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दुनिया

बंगाल की जर्मन कंपनियों को लुभाने की कोशिश

टाटा के नैनो प्रोजेक्ट का विरोध कर सत्ता में आई पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब राज्य में आटोमोबाइल उद्योगों की स्थापना पर जोर दे रही हैं. हाल में उन्होंने इसके लिए जर्मनी के म्यूनिख शहर का दौरा किया.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के जर्मनी दौरे से वापस लौटने के बाद राजनीतिक और व्यावसायिक हलकों में पूछा जा रहा है कि आखिर इस दौरे से बंगाल को क्या मिला ? विपक्षी राजनीतिक दलों ने ममता से दौरे के दौरान मिले निवेश प्रस्तावों का खुलासा करने की मांग की है. वहीं, यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या बंगाल में ऑटोमोबाइल हब के लिए जरूरी आधारभूत ढांचा मौजूद है. कोई एक दशक पहले अपने उग्र आंदोलन के चलते टाटा की लखटकिया नैनो परियोजना को बंगाल से बोरिया-बिस्तर समेटने पर मजबूर कर देने वाली ममता बनर्जी के तेवर अब नरम हो रहे हैं. उन्होंने न सिर्फ टाटा समूह को दोबारा यहां ऑटोमोबाइल संयंत्र लगाने का प्रस्ताव दिया है बल्कि अपने जर्मनी दौरे के दौरान उन्होंने बीएमडब्ल्यू के अधिकारियों से भी बंगाल में निवेश की अपील की है.

राज्य में दो दशकों से भी लंबे समय से ऑटोमोबाइल सेक्टर में कोई बड़ा निवेश नहीं हो सका है. इस दौरे से लौटने के बाद राज्य की दो कंपनियों ने जर्मन कंपनियों से सहमतिपत्रों पर हस्ताक्षर जरूर किए हैं. लेकिन ममता अब तक जर्मन कंपनियों के निवेश के बारे में चुप्पी साधे बैठी हैं. जिन दो सहमतिपत्रों पर हस्ताक्षर हुए हैं उनमें से एक है राज्य की विक्रम सोलर. उसने जर्मन कंपनी टीम टेकनिक से अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने और संयंत्र के आधुनिकीकरण के लिए चार सौ करोड़ रुपये का एक करार किया है. उसके अलावा हेस्टिंग्स ग्रुप ने जर्मनी की सिक्योरिटी कंपनी आबुस के साथ बायो-जूट पैकेजिंग मैटीरियल के निर्यात के एक करार पर हस्ताक्षर किए हैं. हेस्टिंग्स ग्रुप का कहना है कि आबुस जर्मनी में जूट पैकेजिंग मैटीरियल को बढ़ावा देगी.

मदद का वादा

ममता ने अपने जर्मनी दौरे के दौरान म्यूनिख में विभिन्न कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक में कहा, "सरकार आपकी हरसंभव सहायता करेगी. आप बंगाल में निवेश करें. हम आपको जमीन और आधारभूत ढांचा मुहैया कराएंगे. राज्य में प्रशिक्षित पेशेवरों और कामगरों की भी कोई कमी नहीं है." ममता ने ये साफ कर दिया कि महज सहायक उद्योगों से काम नहीं बनेगा. अगर जर्मन कंपनियां बंगाल में निवेश करना चाहती हैं तो उनको एक यूनिट की स्थापना करनी होगी. मुख्यमंत्री ने जर्मन कंपनियों से राज्य में आटो हब की स्थापना करने की भी अपील की. जर्मन दौरे से लौटने के बाद ममता ने कहा, "हमने बीएमडब्ल्यू समेत तमाम कंपनियों से निवेश की अपील की है. बैठक सकारात्मक रही है. उम्मीद है वहां से बढ़िया निवेश आएगा." ममता के अनुरोध पर जर्मनी ने अगले साल जनवरी में होने वाले बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट में भी अपना प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया है.

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ममता बनर्जी ने अपने म्यूनिख दौरे पर अग्रणी कार निर्माता कंपनी बीएमडब्ल्यू से भी राज्य में निवेश का अनुरोध किया. उन्होंने बीएमडब्ल्यू के अधिकारियों के साथ भी तीन घंटे तक बैठक की और उनको बंगाल में छोटी कारों और बैटरी-चालित मोटरसाइकिल निर्माण संयंत्र लगाने का प्रस्ताव दिया. इसके लिए उन्होंने बिजली की पर्याप्त सप्लाई समेत हरसंभव सहायता मुहैया कराने का भी भरोसा दिया. वित्त मंत्री अमित मित्र कहते हैं, "बीएमडब्ल्यू को अगर बंगाल में दिलचस्पी नहीं होती तो वह तीन घंटे का समय जाया नहीं करती." लेकिन साथ ही उनका कहना था कि बीएमडब्ल्यू जैसी कंपनी रातोंरात निवेश के फैसले नहीं करती.

