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दुनिया

मोदी सरकार के रुख से खुश हुईं मुस्लिम औरतें

भारत की केंद्र सरकार ट्रिपल तलाक को खत्म करने के पक्ष में आ गई है. उसका कहना है इससे बहुविवाह को बढ़ावा मिलता है. केंद्र के इस रुख से मुस्लिम महिलाएं खुश हैं.

ऐसी मुस्लिम महिलाओं को तलाश पाना फिलहाल मुश्किल है जो ट्रिपल तलाक की व्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के हलफनामे का विरोध कर रही हों. महिलाओं, खासकर मुस्लिम महिलाओं के लिए काम करने वाली महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने बाहें खोलकर सरकार के रुख का स्वागत किया है. ये महिलाएं राजनीतिक रूप से सजग हैं. आरएसएस की विचारधारा और भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध हमेशा सड़कों पर रही हैं लेकिन उसी सरकार का यह स्टैंड उनके लिए बड़ी राहत है. इसकी दो मोटी वजहें हैं.

इस्लामी कानून

इस्लामिक कानून में महिलाओं को तलाक का अधिकार बिल्कुल उसी तरह है, जैसे मर्दों को. मगर मर्दों ने तलाक की व्यवस्था में अपनी सहूलियत के मुताबिक हेरफेर कर लिया है. मुसलमान पुरुष पलक झपकते ही पत्नी को तलाक तलाक तलाक बोलने में नहीं हिचकता जबकि औरतें शोषण और यातनाओं की चक्की में लंबे समय तक पिसने के बावजूद तलाक देने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं.

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम मर्दों द्वारा दिए गए तलाक पर लंबा अध्ययन किया है. इसकी सह संस्थापक नूरजहां सफिया नियाज कहती हैं, "मामले ऐसे भी आए हैं कि पत्नी सोई हुई है और पति तीन बार तलाक बोलकर उससे अलग हो गया. बीवी के मामू को बोल दिया कि मैं तुम्हारी भांजी को तलाक देता हूं या फिर गांव के किसी आदमी से अपनी पत्नी के मायके तलाक का संदेश भिजवा दिया."

जानिए, कहां होते हैं सबसे ज्यादा तलाक

इस्लामिक मामलों की जानकार डॉक्टर सईदा सय्यदैन हमीद कहती हैं कि भारतीय मुसलमानों में चल रही ट्रिपल तलाक की व्यवस्था दरअसल इस्लाम में औरतों को दिए गए अधिकार के विरुद्ध है. अगर हमने खुद आपस में बैठकर इस मामले को सुलझा लिया होता तो शायद सरकार को वाया सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दखल देने की जरूरत नहीं पड़ती.

भारतीय कानून

भारत में मुस्लिम विवाह विच्छेद कानून, 1939 भी है. यह कानून खासतौर से मुस्लिम महिलाओं को तलाक का अधिकार देता है. इसके मुताबिक कोई भी मुस्लिम औरत अपने शौहर से तलाक ले सकती है. वजह ये होनी चाहिए: पति का गैर जिम्मेदार होना, पत्नी का आर्थिक निबाह नहीं कर पाना, नपुंसक होना, जेल में होना, क्रूर होना, दिमागी हालत ठीक नहीं होना, मारपीट करना आदि.

इस्लामी कानून और भारतीय संविधान, दोनों में मुस्लिम महिलाओं को तलाक का अधिकार होने के बावजूद ट्रिपल तलाक की गैर इस्लामी और पुरातन प्रथा मुस्लिम औरतों को बुरी तरह दबाने वाली है. डॉक्टर सईदा कहती हैं कि कमाल फारूकी का बयान सुनकर लगता है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपने शर्मनाक रुख पर अभी भी कायम है. बोर्ड के कार्यकारिणी सदस्य जफरयाब जिलानी के अनुसार बोर्ड केन्द्र सरकार के पाबंद नहीं है. इसके बहाने बीजेपी समान नागरिक संहिता लागू करना चाहती है जो कि उसके चुनावी घोषणापत्र में पहले से मौजूद है. वह कहते हैं, "हमारा स्टैंड साफ है. इससे सरकार की असलियत खुल गई है कि वह पर्सनल लॉ में धीरे-धीरे घुसपैठ करना चाहती है." जिलानी बोर्ड की तरफ से इस केस को देख रहे है और मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश सरकार के अपर महाधिवक्ता हैं.

