श्रीलंका ने चीन को सौंपा अपना अहम हंबनटोटा पोर्ट | दुनिया | DW | 26.07.2017
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दुनिया

श्रीलंका ने चीन को सौंपा अपना अहम हंबनटोटा पोर्ट

श्रीलंका की सरकार ने अपने एक अहम पोर्ट में चीन को बड़ी हिस्सेदारी बेचने वाले समझौते को मंजूरी दे दी है. चीन 1.12 अरब डॉलर में हंबनटोटा पोर्ट में 70 फीसदी हिस्सेदारी खरीदेगा.

हंबनटोटा पोर्ट काफी समय से घाटे में चल रहा है. लेकिन रणनीतिक रूप से इसे बहुत अहम माना जाता है. अब श्रीलंका की सरकार ने इसका संचालन चीन की एक सरकारी कंपनी को सौंपने का फैसला किया है. श्रीलंका के बंदरगाह मंत्री महिंदा समरसिंघे ने बताया कि चाइना मर्चेंट पोर्ट होल्डिंग्स के साथ 1.12 अरब डॉलर में सौदा हुआ है. समरसिंघे ने कहा कि चीनी कंपनी पोर्ट का संचालन करेगी, जबकि उसकी सुरक्षा श्रीलंका के हाथ में होगी. उन्होंने कहा कि इससे चीन की तरफ से पोर्ट का दुरुपयोग करने की आशंकाओं को दूर किया जा सकेगा.

हंबनटोटा हिंद समागार में दुनिया के सबसे व्यस्त पूर्व-पश्चिम अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट पर पड़ता है और कुछ देशों को आशंका है कि पोर्ट के चीन के हाथ में चले जाने से यह उसकी सेना का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है. लेकिन समरसिंघे का कहना है, "पोर्ट की सुरक्षा किसी और को नहीं दी जायेगी. यह काम सौ फीसदी श्रीलंकाई लोगों के हाथ में होगा."

उन्होंने कहा कि विदेशी नौसैनिक पोत हंबनटोटा पर आ सकते हैं जैसे कि वे राजधानी कोलंबो के मुख्य पोर्ट पर आये थे. उन्होंने कहा, "हम सभी के साथ अच्छे रिश्ते बना कर रखना चाहते हैं और किसी को नाराज नहीं करना चाहते."

साथ ही उन्होंने साफ किया, "हम पिछली सरकार की तरह किसी खास देश के साथ विशेष व्यवहार नहीं करेंगे." उनका इशारा 2014 की घटना की तरफ था जब दो चीनी पनडुब्बियां कोलंबो में आयीं. यह पहला मौका था जब कोई विदेशी पनडुब्बी वहां आकर रुकी थी.

भारत इससे खासा नाराज हुआ था. भारत श्रीलंका को अपना नजदीकी सहयोगी मानता है और वहां बढ़ते चीन के प्रभाव को वह संदेह की दृष्टि से देखता है. चीन श्रीलंका में बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजना में बड़ा निवेश कर रहा है, जिनमें पोर्ट के अलावा एयरपोर्ट भी शामिल हैं.

श्रीलंका की पिछली सरकार ने हंबनटोटा पोर्ट और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने के लिए चीन से आठ अरब डॉलर का लोन लिया था. लेकिन यह योजना कारोबारी लिहाज से नाकाम रही और उससे वहां काम करने वाले कर्मचारियों का वेतन देना भी संभव नहीं हो पाया. 2015 में आयी नयी सरकार अब इस लोन की शर्तों को नये सिरे से तय करने का प्रयास कर रही है.

समरसिंघे का कहना है कि हंबनटोटा में अभी और 60 करोड़ की पूंजी लगाने की जरूरत है. लेकिन श्रीलंका की सरकार इतना निवेश करने की स्थिति में नहीं है. इसलिए वह चीन की मदद पर निर्भर है.

एके/आरपी (एएफपी, एपी)

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