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ब्लॉग

मोदी की असली परीक्षा अब शुरू होगी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यकाल का आधे से अधिक हिस्सा बचा हुआ है. कुलदीप कुमार का कहना है कि आगामी तीन वर्षों की दिशा और दशा पिछले दो वर्ष के अनुभवों से ही तय होगी.

इन अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि आने वाले सालों में देश की राजनीति में टकराव और अधिक बढ़ेगा एवं सरकार की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति में वृद्धि होगी. लेकिन यदि अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन अच्छा रहा और आम लोगों को कुछ राहत मिली, तो मोदी सरकार की साख बढ़ेगी और भारतीय जनता पार्टी की सत्ता में वापसी भी हो सकती है. लेकिन फिलहाल यह बहुत बड़ा सवाल है और इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में ही छिपा है.

इस समय सबसे पहला सवाल तो यही है कि क्या पिछले दो वर्षों के दौरान नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और उनकी सरकार की साख बढ़ी है? इसका दो टूक उत्तर दिया जा सकता है कि बढ़ने के बजाय वह घटी ही है. 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी को एक करिश्माई नेता की तरह पेश किया गया था और अभूतपूर्व ख़र्चीले और व्यापक प्रचार ने उन्हें लगभग एक ऐसा मसीहा बना दिया था जिसके प्रधानमंत्री बनते ही देश की जनता के लिए “अच्छे दिन” आ जाएंगे, विदेशों से काला धन वापस आ जाएगा और हर नागरिक की जेब में 15 लाख रुपये पहुंच जाएंगे, हर साल कम से कम एक करोड़ लोगों को रोजगार मुहैया कराया जाएगा, और ‘सबका साथ-सबका विकास' उनकी सरकार की नीति होगी. लेकिन उनका आधा कार्यकाल समाप्त होने में अब सिर्फ छह माह ही बचे हैं और कोई भी वादा आंशिक रूप से भी पूरा होता नजर नहीं आ रहा.

दो साल में भी मोदी और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी विपक्ष के साथ संवाद स्थापित करने में असफल रहे हैं. इस कारण बहुत संभव है कि अगले तीन वर्षों के भीतर भी उनकी सरकार संसद में महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने में सफल न हो पाये क्योंकि राज्य सभा में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन अल्पमत में है और उसके बहुमत पाने की कोई उम्मीद नहीं है. जिस तरह पहले गैर-कांग्रेसवाद राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति की धुरी हुआ करता था, वैसे ही अब गैर-भाजपावाद राष्ट्रीय विपक्ष की धुरी बन गया है. भाजपा के लिए गनीमत यह है कि इस आधार पर सम्पूर्ण विपक्ष की एकता बनने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे. जहां भाजपा के विरोध में राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड), कांग्रेस और वाम दल एक मोर्चे के तहत इकट्ठा हो रहे हैं वहीं गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा गठबंधन बनाने का पुराना वामपंथी लक्ष्य अब तृणमूल पार्टी ने अपना लिया है.

पिछले सप्ताह विधान सभा चुनाव के नतीजे आने के बाद विजयी ममता बनर्जी ने नये राजनीतिक समीकरण की ओर इशारा करते हुए विशेष रूप से बीजू जनता दल के नवीन पटनायक और एआईएडीएमके की जयललिता को याद किया. इससे यह संकेत मिलता है कि वह उन पार्टियों का एक तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश कर सकती हैं जो उनकी तरह कांग्रेस या भाजपा से गठजोड़ किए बिना ही अपने बलबूते पर चुनाव लड़ती हैं. बहुजन समाज पार्टी की मायावती और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ऐसे ही नेता हैं लेकिन उनका एक ही मोर्चे में शामिल होना फिलहाल तो असंभव ही लगता है.

पिछले दो सालों के दौरान कई भाजपा नेताओं ने सांप्रदायिक दृष्टि से भड़काऊ भाषण दिये, संघ से जुड़े संगठनों ने अल्पसंख्यकविरोधी अभियान चलाये और गोमांस के सवाल पर कई हत्याएं भी हुईं. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इनमें से किसी भी मुद्दे पर अपना मौन नहीं तोड़ा. यदि यह रुझान बढ़ता गया तो निवेशकों का उत्साह मंद पड़ेगा. मोदी को लगभग समूचे भारतीय उद्योग जगत ने जबरदस्त समर्थन दिया था लेकिन अब आदि गोदरेज जैसे उद्योगपतियों ने दबे स्वर में सरकार की आलोचना शुरू कर दी है. आने वाले तीन साल मोदी सरकार के लिए परीक्षा के साल होंगे.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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