सुप्रीम कोर्ट को हिंदुत्व पर फैसला देने का हक है भी या नहीं? | दुनिया | DW | 17.10.2016
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दुनिया

सुप्रीम कोर्ट को हिंदुत्व पर फैसला देने का हक है भी या नहीं?

सुप्रीम कोर्ट हिंदुत्व पर सुनवाई कर रहा है. लेकिन उसे इस बात पर सुनवाई करनी भी चाहिए या नहीं?

भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस टी. एस. ठाकुर की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की सात-सदस्यीय खंडपीठ 21 साल पहले तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जस्टिस जे. एस. वर्मा की अध्यक्षता वाली तीन-सदस्यीय खंडपीठ द्वारा हिन्दुत्व के बारे में दिये गए फैसले पर पुनर्विचार करने जा रही है. इस वृहत खंडपीठ द्वारा दिया गया फैसला देश की राजनीति के लिए उसी तरह बेहद महत्वपूर्ण होगा जिस तरह 1995 में जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ का फैसला 1990 के दशक के उत्तरार्ध और बाद के दशकों की राजनीति के लिए सिद्ध हुआ था. इस फैसले के कारण हिन्दुत्व को न केवल संवैधानिक वैधता प्राप्त हो गई थी बल्कि उसकी राजनीतिक स्वीकार्यता में भी रातोरात अभूतपूर्व वृद्धि हो गई थी. इस फैसले के अनुसार हिन्दुत्व या हिंदुइज्म मात्र एक जीवनपद्धति है और उसका किसी धर्म से कोई वास्ता नहीं है. इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था भी दी थी कि यह कहना कि महाराष्ट्र में एक हिन्दू राज्य स्थापित होगा इस बात का द्योतक नहीं है कि धर्म के आधार पर वोट मांगा जा रहा है.

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इस फैसले को पढ़कर एक अजीब-से आश्चर्य की अनुभूति होती है. इसमें संविधान सभा की बहसों, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, दार्शनिक सर्वपल्ली राधाकृष्णन तथा कई अन्य विचारकों को उद्धृत किया गया है लेकिन ‘हिन्दुत्व' की राजनीतिक अवधारणा के जनक विनायक दामोदर सावरकर को नहीं. यदि विद्वान न्यायाधीश इसी नाम की पुस्तिका, जो 1923 में प्रकाशित हुई थी, पर भी नजर डाल लेते तो उनके सामने हिन्दुत्व की अवधारणा स्पष्ट हो जाती और वे उसे जीवन पद्धति न बताते. यही नहीं, इस फैसले में एक आश्चर्यनक बात यह भी कही गई है कि यदि हिन्दू कोई अन्य धर्म अपना ले तो भी वह हिन्दू ही रहता है. यदि ऐसा होता तो फिर भारत में सांप्रदायिक समस्या ही न पैदा होती और न पहले आर्यसमाज को ‘शुद्धि' का और इन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों को ‘घर वापसी' का कार्यक्रम चलाना पड़ता क्योंकि इन कार्यक्रमों का लक्ष्य मुसलमानों और ईसाइयों को इस आधार पर फिर से हिन्दू बनाना है कि वे कभी हिन्दू हुआ करते थे. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से हिंदुत्ववादी शक्तियों को कितनी मदद मिली इसका पता इसी बात से चलता है कि इसके ठीक बाद केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहले 1996 में, फिर 1998 में और फिर 1999 में सरकार बनी और भारतीय जनता पार्टी देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी.

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सुप्रीम कोर्ट का काम संविधान की व्याख्या करना है, कानून की समीक्षा करते हुए यह देखना है कि वह संविधान के अनुरूप है या नहीं और इस बात को सुनिश्चित करना है कि कार्यपालिका और विधायिका संविधान के अनुसार काम करें. इसलिए इस संदर्भ में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि उसे अपने किसी भी फैसले में धार्मिक, दार्शनिक,  राजनीतिक और वैचारिक मुद्दों पर अपनी राय देनी चाहिए या नहीं. हिन्दुत्व की अवधारणा के जनक विनायक दामोदर सावरकर ने स्वयं कहा है कि यह शुद्ध रूप से राजनीतिक अवधारणा है जिसका अर्थ `हिंदूपन` है, हिन्दू धर्म नहीं. इसका लक्ष्य देश में हिंदुओं का राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना है क्योंकि हिन्दू ही राष्ट्र की मुख्यधारा हैं जिसका कारण यह है कि उनकी पुण्यभूमि और मातृभूमि भारत है जबकि मुसलमानों और ईसाइयों के तीर्थस्थल भारत से बाहर हैं और भारत उनकी पुण्यभूमि नहीं है. हिन्दुत्व की विचारधारा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा जैसे उससे जुड़े सभी संगठन मानते हैं. इसके अनुसार हिन्दू,  राष्ट्रीय और भारतीय समानार्थी शब्द हैं. इसीलिए हिन्दुत्व के अनुसार गैर-हिंदुओं की राष्ट्र के प्रति भक्ति और प्रेम संदिग्ध है.

क्या सुप्रीम कोर्ट को इस प्रकार के विवादास्पद राजनीतिक-धार्मिक प्रश्नों पर विचार करके अपनी राय देनी चाहिए? क्या हिन्दुत्व का प्रश्न कोई कानूनी या संवैधानिक प्रश्न है? क्या यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने अधिकारक्षेत्र का अतिक्रमण करके राजनीति में दखलंदाजी करना नहीं है? 1995 के फैसले से इस प्रकार के अनेक प्रश्न खड़े होते हैं. आशा की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट की सात-सदस्यीय खंडपीठ फैसले की समग्रता में समीक्षा करते समय इन सवालों के जवाब भी देगी.

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