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दुनिया

साफ पानी को तरसेगी भावी पीढ़ी

भारत में पेय जल का संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है. अब एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर पानी की खपत की मौजूदा दर जारी रही तो वर्ष 2040 तक देश में पीने का पानी ही नहीं बचेगा.

केंद्रीय जल संसधान मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया की कुल आबादी में से 18 प्रतिशत भारत में रहती है लेकिन देश में महज चार प्रतिशत जल संसाधन हैं. यह बेहद गंभीर स्थिति है. सरकारी आंकड़ों से साफ है कि बीते एक दशक के दौरान देश में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता तेजी से घटी है. वर्ष 1947 में देश की आजादी के समय जहां यह 6 घनमीटर प्रति व्यक्ति थी वहीं वर्ष 2011 में यह घट कर 1,5 घनमीटर रह गई. वर्ष 2001 में यह 1,8 घनमीटर थी. नए अनुमानों के मुताबिक वर्ष 2025 में यह घट कर 1.3 और 2050 तक 1.1 घनमीटर रह जाएगी. नदियों में छोड़ा जाने वाला 90 फीसदी पानी पर्यावरण के मानदंडों पर खरा नहीं होता. इसी तरह बारिश का 65 फीसदी पानी समुद्र में चला जाता है. देश में सबसे ज्यादा पानी की खपत कृषि क्षेत्र में होती है. उसके बाद घरेलू और औद्योगिक क्षेत्र का स्थान है.

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पानी का संरक्षण

इस हालात पर काबू पाने के लिए विशेषज्ञ और पर्यावरणविद जल संरक्षण को राष्ट्रीय आदत बनाने की वकालत करते रहे हैं. उनका कहना है कि पेयजल के संकट पर काबू पाने के लिए बारिश के पानी के संरक्षण पर तत्काल ध्यान देना जरूरी है. विशेषज्ञों ने पानी की बढ़ती खपत रोकने के लिए ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों को विकसित करने की जरूरत पर भी जोर दिया है. जल संरक्षण पर संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत ने जल संरक्षण की ठोस योजना नहीं बनाई तो निकट भविष्य में उसे गंभीर परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले 25 वर्षों में स्थिति काफी गंभीर हो जाएगी. दक्षिण एशिया में अपनी अनूठी भौगोलिक स्थिति के वजह से भारतीय उपमहाद्वीप पर इस संकट का सबसे गंभीर असर होगा.

डेनमार्क के आरहुस विश्वविद्यालय ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि ऊर्जा की बढ़ती जरूरतें पूरी करने के प्रयास में लगातार नए बिजली संयंत्र बनाए जा रहे हैं. लेकिन इस चक्कर में पानी की बढ़ती खपत को नजरअंदाज कर दिया जाता है. इन संयंत्रों को ठंढा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की खपत होती है. अगर ऊर्जा बनाने की होड़ इसी रफ्तार से जारी रही तो वर्ष 2040 तक लोगों की प्यास बुझाने के लिए पर्याप्त पानी नहीं बचेगा. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत जैसे विकसित देश में बिजली की लगातार बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए नए-नए बिजली संयंत्र बनाए जा रहे हैं. इससे पेयजल और बिजली की मांग के बीच टकराव की स्थिति पैदा होगी. इस शोध में कहा गया है कि बिजली संयत्रों के पास इस बात का कोई आंकड़ा नहीं होता कि उनमें पानी की कितनी खपत होती है. जल संसाधनों के सीमित होने की वजह से अगर शीघ्र ठोस उपाय नहीं किए गए तो भारी संकट पैदा हो सकता है.

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आर्सेनिक और फ्लोराइड

देश में पीने के पानी का संकट वैसे ही गंभीर है. ऊपर से कई राज्यों में भूमिगत पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड की मौजूदगी ने समस्या को और जटिल बना दिया है. फिलहाल 17 राज्यों के 14 हजार गांवों व शहरों में पीने के पानी के स्रोतों में फ्लोराइड की अतिरिक्त मात्रा है. इससे 1.14 करोड़ लोग प्रभावित हैं. यह आंकड़ा सरकारी है और इसे इसी सप्ताह राज्यसभा में पेश किया गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक लगातार अतिरिक्त मात्रा में फ्लोराइड मिले पानी के सेवन से दांतों और हड्डियों की बीमारियां होने का खतरा है.