धार्मिक स्वतंत्रता

मजहबी उलेमा भी इस प्रकरण में हस्तक्षेप को अपनी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप मान रहे हैं. इस्लामिक मामलों के जानकार मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली के अनुसार ये एक झूठा प्रचार है कि तीन तलाक की प्रथा कई देशों में खत्म की जा चुकी है. फरंगी महली लखनऊ की सबसे बड़ी ऐशबाग ईदगाह के इमाम हैं और बोर्ड की कार्यकारिणी के सदस्य भी. उनके अनुसार पर्सनल लॉ कुरान और हदीस पर आधारित है. वह कहते हैं, "हुकुमत ने पर्सनल लॉ पर सीधा हमला बोला है और मुसलमान इसे बर्दाश्त नहीं करेगा. वह इसके खिलाफ लड़ाई लड़ेगा, भले ही कितनी लंबी लड़ाई हो. फिरंगी महली के अनुसार देश में समान नागरिक संहिता कभी लागू नहीं हो सकती क्योंकि इस देश में जनजातियों के लिए नागालैंड और मिजोरम जैसे राज्यों में अलग-अलग कानून हैं. ये सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है."

तीन तलाक एक क्रूर धार्मिक परंपरा है, जैसे कि ये सब

बोर्ड के समान नागरिक संहिता के आरोप पर डॉक्टर सईदा भी सहमत हैं. वह कहती हैं कि दरअसल यह सारी कवायद समान नागरिक संहिता लाने की तरफ बढ़ने की है. ट्रिपल तलाक़ पर सरकार का हलफनामा तार्किक है लेकिन जैसे ही वह इसके बहाने समान नागरिक संहिता की तरफ बढ़ेगी, हंगामा हो जाएगा. सईदा कहती हैं, "चूंकि अभी उत्तर प्रदेश समेत तीन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं. लिहाजा, मुमकिन है कि सरकार ट्रिपल तलाक के बहाने इस मुद्दे को उछाले. बेहतर होगा कि मुस्लिम समाज खुद आगे बढ़कर इस प्रथा को रद्द कर दें, वरना समान नागरिक संहिता के रूप में उन्हें आगे भारी कीमत चुकानी पड़ जाएगी."

अंदरूनी मतभेद

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उप कुलपति लेफ्टिनेंट जनरल जमीरुद्दीन शाह की बेटी सायरा शाह हलीम इस मुद्दे पर हमेशा मुखर रही हैं. वह कहती हैं, "जब पाकिस्तान जैसे देशों में इस प्रथा में बदलाव किया गया है तो कोई कारण नहीं दिखता कि भारत में यह जारी रहे क्योंकि यह पुरातन प्रथा महिलाओं में गैर बराबरी को जन्म देती है."

मुसलमानों के विभिन्न फिरकों में भी इस मुद्दे पर कड़वाहट शुरू हो गई है. पिछली 22 सितम्बर को शिया समुदाय द्वारा खुलकर इसका विरोध किया गया. आल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा अपनी कार्यकारिणी की बैठक में तीन तलाक के विरोध में प्रस्ताव पारित किया गया. बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास के अनुसार शिया समुदाय तीन तलाक के विरोध में हैं. मौलाना अब्बास के अनुसार शिया बोर्ड भी सुप्रीम कोर्ट जाएगा ताकि शिया समुदाय का भी पक्ष सुना जाए. बोर्ड ने एक मॉडल निकाहनामा भी जारी कर दिया है जिसमें तीन तलाक को कोई जगह नहीं दी गयी है.

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