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मनोरंजन

सौ साल की खलनायकी

इसे दुर्लभ संयोग कह लीजिए कि जब भारतीय सिनेमा सौ साल पूरे कर रहा है तो सिने जगत का सबसे बड़ा सम्मान- दादा साहेब फाल्के पुरस्कार चरित्र अभिनेता और अपने दौर के सर्वश्रेष्ठ खलनायक प्राण को देने का एलान किया गया है.

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यूं प्राण का नाम पिछले कुछ वर्षों से दौड़ में और अटकलों में रहता आता था. लेकिन ये भी उनके लिए 93 साल की उम्र में गौरव की बात बन गई कि शताब्दी वर्ष में सबसे बड़े फिल्म पुरस्कार के हकदार वही बने हैं. सौ साल के मौके पर इस तरह ये सम्मान खलनायकी के बेहतरीन अदाकार को गया है.
हिन्दी सिनेमा के 100 साल के इतिहास में नायक खलनायक वर्गीकरण पर नजर डालें तो अजीब सा संयोग दिखता है. फिल्मों में खलनायकी का इतिहास, कार्ल मार्क्स के हवाले से कहें, तो वर्ग संघर्ष का इतिहास भी रहा है. हिन्दी सिनेमा का पहला दशक धार्मिक फिल्मों के नाम रहा जहां देव दानव संघर्ष था, फिर दुनिया और समाज और ब्रिटिश गुलामी से जूझ रहे देश की तत्कालीनता की छायाएं वहां पड़ने लगीं. सामंत-दास, जमींदार-किसान, साहूकार कर्जदार जैसी वर्गीय टकराहटें और उनसे जुड़ी दास्तानें सामने आईं. हम यहां देश दुश्मन का भी हवाला देंगे, खास कर गुलामी का दौर और उसके बाद 1962, 1965, 1971 और 1999 में पड़ोसी सीमाओं पर हुए युद्धों के हवाले से. इन लड़ाइयों ने भी विलेन के रूप में कभी व्यक्ति कभी देश कभी संस्थान कभी गिरोह को पेश किया.

Shatrughan Sinha

खलनायक से नायक


गांव से खलनायक कूदता फांदता शहरी दीवारें तोड़ कर किलेनुमा इमारतों में आ गया और वहां से उसने अपना दमनचक्र शुरू किया. उसके पास अपार संपत्ति, अपार ताकत और अपार शोहरत और सब कुछ अपार होता था. इसी अपारता को भेदने प्रकट होता था नायक, वह गांव से आया हुआ भोला किसान भी हो सकता था या भटकता बेरोजगार या फिर छलिया शहरी या मसखरा जेबकतरा. वह नायिकाओं के दिलों पर सहसा राज कर लेता था, खलनायकों के यहां नौकर बन जाने में हिचकता नहीं था और समय आने पर आग लगा देता था या अभूतपूर्व हृदय परिवर्तन करा सकता था.
पूंजीवाद के आगमन के बाद और हॉलीवुड में नाना तकनीकी प्रयोगों के 80 के दशक के दौर के बाद हिन्दी सिने खलनायक भी कुरुप, बेढंगा और अजीबोगरीब हुआ. जबकि एक समय तक यानी सिने शुरुआत के दो तीन दशकों के दरम्यान कई फिल्म कहानियों के विलेन में आखिरकार जान रहे या न रहे मनुष्यता रह जाती थी. और उसे भी भावुकता से याद किया जाता था.
बाजार की ताकतें हर ओर जैसे जैसे छाने लगीं, भूमंडलीकरण ने रफ्तार पकड़ी, निवेश बढ़े तो खलनायक अप्रतिम शक्तियों से लैस होता गया. यानी वो बाज दफा दैवी शक्तियों का भी मालिक बन बैठा, एक खतरनाक कुटिल जादूगर और उसके सामने नायक के पास एक मासूम मुस्कान ही होती थी और ज्यादा से ज्यादा एक लाठी या कोई मुड़ातुड़ा चाकू या जादू की टोपी या अंगूठी या फिर दर्शकों की तालियां. बस इन्हीं कुछ गिने चुने हथियारों से वो जादूगर के विराट तिलिस्म को धराशायी करने निकल पड़ता. खलनायकी में एक वक्त जादूगर की जगह सिरफिरे वैज्ञानिक या दुनिया को फतह करने की लालसा रखने वाले एक शैतान ने ली. मिस्टर इंडिया के मोगैंबो से लेकर कृष के टॉप साइंटिस्ट तक हम जिसके शेड्स देख सकते हैं.


