटर पैदल चल कर मुंबई पहुंचे हजारों किसानों के लॉन्ग मार्च ने एक अभूतपूर्व शांतिपूर्ण आंदोलन की मिसाल पेश की है. शिवप्रसाद जोशी पूछते हैं, जब सब दल किसानों के साथ हैं तो वे परेशान क्यों हैं?

सोशल मीडिया लाल झंडों, लाल कमीजों और लाल टोपी और हंसिया हथौड़ा का बिल्ला टांगे इन किसानों की तस्वीरों से अटा पड़ा है. प्रमुख समाचार वेबसाइटों और कुछ टीवी समाचार चैनलों में भी इन दृश्यों को देखा जा सकता है. लेकिन मुंबई की सड़कों पर बहते इस लाल सागर के नजदीक पहुंचते ही कई और तस्वीरें हमें भारत के उस वंचित नागरिक की व्यथा भी दिखलाती हैं जिसे हम अन्नदाता कहते हैं. आदिवासी और बहुजन समुदायों के ये ज्यादातर आंदोलनकारी, छोटे स्तर के या भूमिहीन किसान हैं. घिसी हुई, मरम्मत की हुई चप्पलें, फटी हुई एड़ियां, अंगूठों और एड़ियों से रिसता खून लेकिन चेहरे  दमकते हुए, हंसते हुए और मुट्ठियां कसी हुईं. मीडिया के लिए वे तस्वीरें भी मजेदार थीं जिनमें किसान अपने सिर पर छोटा सा सोलर पैनल रखे चल रहे थे, मोबाइल फोन चार्ज करने के लिए.

कहने को मुंबई में करीब 50 हजार किसानों और आदिवासियों का यह विशाल अनुशासित हुजूम वाम संगठन अखिल भारतीय किसान सभा की अगुवाई में उतरा है लेकिन बात इनके वाम या किसी और दल के समर्थक किसान होने की नहीं है. बात यही है कि इनका रंग या राजनीति देखकर इनसे मुंबई में किसी ने मुंह नहीं मोड़ा है. बोर्ड परीक्षाओं का ध्यान रखते हुए मुंबई में रविवार को दाखिल हुए किसानों को जगह जगह पानी पिलाने और नाश्ता कराने के लिए स्टॉल लगा दिए गए थे.

ऐसा संभवत पहली बार हो रहा था कि किसी राजनीतिक संगठन के आंदोलन का लोग तमाम विचारधाराओं से ऊपर उठकर स्वागत कर रहे थे. सिखों ने लंगर खोल दिए तो मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी. और तो और मुंबई के कुछ साहित्यिक और कला संगठनों ने भी किसानों की आवाज को अपना साथ दिया. दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में लॉन्ग मार्च के समर्थन में सामाजिक और नागरिक संगठनों ने बैठकें की. ऐसा लगता था कि असली भारत की तस्वीर तो यहीं नुमाया है, देशभक्ति और राष्ट्रवाद का राग अलापते रहने वाली शक्तियों को भी मानो ये नागरिक गठबंधन एक संदेश देने की कोशिश कर रहा था. महाराष्ट्र में सत्ताधारी बीजेपी या शिवसेना हो या मनसे या कांग्रेस, एनसीपी- सारे दल इन किसानों के समर्थन में हैं. लेकिन किसान किसी राजनीतिक दल की सहानुभूति का नहीं बल्कि सरकार के ठोस फैसले का इंतजार कर रहे हैं. 

पिछले साल नवंबर में महाराष्ट्र सरकार ने किसानों की कर्ज माफी का ऐलान किया था. राज्य विधानसभा में सरकार ने बताया कि 31 लाख से ज़्यादा किसानों के बैंक खातों में 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा ट्रांसफर कर दिए गए हैं. वास्तविक कर्ज माफी अभी दूर है. लेकिन किसानों की मांग यही नहीं है. वे स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू करने की मांग कर रहे है. कुछ आदिवासी किसान समुदाय ऐसे हैं जो जंगल की जमीन पर पीढ़ी दर पीढ़ी बरसों से फसल उगाते आ रहे हैं, वनभूमि अधिकार अधिनियम, 2006 के मुताबिक एक दशक पहले ही उन्हें वह जमीन कानूनी तौर पर सौंप दी जानी चाहिए थी, मगर ऐसा नहीं हुआ.

जाने माने कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में 2004 में गठित आयोग ने 2006 में अपनी पांचवी और आखिरी रिपोर्ट में किसानों के लिए फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य, आंकी गई उत्पादन की औसत लागत से कम से कम 50 फीसदी ज्यादा के स्तर पर तय करने की सिफारिश की थी.

ठीक एक साल पहले फरवरी मार्च के दिनों में देश की राजधानी दिल्ली में तमिलनाडु के बदहाल किसान पहुंचे थे. उनके प्रतिरोध को हथकंडा, नाटक और फोटोशूट की संज्ञा देने वालों की कोई कमी नहीं थी. डॉयचे वेले में प्रकाशित एक आलेख में बताया गया था कि 2004-05 और 2007-08 में कृषि सेक्टर की सालाना औसत वृद्धि दर पांच फीसदी थी. लेकिन 2008-09 और 2013-14  में ये गिर कर तीन फीसदी रह गई. इन्हीं अवधियों में अर्थव्यवस्था में क्रमशः नौ और सात फीसदी की सालाना औसत वृद्धि दर्ज की गी. कृषि की बदहाली का ठीकरा खराब मौसम की स्थितियों पर फोड़ा गया है.

आर्थिक वृद्धि और अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों के चलते कृषि और सहयोगी सेक्टरों का जीडीपी में योगदान 2004-05 में 19 फीसदी से घटकर 2013-14 में 14 फीसदी रह गया. और इसमें भी अगर वानिकी और मछली पालन को हटा दें तो कृषि का राष्ट्रीय जीडीपी में करीब 12 फीसदी का योगदान ही रह गया है. लेकिन राज्य स्तर पर आंकड़े अलग और ऊपर हैं. 13 राज्यों में कृषि का जीडीपी योगदान 20 फीसदी से ज्यादा का है. सबसे अधिक 30 फीसदी अरुणाचल प्रदेश में, 20-29 फीसदी आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, पंजाब, मध्य प्रदेश, और झारखंड आदि में, 15-19 फीसदी हरियाणा, हिमाचल, झारखंड, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक आदि में और 15 फीसदी से कम गुजरात, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और उत्तराखंड में.

सिंचाई के उन्नत साधन, जल प्रबंधन, आदिवासियों को वनभूमि का आवंटन, कृषि बीमा, कृषि बाजार, फसल का बेहतर मूल्य, गांवों मे सड़क और बिजली आदि की समुचित व्यवस्था, पशुधन की देखरेख, कृषि तकनीक का विकास, बेहतर उर्वरक और ऋण सुविधा और अदायगी की आसान शर्तें- ये सब बातें एक प्रभावी और न्यायपूर्ण नीति के लिए जरूरी हैं. स्वामीनाथन कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कमोबेश ये सारी बातें रखी हैं और अब तो केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि जल्द से जल्द उसकी सिफारिशों को लागू करे. किसान कब तक धरना प्रदर्शन करते रहेंगे और कब तक मजबूरी में अपनी जानें गंवाते रहेंगे. आत्महत्या के आंकड़े भी सबसे ज्यादा उसी महाराष्ट्र से हैं जहां आज किसान लामबंद होकर देश की कमर्शियल कैपीटल पर अपनी छाप छोड़ने पहुंचे हैं.

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