आधारभूत ढांचे पर सवाल

ममता बनर्जी भले राज्य में ऑटोमोबाइल हब की स्थापना पर जोर दे रही हों, विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री इसके लिए जरूरी माहौल और आधारभूत ढांचे की उपलब्धता पर सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि इसके लिए एक साथ काफी जमीन के साथ ही राजनीतिक स्थिरता का माहौल जरूरी है. सरकार का दावा है कि उसके पास लैंड बैंक में एक लाख एकड़ जमीन है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह जमीन टुकड़ों में है. ऐसे में एक साथ हजार एकड़ या उससे ज्यादा जमीन सही जगह पर मिलना मुश्किल है. किसी खास जगह पर 10-20 एकड़ से ज्यादा जमीन नहीं मिल सकती. वहां तो छोटे या मझौले उद्योग ही लग सकते हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि निर्माण उद्योग कहीं यूनिट लगाने से पहले राजनीतिक स्थिरता को प्राथमिकता देता है. अगर बीएमडब्ल्यू अधिकारी ममता सरकार के वादों से संतुष्ट हैं तो वह यहां निवेश पर विचार कर सकते हैं. लेकिन उससे पहले जमीन और दूसरी आधारभूत सुविधाओं व सरकारी सहायता के अध्ययन के बाद ही कंपनी कोई फैसला लेगी. अर्थशास्त्री सुगत मारजित कहते हैं, "ऑटोमोबाइल यूनिट के लिए बड़ी मात्रा में जमीन जरूरी है. उसके साथ सहायक उद्योग भी लगेंगे. अब देखना होगा कि सरकार किसी कंपनी को किसी खास इलाके में इतनी जमीन मुहैया करा सकती है या नहीं?" एक अन्य अर्थशास्त्री अभिरूप सरकार कहते हैं, "निवेश के किसी ठोस प्रस्ताव के सामने आए बिना ममता के जर्मन दौरे पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती."

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राजनीतिक बहस

इस बीच, विपक्षी राजनीतिक दलों के अलावा उद्योग जगत के एक तबके ने ममता से जर्मन दौरे के दौरान ऑटोमोबाइल कंपनियों के साथ हुए समझौतों का खुलासा करने को कहा है. सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "मुख्यमंत्री बीते पांच साल से निवेश के खोखले वादे करती रही हैं. उनको जर्मन कंपनियों के साथ हुए समझौतों पर बयान देना चाहिए." बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा कहते हैं, "राज्य की मुखिया के तौर पर ममता को जर्मनी में ऑटोमोबाइल कंपनियों के साथ हुई बैठक पर बयान जारी करना चाहिए. आखिर लोगों को यह जानने का अधिकार है कि जर्मनी के दौरे से बंगाल को क्या मिला." भारत में फिलहाल लगभग डेढ़ हजार जर्मन कंपनियां काम करती हैं जबकि भारत के पड़ोसी चीन में लगभग छह हजार जर्मन कंपनियां मौजूद हैं.

भारत में सक्रिय जर्मन कंपनियों में छह सौ इंजीनियरिंग सेक्टर में हैं. राजनीतिक पर्यवेक्षकों को कहना है कि अगर लालफीताशाही की अड़चनों को दूर कर परियोजनाओं को मंजूरी देने की प्रक्रिया सरल और पारदर्शी बनाई जा सके तो और कंपनियां यहां आएंगी. व्यापार संगठन फिक्की ने अपने ताजा अध्ययन में कहा है कि जर्मन कंपनियों में भारत के हाई-टेक बाजार में निवेश के प्रति दिलचस्पी है. इनमें आईटी के अलावा इलेक्ट्रानिक सिस्टम डिजाइन और निर्माण, ऑटोमोटिव, सिविल एविएशन और एअरपोर्ट्स, परिवहन का आधारभूत ढांचा, जल, गैर-पंरपरागत ऊर्जा, हैवी इंजीनियरिंग, बायोटेक्नोलॉजी, फार्मास्यूटिकल्स, अंतरिक्ष और रक्षा निर्माण जैसे क्षेत्र शामिल हैं. इंडो जर्मन चैंबस आफ कामर्स की क्षेत्रीय निदेशक सबीना पांडे कहती हैं, "अभी तो औपचारिक बातचीत हुई है. उम्मीद है यह प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और इसके सकारात्मक नतीजे सामने आएंगे."

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