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दुनिया

तुर्की में 17 पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा शुरू

तुर्की में जम्हूरियत अखबार के कर्मचारियों के खिलाफ आतंकवादी संगठनों को समर्थन देने समेत कई आरोपों में मुकदमा शुरू हुआ है. इस मुकदमे को तुर्की की न्याय व्यवस्था के लिए एक इम्तिहान के तौर पर देखा जा रहा है.

सोमवार को शुरू हुए इस मुकदमे में जम्हूरियत के पत्रकारों को सात से 43 साल तक की सजाएं सुनायी जा सकती हैं. हालांकि इस बारे में अभी ज्यादा जानकारी नहीं है कि उन पर लगने वाले सभी आरोप कौन कौन से हैं. तुर्की की सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलू के अनुसार 17 पत्रकारों पर "आतंकवादी संगठनों" का समर्थन करने के आरोप तय किये गए हैं. ऐसे संगठनों में धार्मिक नेता फैतुल्लाह गुलेन के संगठन और प्रतिबंधित कुर्दिश वर्कर्स पार्टी के नाम बताये जाते हैं. अनादोलू ने दूसरे आरोपों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है.

पत्रकार अहमत सिक के मामले से झलक मिलती है कि सरकारी अभियोजन कार्यालय की नजर में किस तरह की गतिविधियां अपराध के दायरे में आती हैं. सिक एक खोजी पत्रकार हैं जिन्हें दिसंबर 2016 में गिरफ्तार किया गया था. अधिकारियों ने ट्विटर पर सिक की पोस्टों को उनकी गिरफ्तारी का आधार बताया. अनादोलू के अनुसार जांच इन दावों पर आधारित थी कि सिक ने "तुर्की गणतंत्र, उसकी न्यायिक संस्थाओं, सेना और सुरक्षा संगठनों की निंदा की थी" और अपनी पोस्टों के जरिए आतंकवादी संगठनों के दुष्प्रचार का प्रसार किया था. अधिकारियों के मुताबिक उनके कुछ इस तरह के लेख जम्हूरियत में भी छपे थे.

लेकिन अहमत सिक ने दरअसल सरकार के प्रोपेगेंडा पर सवाल उठाये थे. मिसाल के तौर पर उन्होंने अपने कुछ ट्वीट्स में तुर्की में रूस के राजदूत आंद्रे कारलोव का मुद्दा उठाया था जिनकी 16 नवंबर 2016 को जिहादी सोच से प्रेरित एक पूर्व पुलिस अधिकारी ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. सरकार का कहना है कि हमलावर गुलेन आंदोलन का समर्थक था. इस मामले में सिक ने ट्विटर पर सवाल किया था कि इस बात की वे क्या सफाई देंगे कि हत्यारा एक पुलिस अधिकारी था.

जम्हूरियत के जिन पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा शुरू हुआ है उनमें अखबार के प्रभारी संपादक मुरात साबुनचु और उनसे पहले संपादक रहे चान डूनडार भी शामिल हैं जो अभी जर्मनी में निर्वासन में रह रहे हैं. आरोपों में कहा गया है कि डूनडार के संपादक बनने के बाद से जम्हूरियत के रुख में बड़ा बदलाव आ गया. अधिकारियों के मुताबिक इसके बाद से अखबार ने "आतंकवादी संगठनों" के लक्ष्यों का समर्थन करने लग गया. डूनडार और अखबार के मुख्य संवाददाता एर्डम गुल पर गोपनीय दस्तावेजों को प्रकाशित करने के भी आरोप लगे.

मई 2015 में जम्हूरियत ने कुछ तस्वीरें छापीं जिनमें तुर्की से सीरिया जाने वाले ट्रकों की तलाशी होती हुई दिखायी गयी थी. इन ट्रकों में मानवीय सहायता के पीछे सैन्य साजोसामान थे जो संभवतः सीरियाई विपक्ष के लिए भेजे जा रहे थे. तुर्की की सरकार ने इस बात से इनकार किया कि ट्रकों में हथियार ले जाये जा रहे थे. लेकिन फोटो इसका उलट साबित कर रहे थे. जम्हूरियत अखबार ने इन तस्वीरों को हेडलाइन थी, ये हैं वे हथियार जिन्हें एर्दोवान मानने से इनकार करते हैं.

डुनडार और गुल के खिलाफ मुकदमे की पूरी दुनिया में निंदा हुई. सोमवार को शुरू होने वाले मुकदमे की पहले से ही तीखी आलोचना हो रही है. पत्रकारों के अधिकारों और स्थिति पर नजर रखने वाली संस्था रिपोर्टर्स विद आउट बॉर्डर्स के जर्मनी में निदेशक क्रिस्टियान मीर का कहना है, "जम्हूरियत तुर्की में गिने चुने स्वतंत्र मीडिया संस्थानों के साहसी प्रयासों का प्रतीक है. पत्रकारों को दोषी करार दिये जाने के भयानक परिणाम होंगे और इससे तुर्की की न्याय व्यवस्था की प्रतिष्ठा को नुकसान होगा."

केर्स्टन क्निप

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