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दुनिया

बेगुनाहों को जेल भेज रही है अमेरिकी न्याय व्यवस्था

अमेरिकी जेलों में ऐसे हजारों बेगुनाह बंद हैं जो अपराध कबूल करके सजा काट रहे हैं. लोग कहने लगे हैं कि न्याय व्यवस्था भटक चुकी है.

2005 में जेम्स ओचोआ को कार चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया. मुकदमा शुरू हुआ. अधिकारियों ने कहा, अपना गुनाह मान लो तो सजा कम होगी. ओचोआ बोले कि मैंने तो अपराध ही नहीं किया, फिर क्या कबूलूं. तीसरी बार जब अधिकारियों ने गुनाह कबूलने पर सजा कम करने की पेशकश की तो ओचोआ सोच में पड़ गए. उनके सामने दो रास्ते थे. गुनाह कबूलें और दो साल की जेल काट कर बाहर आ जाए. या फिर मुकदमा लड़ें और हार गए तो सारी उम्र जेल में बिताने को तैयार रहें. वह अपनी बेगुनाही साबित करना चाहते थे. लेकिन जज ने स्पष्ट कर दिया कि उनके छूटने की संभावना कम ही है. यानी दांव खेलने जैसा था जिसे हारने का मतलब था कि अपने बेटे को वह दोबारा कभी नहीं देख पाएंगे. ओचोआ बताते हैं, "मुझे लग रहा था कि मैं अपनी जिंदगी के साथ जुआ खेल रहा हूं."

ओचोआ ने गुनाह कबूल लिया. दो साल की जेल हो गई. जब उन्हें जेल में रहते एक साल हो गया तो एक और सबूत पुलिस को मिला. डीएनए जांच से पता चला कि जिस अपराध के लिए ओचोआ कैद काट रहे थे, वह किसी और ने किया था. ओचोआ को रिहा कर दिया गया. लेकिन तब तक वह एक साल जेल में काट चुके थे.

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अमेरिका में ऐसे सैकड़ों लोग हैं. 1989 से अब तक अमेरिका में कुल 1,900 लोगों को दोषी ठहराए जाने के बाद और सजा के दौरान नए सबूतों के चलते बेगुनाह मानते हुए जेल से रिहा किया गया है. इनमें से 300 लोग ऐसे हैं जिन्होंने कम सजा की खातिर गुनाह कबूल लिया था. पिछले ही ऐसे सबसे ज्यादा मामले आए थे. कुल 157 लोगों को बेगुनाह करार देते हुए जेल से रिहा किया गया जिनमें से 68 से कबूलनामे के बदले कम सजा की पेशकश स्वीकार कर ली थी.

आलोचकों का कहना है कि अमेरिका में न्याय विभाग पर बोझ बहुत ज्यादा है. लोग कम हैं और मामले कहीं ज्यादा. इसलिए वे प्ली बार्गेन यानी कम सजा के बदले कबूलनामे की पेशकश करते हैं. इससे अदालतें लंबे मुकदमों से बच जाती हैं. सरकारी धन और संसाधनों का भी खर्चा बच जाता है. मायामी के बड़े वकील डेविड ओ मार्कस कहते हैं, "हमारी न्याय व्यवस्था भटक चुकी है. कभी यह देश का सबसे सुनहरा हीरा हुआ करती थी. इसका सिद्धांत था कि भले ही 10 गुनहगार छूट जाएं लेकिन एक बेगुनाह को गलत सजा नहीं होनी चाहिए. अब तो ये हो रहा है कि व्यवस्था न सिर्फ बेगुनाहों को सजा दे रही है बल्कि उन्हें गुनाह कबूल लेने के लिए प्रोत्साहित कर रही है."

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पिछले साल जितने अपराधियों को अमेरिकी अदालतों ने सजा सुनाई, उनमें से 97 फीसदी ने अपना गुनाह कबूल कर लिया था. पिछले तीन दशक में गुनाह कबूलने की यह दर लगातार बढ़ती गई है. न्यूयॉर्क के संघीय जज जेड राकोफ कहते हैं, "जब सजाएं इतनी ज्यादा हों तो कोई हार कर ज्यादा सजा झेलने का खतरा नहीं उठाना चाहता. क्योंकि अगर आप हारते हैं तो फिर बहुत बहुत लंबे वक्त के लिए सलाखों के पीछे चले जाते हैं."

फिलहाल तो कोई नहीं जानता कि असल में कितने बेगुनाह हैं जो अपराध कबूल करके जेलों में बंद हैं. इस विषय पर कई सालों से अध्ययन कर रहे राकोफ कहते हैं कि समाजशास्त्रियों का अनुमान है कि 2 से 8 फीसदी लोग बेगुनाह हैं लेकिन अपराध कबूल करके जेल काट रहे हैं.

वीके/ओएसजे (एपी)

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