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दुनिया

आगे नहीं बढ़ रही शरणार्थियों की फाइलें

जर्मनी में पिछले तीन साल में दस लाख से ज्यादा शरणार्थी पहुंचे हैं लेकिन इनका देश में रहना तभी तय हो सकेगा, जब इनकी फाइलों का काम पूरा हो जाएगा. फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा.

अपनी जान पर खेल कर समुद्र पार कर सीरिया और इराक जैसे युद्धग्रस्त देशों से जर्मनी पहुंचे लोग अपनी फाइलों के आगे बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं. इन्हीं फाइलों में इनका भविष्य छिपा है. जब तक कागजी काम पूरा नहीं हो जाता, तब तक यह पता नहीं है कि उनका यहां रहना तय है या नहीं. तब तक वे किसी प्रकार की नौकरी भी नहीं खोज सकते. उन्हें केवल इंतजार ही करना है और जिस गति से काम हो रहा है, लगता है कि यह इंतजार काफी लंबा हो सकता है.

एक स्थानीय अखबार न्यूरेमबेर्गर नाखरिष्टन ने शरणार्थियों एवं आप्रवसियों के लिये बनी संघीय एजेंसी बीएमएमएफ के एक दस्तावेज के हवाले से यह सूचना जारी की है. अखबार के अनुसार साल की शुरुआत में जिस गति से काम चल रहा था, अब वैसा नहीं है. पहले जहां हर महीने 50,000 फाइलें आगे बढ़ती थीं, वहीं अब महज 15,000 से 18,000 ही आगे बढ़ रही हैं. जनवरी में जहां अधिकारी एक अर्जी को एक से डेढ़ हफ्ते में प्रोसेस कर पा रहे थे, वहीं अब उन्हें ऐसा करने में दो महीने तक का समय लग रहा है. 

अब तक 2015 की भी कई फाइलें अटकी हुई हैं. सितंबर के अंत तक 52,000 फाइलें ऐसी थीं, जिन पर अभी काम होना बाकी है. अधिकारियों ने पहले कहा था कि वे 2016 तक की सभी फाइलों को मई 2017 तक आगे बढ़ा देंगे. लेकिन वे लक्ष्य से काफी पीछे चल रहे हैं. इस देरी की एक वजह बीएमएएफ के पास लोगों की कमी को बताया जा रहा है. संघीय एजेंसी ने फाइलों का काम पूरा करने के लिए 10,000 लोगों को नियुक्त किया था लेकिन इन सब को अस्थाई कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया था, अब इनकी संख्या घट कर 7,800 ही रह गयी है.

इसके अलावा शरणार्थियों को जर्मन भाषा सिखाना भी अधिकारियों के लिए मुश्किल साबित हो रहा है. सितंबर में जहां 56,000 लोगों को भाषा के कोर्स में भर्ती करना था, वहां आधे यानि 28,000 लोगों को ही भर्ती किया जा सका. आवेदन भरने के बाद औसतन छह महीने कोर्स के शुरू होने का इंतजार करना पड़ता है. आंकड़े बताते हैं कि सितंबर के अंत में कोर्स पूरा करने वालों में केवल 3,000 ही जर्मन भाषा में निपुण थे, अन्य 3,000 टेस्ट में पास नहीं हो पाये. इसके अलावा आधे लोग तो टेस्ट में बैठने के लिए ही योग्य नहीं थे क्योंकि वे नियमित रूप से क्लास में ही नहीं आए थे.

एलेक्जेंडर पियर्सन/आईबी

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