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मंथन

आप टीवी देख रहे हैं, टीवी भी आपको देख रहा है

घर में टीवी देखते हुए इंसान शायद ही सोचता है कि कोई उसे देख रहा है. लेकिन ड्राइंग रूम में स्मार्ट टीवी के आने के बाद ऐसा नहीं रहा. आप पर दुनियाभर की नजर है.

आधुनिक स्मार्ट टीवी डाटा तो रिसीव करते ही हैं, डाटा भेजते भी हैं. इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. फ्राउनहोफर इंस्टिट्यूट के प्रोफेसर मिषाएल वाइडनर कहते हैं कि लोग इस खतरे को समझ नहीं रहे. उन्होंने कहा, “यूजर इसे आम टीवी जैसा सोचते हैं जो बहुत ज्यादा कुछ नहीं करता. लेकिन स्मार्ट टीवी एक सक्रिय मशीन हैं, जो वह सब सुनती और देखती है, जो आप टीवी में देखते हैं या इंटरनेट पर करते हैं. बड़ा खतरा ये है कि लोग इसके प्रति संवेदनशील नहीं हैं. उनकी निगरानी हो रही है, लेकिन उन्हें पता ही नहीं है.”

कैसे काम करता स्मार्ट टीवी

हर बार जब हम स्मार्ट टीवी को ऑन करते हैं, या चैनल चेंज करते हैं, तो टीवी सेट उस चैनल की वेबसाइट को रिक्वेस्ट भेजता है. जर्मनी में वहां से एक डाटा सुरक्षा गाइडलाइन मिलती है, जिसका काम इस बात का ध्यान दिलाना है कि चैनल अब डाटा कलेक्ट कर रहा है. ये सूचना अक्सर छुपी हुई होती है. यूं भी डाटा कलेक्शन को रोका नहीं जा सकता. लेकिन इस डाटा का इस्तेमाल जिस तरह से हो सकता है, वह अपने आप में दिलचस्प है. डार्मश्टाट में आईटी एक्सपर्ट मार्को गिगलियेरी बताते हैं कि इसका सीधा असर आपकी जिंदगी पर होता है. उन्होंने बताया, “इस निगरानी का इस्तेमाल आपके अनुरूप विज्ञापन दिखाने के लिए हो सकता है. ये भी हो सकता है कि आपके मेडिकल इंश्योरेंस की फीस बढ़ा दी जाए क्योंकि आप बहुत ज्यादा टेलिविजन देखते हैं.“

चैनल इस तरह हमारे टीवी देखने की आदत का प्रोफाइल बना सकते हैं. यदि एक से ज्यादा लोग एक ही टेलिविजन सेट का इस्तेमाल करते हैं, तो इससे समस्या हो सकती है. गिगलियेरी कहते हैं कि पर्सनलाइज्ड विज्ञापन इस तरह के हो सकते हैं कि यदि आप रात में क्रइम फिल्में देखते हैं, तो दिन में आपके बच्चों को खास तरह के हथियारों का विज्ञापन दिखाया जाएगा.

निजता पर हमला

स्मार्टफोन पर हम जो डाटा के निशान छोड़ते हैं, अब उनकी मदद से आजकल पर्सनैलिटी प्रोफाइल बनाए जा सकते हैं. जबकि स्मार्टफोन सिर्फ ये रिकॉर्ड करते हैं कि हम कहां गए थे, हमने क्या किया, हमने कहां खरीदारी की और हम किस दुकान में कितनी बार गए. इससे आपके बारे में बहुत कुछ पता चल सकता है. एसआईटी के आईटी एक्सपर्ट हरवैस सीमो होम के मुताबिक तो काफी कुछ जाहिर हो जाता है. वह कहते हैं, “इस बात का पता किया जा सकता है कि मेरा व्यक्तित्व कैसा है. क्या मैं भावुक हूं या फिर खुले मिज़ाज वाला. यानि पर्सनैलिटी के जो पांच प्रमुख लक्षण होते हैं, जिनसे मनोविज्ञान में व्यक्तित्व का मानक तय किया जाता है, उन सब पर नज़र रखी जा सकती है.“

इन तस्वीरों से जानिए, हमारा फ्यूचर कैसा होगा

आप सोचिए कि आपके बॉस को ये डाटा मिल जाए. नौकरी के लिए आवेदन देने वालों को इस तरह की पर्सनैलिटी प्रोफाइल के आधार पर नौकरी मिल सकती है, या उनका आवेदन को ठुकराया जा सकता है. या फिर कंपनियां इसके आधार पर लोगों का भविष्य तय करेंगी. आईटी को सुरक्षित बनाने पर काम कर रहे वैज्ञानिक इसके खिलाफ एक नई रणनीति बना रहे हैं. इसके केंद्र में यह बात है कि हर कोई खुद तय करेगा कि वह अपना डाटा देना चाहता है या नहीं.

डार्मश्टाट में यूनिवर्सिटी और फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट के रिसर्चरों ने एक डाटा सेफ्टी बॉक्स डेवलप किया है, जो यूज़र को अपने डाटा का मालिक बनाता है. स्मार्ट टीवी के पीछे लगा छोटा सा कंप्यूटर बॉक्स, टीवी में आने जाने वाले डाटा पर नजर रखता है और जैसे ही कोई क्रिटिकल डाटा फ्लो दिखता है, तो मॉनिटर पर अलार्म भेज देता है. गिरलियेरी कहते हैं कि जैसे ही आप डाटा सेफ्टी बॉक्स का संदेश देखते हैं, अपने रिमोट कंट्रोल पर ग्रीन बटन दबाकर फैसला कर सकते हैं कि चैनल को आपका डाटा मिलना चाहिए या नहीं. अगर आप बटन नहीं दबाते हैं, तो चैनल को आपका डाटा नहीं मिलेगा.

डाटा सुरक्षा

हीटिंग थर्मोस्टैट, कैमरा, फिटनेस आर्मबैंड जैसे घरेलू इंटेलिजेंट गैजेट भी इंटरनेट के जरिये पर्सनल डाटा भेजते हैं. डाटा सुरक्षा कार्यकर्ताओं की मांग है कि कंपनियों को डाटा ट्रांसफर सिस्टम को पारदर्शी बनाना चाहिए और यूजर से उनके डाटा के इस्तेमाल की अनुमति लेनी चाहिए.

डाटा सुरक्षा भरोसे का महत्वपूर्ण कारक है. यदि आप कारोबार करना चाहते हैं तो आपको ग्राहकों में भरोसा जगाना होगा. डाटा सुरक्षा के बिना ये पैदा नहीं होगा और भरोसे के बिना कारोबार नहीं चलेगा.

यदि इंटरनेट प्रोवाइडर में आपका भरोसा नहीं है और आपके पास डाटा सेफ्टी बॉक्स भी नहीं है, तो एक ही विकल्प है, इंटरनेट का प्लग ऑफ कर दीजिए.

मार्टिन रीबे/एमजे

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