ऐसे इलाकों में सबसे ज्यादा राजस्थान में हैं जबकि बिहार दूसरे नंबर पर है. उसके बाद क्रमशः कर्नाटक और पश्चिम बंगाल का स्थान है. केंद्र सरकार ने तमाम राज्यों को आर्सेनिक और फ्लोराइड की बहुलता वाले इलाकों में रहने वाली आबादी को सुरक्षित पेयजल की सप्लाई को प्राथमिकता देने को कहा है. केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने वर्ष 2022 तक गांवों में रहने वाली 90 फीसदी आबादी को पाइपों के जरिए साफ पीने का पानी मुहैया कराने की योजना तो बनाई है लेकिन पैसों की कमी इस राह में सबसे बड़ी बाधा है.

भयावह आंकड़े

पीने के पानी से संबंधित आंकड़ों से इस संकट की गंभीरता का पता चलता है. पानी की गुणवत्ता के मामले में दुनिया के 122 देशों में से भारत 120वें स्थान पर है जबकि इसकी उपलब्धता के मामले में 180 देशों में यह 133वें स्थान पर है. ग्रामीण आबादी के महज 18 फीसदी हिस्से को ही साफ पानी उपलब्ध है. इन इलाकों में महज एक-तिहाई घरों में ही पाइप से पानी की सप्लाई होती है. वर्ष 2011 के जनगणना के आंकड़ों में कहा गया था कि देश में लगभग 14 करोड़ घरों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिलता. ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की सप्लाई के लिए पाइप तो बिछाए गए हैं लेकिन उनमें से आधे से ज्यादा पाइपों में अपरिशोधित पानी की ही सप्लाई होती है.

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विभिन्न राज्यों में साफ पानी की पहुंच के आंकड़ों में भी भारी विषमता है. मिसाल के तौर पर आंध्र प्रदेश की 36 फीसदी ग्रामीण आबादी को परिशोधित यानी साफ पानी मिलता है जबकि बिहार के मामले में यह आंकड़ा महज दो फीसदी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक देश में हर साल लगभग चार करोड़ लोग पानी से होने वाली बीमारियों की चपेट में आते हैं. इनमें से 75 फीसदी से ज्यादा बच्चे शामिल हैं. देश में 7.80 लाख मौतों के लिए प्रदूषित पानी को जिम्मेदार ठहराया गया है. इनमें से चार लाख मौतें अकेले डायरिया के चलते होती हैं .

शीघ्र उपाय जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ते पेयजल संकट पर काबू पाने के लिए इस दिशा में ठोस पहल जरूरी है. ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों को बढ़ावा देकर और बारिश के पानी के संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठा कर इस संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है. वाटर मैन आफ इंडिया कहे जाने वाले राजेंद्र सिंह कहते हैं, "तेजी से बढ़ते शहरीकरण की वजह से बारिश का पानी अब कई इलाकों में भूमिगत पानी की कमी पाटने में असमर्थ है." राजस्थान में जल संरक्षण पर सराहनीय भूमिका के लिए कई सम्मानों से नवाजे गए सिंह का कहना है कि देश की आबादी के लिए पीने के पर्याप्त साफ पानी की भारी कमी है.

दिल्ली स्थित सेंटर फार साइंस एंड इंवायरन्मेंट की सुष्मिता सेनगुप्ता कहती हैं, "एक बार भूमिगत पानी के प्रदूषित हो जाने पर इसे साफ करना लगभग असंभव है." देश की आबादी को साफ पानी मुहैया कराने की राह में धन भी एक प्रमुख बाधा है. लेकिन सरकार को प्राथमिकता के आधार पर इस दिशा में काम करना होगा. ऐसा नहीं हुआ तो देश की भावी पीढ़ी पीने के साफ पानी को तरस जाएगी.

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