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दुनिया

भारत में देवता क्यों बन जाते हैं राजनेता?

भारत में हर दौर में एक नेता ऐसा होता है जो लोगों के लिए भगवान हो जाता है. लोग उसे इंसान मानने को राजी नहीं होते. लेकिन ऐसा क्यों होता है?

जयललिता को श्रद्धांजलि देने के लिए लंबी लाइन में खड़े अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ता शंकर कहते हैं, "मेरे लिए तो वह भगवान थीं." यह एक वाक्य उस पूरे दर्शन का प्रतीक है जिसके इर्द-गिर्द भारतीय राजनीति दशकों से घूम रही है. नेताओं को गरीब लोग अपना भगवान मानते हैं. और अपने इस कथित भगवान में उनकी श्रद्धा दशकों से उसी तरह बरकरार है, इसका सबूत जयललिता के अंतिम संस्कार में शामिल हुए लोगों की विशाल भीड़ देती है. ऐसी ही भीड़ भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की शवयात्रा में भी थी और महाराष्ट्र के नेता बाला साहेब ठाकरे की शवयात्रा में भी. इसकी तुलना क्यूबा के नेता फिदेल कास्त्रो या ब्रिटेन के प्रिंसेस डायना की शव यात्राओं से की जा सकती है.

तस्वीरों में, खास प्रतिभाओं के धनी भारतीय नेता

आजाद भारत ने इस तरह की पहली विशाल यात्रा 1948 में देखी थी जब महात्मा गांधी की हत्या हुई थी. उस शव यात्रा में लगभग 20 लाख लोग शामिल हुए थे. 1997 में मदर टेरेसा के जनाजे में भी लाखों लोग थे. 1969 में तमिल नेता सीएन अन्नादुराई की शवयात्रा में करीब 15 लाख लोग आए थे. इन सभी नेताओं में एक बात साझी थी. इन सभी को भारत के गरीबों का समर्थन हासिल था. वरिष्ठ टिप्पणीकार परसा वेंकटेश्वर राव कहते हैं, "जिन लोगों के पास अपनी कोई ताकत नहीं होती, उन लोगों को किसी तरह की उम्मीद चाहिए होती है. इस उम्मीद की खातिर ही वे कोई नेता तलाशते हैं. यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक निर्भरता है."

जयललिता का राजनीतिक जीवन दागदार ही रहा. उन पर भ्रष्टाचार के आरोप थे. दो बार जेल जा चुकी थीं. और अपने विशाल साड़ी संग्रह के लिए बदनाम भी थीं. बताया जाता है कि इनकम टैक्स के छापे में उनके यहां से 10,500 साड़ियां मिली थीं. लेकिन इसका असर उनके जनसमर्थन पर जरा भी नहीं था. उन्होंने गरीबों के लिए कई लोकलुभावन योजनाएं शुरू कीं जो काफी सफल रहीं. अम्मा कैंटीन में 3 रुपये में खाना और इलेक्शन के वक्त वोटरों को बकरियों से लेकर लैपटॉप तक जैसे तोहफे देना उनकी चर्चित योजनाएं रहीं. कॉलमनिस्ट शुभा सिंह कहती हैं कि ये योजनाएं लोगों को पसंद आती थीं. वह कहती हैं, "अर्थशास्त्री उनकी लोकलुभावन नीतियों की आलोचना करते हैं लेकिन लोगों के मन पर इन योजनाओं का गहरा असर था. उन्होंने जनता की नब्ज पकड़ ली थी. जनता और उनके बीच सीधा रिश्ता था."

यह भी देखिए, अलविदा कास्त्रो

पूर्व क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर के साथ भी भारतीय जनमानस का रिश्ता देव और भक्त जैसा ही लगता है. जब वह खेल रहे होते थे तो स्टेडियम में "सचिन इज गॉड" जैसे बैनर और पोस्टर खूब दिखते थे. इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों को भी लोग भक्त कहते हैं क्योंकि वे मोदी पर अंधश्रद्धा रखते हैं. इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के संपादक प्रंजॉय गुहा ठाकुरता कहते हैं, "ऐसा तो नहीं है कि नेताओं के प्रति श्रद्धा का चलन भारत में अनोखा है, हां भारत में एक बात जरूर अलग है कि इन सभी नेताओं को सुपरह्यूमन समझा जाता है. वे इंसान से कहीं ज्यादा हो जाते हैं. उन्हें लोग मसीहाओं की तरह देखने लगते हैं. लगभग ईश्वर."

वेंकटेश्वर राव कहते हैं कि हमारा देश लोकतंत्र है जो जनता से चलता है. वह कहते हैं, "हम अपनी भावनाओं को जाहिर करते हैं. हम उन्हें रोक कर, छिपाकर नहीं रखते हैं."

वीके/एके (एएफपी)

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