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ब्लॉग

दो साल में दोफाड़ हो गया है देश

वादे कुदाल होते हैं जिनसे खोदकर दिलों में जगह बनाई जाती है. नरेंद्र मोदी ने बनाई. वादे दरांती होते हैं जिनसे वोटों की फसल काटी जाती है. नरेंद्र मोदी ने काटी.

वादे कुदाल होते हैं जिनसे खोदकर दिलों में जगह बनाई जाती है. नरेंद्र मोदी ने बनाई. वादे दरांती होते हैं जिनसे वोटों की फसल काटी जाती है. नरेंद्र मोदी ने काटी. वादे खंजर भी होते हैं जिनसे गले काटे जाते हैं. मोदी ने गले नहीं काटे. उन्होंने समाज को काट दिया, बीचोबीच.

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने दो साल हो गए हैं. देश का सबसे चर्चित प्रधानमंत्री और उनके चाहने वालों के लिए सबसे लोकप्रिय भी. उनके दो साल के कामकाज का आकलन हो रहा है और मैं अपनी सोसाइटी के मुद्दों की चर्चा के लिए बनाए गए वाट्सऐप ग्रुप पर धड़ाधड़ भेजे जा रहे मेसेज देख रहा हूं. इन मेसेजों में सरकार का गुणगान है. और सरकार से ज्यादा मोदी का गुणगान है. लेकिन ये मेसेज भेजने वाले लोग कौन हैं? ये वही लोग हैं जो मुसलमानों को नीचा दिखाने वाले मेसेज भेजते हैं. कई बार कहा जा चुका है कि इस ग्रुप का मकसद सोसाइटी की समस्याओं पर बात करना है, इसलिए ऐसे मैसेज ना भेजें. नतीजा? नीचा दिखाता नया मैसेज.

मैं सोचता हूं, क्या हम पहले से ऐसे ही थे. हमने धर्म-वर्म के मामलों को लेकर पड़ोसियों का लिहाज करना कब छोड़ा? मैं ज्यादा नहीं जानता. उम्र के तीसरे दशक में हूं और भारत में काफी घूम चुका हूं. समाज को इस तरह दोफाड़ मैंने इससे पहले कभी नहीं देखा था. नरेंद्र मोदी सरकार कामकाज का आकलन मैं इसी दोफाड़ पर करता हूं.

क्यों? आर्थिक नीतियों के आधार पर क्यों नहीं? भविष्योन्मुखी योजनाओं के ऐलान के आधार पर क्यों नहीं? विदेश यात्राओं में सफलता के आधार पर क्यों नहीं? जीडीपी के आधार पर क्यों नहीं? क्योंकि ये सब काम सब लोग करते हैं. नरेंद्र मोदी की आर्थिक और विदेश नीति कांग्रेस की पिछली सरकारों से अलग कहां है? विदेशों से ज्यादा से ज्यादा पैसा लाओ, देश के व्यापार को निजी हाथों में सौंपो, उन निजी हाथों को ज्यादा से ज्यादा ताकत दो. उस ताकत के लिए किसानों की जमीनें लो. आदिवासियों के पहाड़ छीनो. यही सब तो वह कर रहे हैं. और यही सब तो पिछली सरकारें भी करती रही हैं. फिर अलग क्या है? हां, भ्रष्टाचार. उनका दावा है कि भ्रष्टाचार खत्म हो गया है. मैं इस दावे पर इसलिए यकीन नहीं करता क्योंकि हरियाणा के मेरे छोटे शहर में राशन कार्ड में नाम चढ़वाने के लिए तो चढ़ावा अब भी चढ़ ही रहा है. जमीन की रजिस्ट्री कराने के लिए तहसीलदार अब एक के बजाय दो फीसदी ले रहे हैं. इसलिए मेरे लिए तो भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ है. हां, लोग कहते हैं कि हजारों करोड़ का कोई घोटाला नहीं हुआ. लेकिन जैसा कि हमारे एक साथी कहते हैं, अब कंपनियां मंत्रियों के बजाय पार्टियों को चंदे के रूप में पैसा दे रही हैं. एडीआर की रिपोर्ट तो पढ़ी ही होगी आपने कि राजनीतिक दलों को चंदे में भारी उछाल आया है. और कैश से चंदा देने का चलन भी बढ़ा है. बीजेपी को किस-किस उद्योगपति ने कितना चंदा दिया है और उसको बीते दो साल में कितने ठेके मिले हैं, शोध का विषय हो सकता है. लेकिन इस शोध के बाद भी मिलेगा क्या? विकास यह मॉडल वही है. लोगों की जेब में ज्यादा से ज्यादा पैसा पहुंचाओ ताकि वे ज्यादा से ज्यादा खर्च कर सकें. इससे मेरा दोफाड़ समाज जुड़ जाएगा क्या? मेरे उन दो पड़ोसी परिवारों को सम्मान मिलेगा क्या?

बीते दो साल में जो धार्मिक उन्माद बढ़ा है, उसकी वजह से समाज में जो डर बढ़ा है और उस डर का समाज के विकास पर जो असर भविष्य में होगा, उसके आधार पर आकलन क्यों न हो? वह भी तब, जब सरकार ने और खासकर हमारे प्रधानमंत्री ने इस नुकसान को रोकने के लिए कुछ नहीं किया. उन्होंने देशभर से कहा कि भ्रष्टाचार सहन नहीं होगा. उन्होंने अपने समर्थकों से कभी नहीं कहा कि धर्म के नाम पर गाली-गलौज, प्रताड़न और शोषण सहन नहीं होगा? और यह प्रताड़ना सहन करने वाले लोग सिर्फ मुसलमान नहीं हैं. हम जैसे लोग भी हैं जिनके नाम हिंदू हैं. देश एक भयंकर बंटवारे को झेल रहा है. यह बंटवारा हिंदू या मुसलमान का नहीं है, मोदी समर्थक और मोदी विरोधियों का है. ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने प्रधानमंत्री का विरोध करना अपराध हो गया है. उसके लिए आपको गाली-गलौज से लेकर मुकदमों तक सब कुछ सहन करना पड़ता है.

पिछले हफ्ते ऑस्ट्रिया में नया राष्ट्रपति चुना गया. अलेक्जांडर फान डेअ बेलेन एक आजाद उम्मीदवार थे जिन्हें ग्रीन पार्टी ने समर्थन दिया था. वह अपने अति-दक्षिणपंथी प्रतिद्वन्द्वी से सिर्फ एक फीसदी वोट ज्यादा पा सके. जीतने के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें इस जीत के बेहद कम मार्जिन का अहसास है. उन्हें अहसास है कि देश आधा-आधा बंटा हुआ है और करीब उतने ही लोग मेरा विरोध करते हैं, जितने समर्थन करते हैं, लेकिन अब मैं सबका राष्ट्रपति हूं. ऐसा कहते हुए उन्होंने ग्रीन पार्टी का समर्थन त्याग दिया.

क्या नरेंद्र मोदी सिर्फ बीजेपी के प्रधानमंत्री हैं? क्या वह अपने समर्थकों के ही प्रधानमंत्री हैं, विरोधियों के नहीं? क्या देश की सरकार सिर्फ अपने समर्थकों के लिए काम करती है? नहीं, तो फिर उनके राज में देश दो टुकड़े कैसे हो रहा है? विकास के नाम पर पैसों से लोगों की जेबें भरकर इस दोफाड़ को कैसे दूर करेंगे? दो साल हो गए हैं लेकिन इसके लिए अब तक किसी योजना का ऐलान नहीं हुआ है.

ब्लॉगः विवेक कुमार

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