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दुनिया

सलमान छूट गए, लाखों सड़ रहे हैं जेलों में

बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान को जोधपुर हाईकोर्ट से मिले न्याय पर शुभचिंतक और समर्थक खुश हैं लेकिन मामूली मामलों को लेकर जेलों में बंद हजारों गरीबों की न्याय को लेकर उम्मीद जस की तस है.

बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान को जोधपुर हाईकोर्ट ने काला हिरण शिकार के दोनों मामलों में बरी कर दिया है. इसके पहले हिट एंड रन केस में भी सलमान खान को बॉम्बे हाई कोर्ट ने बरी कर दिया था, हालांकि यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है. सवाल यह है कि सलमान जैसे साधन संपन्न लोग बरी हो जाते हैं जबकि हजारों आम लोग, मामूली मामलों में भी जेल की चारदीवारी से निकल ही नहीं पाते.

क्या था सलमान का केस?

दरअसल, मामला 'हम साथ साथ है' फिल्म की शूटिंग के दौरान का है और सलमान पर आरोप है कि 28 सितंबर 1998 को उन्होंने दो चिंकारा के शिकार किए थे. चिंकारा वन्य जीव अधिनियम के तहत संरक्षित जीव हैं. लिहाजा मामला संगीन है. निचली अदालत ने 10 अप्रैल को सलमान खान को दोषी ठहराया था. सलमान इस मामले में इससे पहले जोधपुर जेल जा चुके हैं.

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हाईकोर्ट में सलमान के वकील ने दावा किया है कि यह केस सिर्फ परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर चलाया गया था. दोनों ही केस ड्राइवर हरीश दुलानी के बयान पर आधारित हैं. हिरणों की खाल भी बरामद नहीं हुई है. यही नहीं, सलमान के वकील का कहना है कि जिस ड्राइवर हरीश दुलानी के बयान पर केस दर्ज हुआ है वह क्रॉस एग्जामिनेशन में पेश नहीं हुआ है. इसके अतिरिक्त यह दावा किया गया कि जिस एयरगन से शिकार का आरोप है उससे चिंकारा को तो मारा ही नहीं जा सकता. इसके अलावा सलमान के वकीलों ने एक ही जगह पर चिंकारा के दो शिकार के मामलों में 5 और 1 साल की सजा देने पर भी सवाल उठाया.

उच्च न्यायलय में विश्नोई समुदाय का यह दावा कि उनके पास सलमान खान को कड़ी सजा दिलाए जाने के पुख्ता आधार हैं, काम नहीं आया. उच्च न्यायलय ने काला हिरण और चिंकारा शिकार मामले में सलमान को बरी कर दिया है. वहीं उन्हें निचली कोर्ट से मिली पांच साल और एक साल की सजा को भी खत्म कर दिया है. विश्नोई समुदाय सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है.

इसके पहले सलमान खान को हिट एंड रन केस में भी राहत मिल चुकी है. बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन्हें इस मामले से बरी कर दिया था. हालांकि यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है.

सलमान छूट गए पर काफी बाकी हैं अभी

इस मामले में 28 सितंबर 2002 की आधी रात पार्टी कर घर लौट रहे सलमान खान की लैंड क्रूजर हिल रोड पर अमेरिकन एक्सप्रेस बेकरी में घुस गई थी. सलमान ने दूसरे दिन सुबह सरेंडर किया था. पुलिस स्टेशन से ही उनकी जमानत हो गई थी. अक्टूबर 2002 में सलमान पर आईपीसी की धारा 302-II (गैर इरादतन हत्या) लगाई गई. मुंबई सेशन्स कोर्ट ने इस मामले में मई 2015 में सलमान को 5 साल की सजा सुनाई थी. लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने पिछले साल दिसंबर में सलमान को बरी कर दिया था. जनता में आई प्रतिक्रिया के बाद महाराष्ट्र सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर की है. जिस पर सुनवाई होनी है. इसी मामले में सलमान ने भी सुप्रीम कोर्ट में कैवियट दायर की है.

न्याय के लिए हाथ पैर मारते गरीब

वर्तमान न्याय-व्यवस्था में आम आदमी के लिए न्याय पाना काफी मुश्किल है. विधि आयोग के सहयोग से राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा किए गए एक ताजा अध्ययन से इस बात की पुष्टि भी हुई है. इस अध्ययन से पता चलता है कि गंभीर अपराध के आरोपी संपन्न लोग पैसे के बल पर नामी वकीलों की फौज खड़ी कर अक्सर बच जाते हैं जबकि निर्धन व्यक्ति को फांसी के फंदे पर झुला दिया जाता है. अधिवक्ता रवि श्रीवास्तव का कहना है कि न्याय व्यवस्था की जटिलता के चलते आम लोगों को कष्ट ज्यादा होता है. निर्धनों के लिए न्याय पाना और भी मुश्किल है. सलमान जैसी कोशिशें निर्धन व्यक्ति नहीं कर सकता इसलिए मामूली से मामलों में वह जेलों में सड़ता है. अधिवक्ता राजकुमार का कहना है कि बहुत से गरीब तो केवल इसलिए जेलों में बंद हैं क्योंकि वे जमानत के लिए वकील का खर्चा नहीं उठा सकते.

देखिए, कैसे-कैसे केस हार जाते हैं लोग

एक अनुमान के अनुसार देश की जेलों में ढ़ाई लाख से ज़्यादा कैदी मात्र आरोपी हैं, अपराधी नहीं. यह कुल कैदियों की संख्या का दो तिहाई से अधिक है. इस बात में कोई शक नहीं कि संविधान देश के हर नागरिक को समान दर्जा, समान अधिकार और समान कानून सम्मत संरक्षण प्रदान करता है, लेकिन किसी मामले में फंस जाने आम आदमी अदालत का दरवाजा खटखटाने से पहले सौ बार सोचता है. बड़े और चतुर अनुभवी वकील बाल की खाल निकालने में माहिर होते हैं, और ऐसे वकीलों के तर्क के सामने गरीबों के सत्य-तथ्य, न्याय दिलाने के लिए काफी नहीं होते.

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