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दुनिया

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मामला सुलझेगा या उलझेगा?

दशकों से चल रहे राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसे आपसी बातचीत से हल किया जाएगा. इस फैसले के मायने समझा रहे हैं कुलदीप कुमार.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिली अभूतपूर्व सफलता और उसके बाद कट्टर हिंदुत्ववादी और मुस्लिम-विरोधी बयानों के लिए कुख्यात योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के फलस्वरूप अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त होता दिख रहा है.

बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर, 1992 के दिन संघ परिवार और शिवसेना के कार्यकर्ताओं एवं समर्थकों ने गिरा दिया था क्योंकि उनका मानना था कि मस्जिद के मुख्य गुंबद के ठीक नीचे भगवान राम का जन्म हुआ था और मस्जिद को राम मंदिर तोड़ कर ही बनाया गया था. बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद आनन-फानन में वहां एक छोटे-से अस्थायी मंदिर का निर्माण कर दिया गया था जिस पर पूजा-अर्चना होती है. भारतीय जनता पार्टी का वादा था कि केंद्र में अपने बलबूते पर सरकार बनाने के वह मंदिर निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाएगी लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को सत्ता में आए हुए लगभग तीन साल होने के बाद भी अभी तक कुछ नहीं हुआ है.

लेकिन मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्देश दिया है, उससे मंदिर निर्माण का रास्ता खुल सकता है. भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली तीन-सदस्यीय खंडपीठ ने भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि क्योंकि यह मामला बेहद संवेदनशील है और इससे दोनों ही पक्षों की धार्मिक भावनाएं जुड़ी हैं, इसलिए दोनों पक्ष आपस में मिल-बैठकर हल करने का प्रयास करें.

प्रधान न्यायाधीश ने यहां तक कहा कि यदि उनसे मध्यस्थता करने को कहा जाएगा तो वे इसके लिए भी तैयार हैं लेकिन फिर वे मामले की सुनवाई में हिस्सा नहीं लेंगे. सुब्रह्मण्यम स्वामी का कहना है कि मस्जिद अयोध्या में किसी और स्थल पर बनाई जा सकती है. उधर वक्फ बोर्ड के सदस्य जफरयाब जिलानी ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है. इसके पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि विवादित भूमि को दोनों पक्षों में बांट दिया जाए.

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश काफी चौंकाने वाला है. अयोध्या विवाद कोई नया विवाद नहीं है. आपसी बातचीत के जरिये इसे सुलझाने की अनेक कोशिशें की जा चुकी हैं. जब ये कोशिशें चल ही रही थीं और उत्तर प्रदेश में भाजपा के नेतृत्व में मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सरकार सत्ता में थी, तभी सुनियोजित ढंग से बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया. अब फिर राज्य में भाजपा की सरकार है और उसके पास विधानसभा में तीन-चौथाई से भी अधिक बहुमत है. मौजूदा मुख्यमंत्री भी कल्याण सिंह के मुकाबले अधिक कट्टर हिंदुत्ववादी हैं.

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड कर गेंद को फिर से मुकदमा लड़ रहे पक्षों के पाले में फेंक देना हैरत में डालने वाली बात है. संघ के विचारक एमजी वैद्य ने विधानसभा चुनाव के नतीजे आते ही बयान दिया था कि उत्तर प्रदेश की जनता ने दिखा दिया है कि वह राम मंदिर निर्माण के पक्ष में है. इसलिए इस ऐतिहासिक जनादेश को यदि भाजपा राम मंदिर के पक्ष में जनादेश की तरह व्याख्यायित करे, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. यूं हकीकत यह है कि वोट ‘सबका साथ, सबका विकास' के नारे पर मांगा गया था, राम मंदिर निर्माण के नाम पर नहीं.

एक तरफ यह सब चल रहा है, तो दूसरी तरफ बुधवार को सुप्रीम कोर्ट इस बारे में फैसला सुनाने वाला है कि बाबरी मस्जिद ध्वंस की साजिश वाले मामले से तकनीकी आधार पर लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे कई बड़े नेताओं का नाम हटाया जाना सही था या नहीं. यदि उसने इसे सही नहीं पाया, तो फिर इन सभी बड़े नेताओं पर इस मामले में आरोप फिर से लागू हो जाएंगे और मुकदमा फिर से शुरू होगा.

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश भाजपा के लिए बहुत सही समय पर आया है. विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद मुस्लिम समुदाय का मनोबल खासा गिरा हुआ है. हताशा के इन दिनों में बाबरी मस्जिद आंदोलन के नेता समझौते पर राजी हो सकते हैं. यदि ऐसा हुआ तो भाजपा अपनी जीत पर जश्न मनाएगी. और यदि वे ना माने, तो उसका मुस्लिमविरोधी प्रचार और अधिक तेज हो जाएगा जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मिजाज के अनुरूप भी है. आने वाले दिन इस दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं.

योगी आदित्यनाथ गोरखपुर के गोरखनाथ मठ के महंत हैं. वे महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी हैं जो महंत दिग्विजयनाथ के उत्तराधिकारी थे. 1949 में महंत दिग्विजयनाथ द्वारा अयोध्या में आयोजित एक लंबे धार्मिक आयोजन के समापन के समय रहस्यमय ढंग से राम लला और सीता की मूर्तियां बाबरी मस्जिद में प्रकट हो गई थीं. दरअसल बाबरी मस्जिद के स्थान पर भव्य राम मंदिर बनाने की मूल प्रतिज्ञा महंत दिग्विजयनाथ की ही थी. इससे स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ किस परंपरा के उत्तराधिकारी हैं. 

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