सरकारों और कंपनियों के बीच झूलते प्रवासी मजदूर | ब्लॉग | DW | 14.02.2018
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ब्लॉग

सरकारों और कंपनियों के बीच झूलते प्रवासी मजदूर

हाल में प्रधानमंत्री मोदी के मध्यपूर्व दौरे पर प्रवासी मजदूरों की जरूरतें भी फोकस में थीं. केसरिया पासपोर्ट वाला प्रस्ताव तो वापस ले लिया गया है लेकिन विदेशों में काम करने वाले मजदूरों के सशक्तिकरण का मुद्दा बना हुआ है.

लगता यही है कि अकुशल कामगारों के लिए देश हो या विदेश, हालात विडम्बनापूर्ण ही हैं. खाड़ी की ओर भारतीय कामगारों का रुझान सदी डेढ़ सदी पुराना है. लेकिन माना जाता है कि सत्तर के दशक में पहले "ऑयल बूम” ने इस रुझान को तीव्र कर दिया था. एक आकलन के मुताबिक करीब सत्तर से अस्सी लाख भारतीय, खाड़ी सहयोग परिषद् (जीसीसी) कहलाने वाले छह खाड़ी देशों- सऊदी अरब, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान और बहरीन में काम करते हैं. हालांकि तेल की कीमतों में कमी, अपने बेरोजगारों को प्राथमिकता देने की नीति और खाड़ी में अपेक्षाकृत अशांत माहौल के बीच पिछले दो साल में कामगारों की संख्या में करीब दो लाख की गिरावट दर्ज की गई है.

भारतीय मजदूर हर साल 40 अरब डॉलर घर भेजते हैं. 2014-15 में भारत ने करीब 70 अरब डॉलर हासिल किए थे. लेकिन इसमें भी गिरावट आई और 2015-16 में ये आंकड़ा घटकर करीब 65 अरब डॉलर का रह गया. संख्या और राशि में गिरावट के बावजूद यह भी सच है कि ये मजदूर देश के विदेशी मुद्रा भंडार में योगदान तो दे ही रहे हैं. बदले में प्रवासी कामगारों को क्या मिलता है, ये देखना जरूरी है क्योंकि विदेश की तैयारी करने, वहां पहुंचने और वहां जीवन शुरू करने के विभिन्न चरणों में ये लोग भ्रष्टाचार, दलाली और ठगी समेत कई तरह की समस्याओं का सामना करते हैं. सुरक्षा और कल्याण से जुड़े इन प्रवासियों के बुनियादी मुद्दे अनसुलझे ही रह जाते हैं.

सबसे पहली मुश्किल तो पासपोर्ट हासिल करने को लेकर ही आती है. जैसे तैसे पासपोर्ट बनकर तैयार हो जाए तो नियोक्ता एजेंसियां और एजेंट इन्हें काम पर रखते हैं. वे अक्सर सेवा शर्तों, काम की अवधि और अन्य जरूरतों या सुविधाओं के बारे में तफ्सील से पूर्व जानकारी देने से बचते हैं. इस नाते इन देशों में स्थित भारतीय मिशनों या दूतावासों की भी जवाबदेही बनती है कि कम से कम वे कंपनियों के प्रोफाइल और उनकी विश्वसनीयता की पूरी जांच परख तो करें. दोतरफा समझौतों में इस बात पर बल दिया जा सकता है कि अकुशल वर्कफोर्स के लिए नियुक्ति की प्रत्यक्ष प्रक्रिया अपनाई जाए, यानी कंपनियां सीधी भर्ती करें. कुछ तकनीकी दिक्कतों के बावजूद ये प्रक्रिया इस लिहाज से बेहतर होगी कि इसमें दलालों और एजेंटों की भूमिका और विदेशी जमीन पर कंपनी की असलियत को लेकर कोई संदेह नहीं रहेगा. इमीग्रेशन चेक की जरूरत को लेकर भी पासपोर्ट नीति में पुनर्विचार की जरूरत है. पासपोर्ट का रंग बदलना इस समस्या का स्थायी हल नहीं हो सकता.

अगर प्रवासी मजदूरों के प्रति भारत सरकार वास्तव में सहानुभूतिपूर्ण रवैया रखती है तो उसे फौरन कुछ सुधार इस दिशा में करने चाहिए. सरकारों के स्तर पर संवाद और समझौते तो एक वृहद उपाय है ही, इसके अलावा इन देशों में तैनात अपने दफ्तरों या दूतावासों को नियुक्ति प्रक्रिया में दखल देने को कहा जाना चाहिए. उन्हें न सिर्फ इस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने में सहयोग करना चाहिए बल्कि आगे बढ़कर मजदूरों को भरोसे में लेना चाहिए. नियुक्ति के फर्जीवाड़े पर कानूनी कार्रवाई के अलावा उन कंपनियों या एजेंटों को चिंहित करना चाहिए जो मजदूरों के साथ खराब व्यवहार करते या सेवा शर्तों का उल्लंघन करते पाये जाएं. जानकारों के मुताबिक वीजा ट्रेडिंग को भी आपराधिक घोषित करना चाहिए.

ये भी कम महत्वपूर्ण नहीं कि किसी संकट या आपात हालात में भारतीय कामगारों की सुरक्षा के लिए या उन्हें सुरक्षित निकाल लाने के लिए एक सुचिंतित और स्थायी व्यवस्था बनाई जाए. ऐसे मौकों पर कामगारों से संवाद और उनकी आर्थिक मदद भी बहुत जरूरी है. जो कामगार काम के हालात से निराश होकर लौटना चाहते हैं, उनके लिए भी एक्सिट नियम लचीले और सहानुभूतिपूर्ण हों. यही नहीं स्वदेश लौटने पर वे अवसाद और तकलीफ के नए दुष्चक्र में न फंस जाएं, इसके लिए राज्य सरकारें एक सहायता पैकेज या पेंशन या मामूली कर्ज की व्यवस्था कर सकती हैं. उनके स्वास्थ्य और रोजगार के लिए सरकारें अगर उपाय कर सकें तो वे सही शासन धर्म निभाएंगी. उन्हें अपने हाल पर छोड़ देने की प्रवृत्ति इधर बढ़ी है, लोग इधर कुआं उधर खाई जैसे हालात में भटकने को विवश हैं. करीब 80 फीसदी कामगार गरीब होते हैं. सरकारों का दायित्व है कि वे अपने नागरिकों से ऐसे वक्त में मुंह न मोड़ें और उन्हें सामान्य जीवन की ओर लौटने में मदद करें.

ये भी कम ध्यान देने वाली बात नहीं कि अत्यधिक कमाई के लालच में या कर्ज जैसे किसी वित्तीय संकट से उबरने के लिए मजदूर विदेशों में गलत हाथों में न फंस जाएं. इसके लिए उनकी निरंतर काउंसिलिंग की व्यवस्था भी दूतावास स्तर पर होनी चाहिए. बेशक ये समय, निरंतर उत्पादन और निरंतर उपभोग की विकट भूमंडलीयता को रेखांकित करता है लेकिन ऐसे में बुनियादी जिम्मेदारी सरकारों और संस्थाओं की भी है कि वे उस अंतरराष्ट्रीयता को न भूलें जिसमें एक सहज और सौहार्दपूर्ण नागरिक आवाजाही संभव रहती है और जो पारस्पारिकता की भावना पर आधारित है. 

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