समाज में शोषक शक्तियां अलग अलग वक्तों में रूप रंग और तरीके बदलती आई हैं. ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर फिर शहरीकरण के दौर की स्याह हलचलें भी पर्दे पर चली आईं. गुंडे मवाली चोर उचक्के बदमाश से लेकर हत्यारे, बलात्कारी, माफिया, डॉन सामने आने लगे. पचास और साठ के दशक में जमींदार और साहूकार की क्रूरता थी, साठ और सत्तर के दशक में नगर सेठ और उद्योगपतियों और बड़े कारोबारी विलेन हुए, अस्सी के दशक में माफिया और डॉन आये और नब्बे के दशक में न्यू माफिया और सुपर विलेन आया जिसका कोई एक घोषित कारोबार या दांव नही होता था.
21वीं सदी में विलेन तो जैसे हीरो के साथ घुलमिल गया, उसी से निकलकर वो पर्दे पर बुरी हरकतें करने चला आता था. कोई नहीं जानता था कि हम नायक देख रहे हैं या खलनायक या प्रति नायक. वो मानसिक रोग का शिकार हुआ हो सकता था, साइकोपैथ किलर के रूप में हमें डराता हुआ. 21वीं सदी में आतंकवाद को भी पर्दे पर पेश किया गया. अमेरिकी प्रोपेगेंडा के झुकाव वाले अधिकतर हास्यास्पद तरीकों से अल्पसंख्यकों को इनमें विलेन और बुरी ताकतों के रूप में पेश किया गया. जिसकी सबसे ताजा मिसाल कमल हासन जैसे फिल्मकार की बनाई विश्वरूपम है जो एक खास माइंडसेट की ओर इशारा करती है. इसी फिल्म के हास्यास्पद टेरेरिस्ट सरदार बने राहुल बोस. न जाने क्यों न जाने कैसे. ये वही दौर है जिसकी शुरुआत में हिन्दी फिल्मों के घोषित नायकों में खलनायकी में कूद जाने की हसरतें भी बढ़ी. जिनमें अमिताभ से लेकर शाहरुख और जॉन अब्राहम के नाम हैं.


हिन्दी फिल्मों ने नायक के लिए ही प्रयोग नहीं किए कि कैसे उसकी छवि कितनी निराली कितनी मोहक कितनी दीवाना किस्म की गढ़ी जाए, प्रयोग खलनायकी के लिए भी खूब हुए. यानी उसे कितना विध्वंसक, बर्बादी का कितना बड़ा मास्टर, कितना हाड़ कंपा देने वाला और कितना हिंसक और कितना बेरौनक दिखाया जाए कि दर्शक न उठ सकें न भाग सकें न बैठे रह सकें, ऐसी सिहरन से वो रस्सी की तरह दर्शक को जकड़ दे.
इस सिलसिले में पहला नाम स्वाभाविक रूप से जेहन में गब्बर सिंह का ही आता है जिसके किरदार पर मशहूर फिल्मकार शेखर कपूर की टिप्पणी थी कि हिन्दी फिल्मों की स्पष्ट विभाजन रेखा- शोले फिल्म हैं. शोले के बाद और शोले के पहले की फिल्में. ये विभाजन रेखा महज अपनी मल्टीस्टारर और संवाद और धांयफाय और गांव देहात शहर और दो जोड़ी नायक नायिका और तमाम धूल धक्कड़ और एक्शन प्रस्तुति के चलते शोले ने नहीं हासिल की थी- इसमें विलेन के किरदार के रूप में गब्बर सिंह का भी बड़ा रोल था. पचास पचास कोस तक बच्चों के रोने पर मांओं का कहना है कि सो जाओ गब्बर आ जाएगा- ये हिन्दी के मेनस्ट्रीम सिनेमा के आने वाले खलनायकों के लिए भी एक बड़ा इशारा था. अपनी बर्बरता में और भी आगे जाने का शैतानी आह्वान. ऐसा हुआ भी.
इस फेर में पड़ना उचित नहीं कि हिन्दी सिनेमा के 100 साल में पहले 10 या पहले 20 खलनायकों में कौन आता है कौन नहीं, ये लिस्ट अंतिम रूप से शायद न बने और हमेशा ही इस पर विवाद रहें, लेकिन ये तय है कि अच्छाई के सामने बुराई को चाहे अनचाहे ग्लोरीफाई करने का, सामर्थ्य के सामने ताकत की बुलंदी का डंका पीटने का और मासूमियत के सामने कुटिलताओं को स्पेस देने का सिलसिला शोले से जो शुरू हुआ था वो जारी है, अच्छाई बेशक जीत जाती है लेकिन आप देखेंगे कि इसके लिए उसे बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ रही है. बहुत नुकसान हो रहा है बहुत सारी जानें जाती हैं बहुत सारा मलबा इकट्ठा हो जाता है. इन सबसे निपटने के लिए आखिर कौन बचा रहता है. नायक नायिका तो अपने घर चले जाते हैं.
क्लाइमेक्स के भी एक छूटे हुए क्लाइमेक्स में आप पाते हैं कि जब धूलोगुबार बैठ जाता है चीखें गायब हो जाती हैं आंसू सूख जाते हैं संकट टल जाते हैं पुलिस की गाड़ियां रवाना हो जाती हैं और कराहें जमा हो जाती हैं तब पर्दे पर दूर कोने में सहसा एक पत्थर हिलता है, एक हाथ कांपता है और एक अट्टाहस पर्दे को कवर लेता है, ये खलनायक के लौटने के संकेत हैं, एक सिक्वेल की तैयारी है. आने वाले दिनों में धूम-तीन नामक फिल्म में आप हमारे हिन्दी सिनेमा के सबसे होनहार अभिनेताओं में एक आमिर खान को एक दुर्दांत विलेन के रूप में देखने वाले हैं जो उनके मुताबिक समाज से ही आता है. उनका ये भी कहना है कि अब पटकथा में खलनायक को गढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती. इस बात से क्या ये आशय है कि अब विलेन वहीं रहता है.
ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी
संपादनः अनवर जे अशरफ

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