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दुनिया

कुंवारी लड़कियों को घर नहीं मिलते

मुंबई में लड़की होना मुश्किल है. अकेली होना और मुश्किल है. लेकिन कुंवारी अकेली किरायेदार होना तो मुसीबत है. इस विशाल शहर में कुंवारी लड़कियों को घर नहीं मिलते.

Indien Mumbai Indisches Mädchen hält Solar Lampe (Getty Images/AFP/P. Paranjpe)

तस्वीर प्रतीकात्मक है

संगीता शर्मा को 25 साल की हुए कुछ ही महीने हुए थे जब वह मुंबई पहुंची थीं. उत्तर भारत के अपने छोटे शहर को पीछे छोड़ ख्वाबीदा शहर मुंबई में. लेकिन छोटे शहर की बातों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. सब यहां भी वही पूछ रहे थे जो वहां पूछा जाता था, अब तक शादी क्यों नहीं हुई.

संगीता पहले अपनी एक आंटी के यहां रही. फिर वह एक वर्किंग विमिंज हॉस्टल में चली गईं. और कुछ साल बाद जब वह एक इवेंट मैनेजमेंट फर्म में अच्छी तन्ख्वाह पा रही थीं तो उन्होंने सोचा कि अब अपना एक घर हो. वह जानती थीं कि मुंबई में यह आसान नहीं है. शहर बहुत बड़ा है और घर बहुत कम. सवा करोड़ की आबादी वाले इस शहर में 450 नए लोग रोज आ रहे हैं. लेकिन दिक्कत सिर्फ किल्लत की नहीं है. मुंबई के मकान मालिकों की ऐसी छवि बन गई है कि किरायेदार पहले से ही डरा रहता है. कुछ सिर्फ शाकाहारियों को घर देते हैं तो कुछ कहते हैं कि मुसलमानों को नहीं देंगे. और कमरा किराये पर चाहने वाली एक अकेली लड़की तो हमेशा उनकी सूची में सबसे आखिर में होती है.

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संगीता को तब तक इस बात का नहीं पता था. तो जब उन्होंने घर खोजने शुरू किए, उनका सामना सवालों से होने लगा. शादी नहीं की? रात को देर से घर आती हो? तुम्हारे मर्द दोस्त हैं? संगीता बताती हैं, "वे लोग वैसे ही थे, जैसे मेरे सबसे रूढ़िवादी रिश्तेदार, जिनसे पीछा छुड़ाकर मैं आई थी. और जब मैं इस बारे में अपने दोस्तों को बताने लगी तो पता चला कि मुंबई में तो ये बातें आम हैं. उस शहर में ये बातें आम हैं जिसे हम प्रगतिशील और अंतरराष्ट्रीय समझते हैं."

35 साल की फिल्मकार शिखा माकन को भी इसी सब से गुजरना पड़ा जिसे वह "मकान मालिकों के साथ दर्दनाक मुठभेड़" कहती हैं. वह दिल्ली से 2006 में मुंबई गई थीं. दो साल पहले उन्होंने इस मुद्दे पर एक डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाने का फैसला किया कि मुंबई में लड़कियों को किराये पर मकान लेने में क्या क्या मुश्किलें आती हैं. इस फिल्म का नाम है बैचलर गर्ल्स. इस फिल्म में कई लड़कियों ने अपने अनुभव बताए हैं. एक लड़की कहती है, "सपना जल्दी डरावना हो जाता है." यह लड़की बताती है कि उसे एक ही प्रतिक्रिया बार बार मिली, "अकेली हो, नहीं मिलेगा."

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ऐसा नहीं है कि अनजान लड़कियों को ही यह सब सहना पड़ता है. जानमानी एक्टर कल्कि कोचलिन जब अपने पति अनुराग कश्यप से अलग होकर घर खोजने लगीं तो उन्हें भी इसी सब से गुजरना पड़ा. वह बताती हैं, "मकान मालिक और ब्रोकर आपके साथ फोटो खिंचाना चाहते हैं, आपके ऑटोग्राफ मांगते हैं लेकिन आपको घर नहीं देना चाहते."

घर मिल जाने के बाद भी जिंदगी कोई आसान नहीं हो जाती. माकन की फिल्म में कई लड़कियों ने डरावने अनुभव साझा किए हैं. एक ने कहा कि जब मैं देर से घर आती तो बिल्डिंग के पहरेदार फब्तियां कसते. एक अन्य के पुरुष दोस्त घर आए तो उस पर वेश्यालय चलाने का आरोप लगा दिया गया. एक के घर पर देर रात को अनजान पड़ोसी दरवाजा खटखटाते थे. ये सारी लड़कियां सफल हैं. आजाद हैं. अच्छा कमाती हैं. कोई आईटी स्पेशलिस्ट है तो कोई किसी कॉरपोरेट फर्म में ऊंची पोस्ट पर है. लेकिन समाज की निगाहों में ये सिर्फ अकेली कुंवारी लड़किया हैं.

वीके/एके (डीपीए)

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