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दुनिया

इराक की मौत छोड़कर आए लोगों को सीरिया में मिली दूसरी मौत

ये लोग आठ दिन तक रात में गुपचुप तरीके से पैदल अपना सफर तय करते रहे. एक ऐसा सफर जो खतरों से खाली नहीं था. लेकिन बेहतर जिंदगी की आस में उनका ये सफर उन्हें उत्तरी सीरिया के अलेपो में ले आया.

आगे खाई तो पीछे कुआं. ये बात सीरिया के उन कुछ परिवारों पर सटीक बैठती है जो चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट के कब्जे वाले शहर रक्का से तो बच निकले, लेकिन मौत के मंडराते सायों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. ये लोग आठ दिन तक रात में चुपगुप तरीके से पैदल अपना सफर तय करते रहे. एक ऐसा सफर जो खतरों से खाली नहीं था. लेकिन बेहतर जिंदगी की आस में उनका ये सफर उन्हें उत्तरी सीरिया के अलेपो में ले आया जहां जारी युद्ध ने उनका जीना मुश्किल कर दिया है.

उम मोहम्मद एक कमरे के कोने में बैठी हैं. वो मुट्ठी बंद करती हैं तो उनके दोस्त करीब आ जाते हैं. अबु यासिर सिगरेट का धुआं बाहर छोड़ते हैं. बच्चे खाने की मेज के आसपास बैठे हैं. मेज पर रोटी का बड़ा सा टुकड़ा और कुछ आलू रखे हैं.

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उम मोहम्मद कहती हैं, "ये सफर मौत के मुंह से मौत के मुंह में आ जाने का. आईएस के शासन में रहना भी मरने जैसा है और यहां अलेपो में रहना भी. मौत से बचने की कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन आईएस के हाथों मरने का मतलब है कई बार मरने के लिए तैयार रहना." रक्का से मिलने वाली खबरों में कहा गया है कि इस्लामिक स्टेट आम लोगों को भूखा मारने की नीति पर चल रहा है. वो इस तरह लोगों को आईएस के प्रति वफादार बनने के लिए मजबूर कर रहे हैं.

इस बारे में उम मोहम्मद का कहना है, "ऐसे तो हम नहीं रह सकते. वो हर चीज पर टैक्स लगाते थे. हमारा गुजारा तो वेतन से होता था जो मुझे प्रशिक्षण मंत्रालय से मिलता था. लेकिन उन्होंने सरकार के नियंत्रण वाले इलाकों में हमारा जाना बंद कर दिया जिससे मुझे वेतन छोड़ना पड़ा. वो लोगों को भूखा रखते हैं ताकि वे हार कर उनकी वफादारी कबूल कर लें लेकिन हमने ऐसा नहीं किया."

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तो फिर आम लोग कैसे गुजर बसर कर रहे हैं, इस बारे में अबु यासिर कहते हैं, "कुछ लोग वहां से निकलने के लिए अपना सब कुछ कुरबान कर रहे हैं. कुछ लोगों के पास इतना पैसा नहीं है कि वहां से निकल सकें या फिर कुछ लोग अस्थायी तौर पर तुर्की में रह रहे हैं. रक्का में जितने भी लोग रह रहे हैं, वे मदद पर जीवित हैं जो उन्हें वहां से जा चुके रिश्तेदारों की तरफ से मिल रही है."

वहां रह रहे लोगों की मुश्किलों पर उम मोहम्मद कहती हैं, "वे (आईएस वाले) आम लोगों से नफरत करते हैं और वो जानते हैं कि हम भी उनसे नफरत करते हैं. वो चाहते हैं कि हम घर से निकल कर उनके साथ हो जाएं और बंदूक उठा लें."

वो कहती हैं, "रक्का से अलेपो पहुंचने में बस से दो घंटे लगा करते थे. लेकिन हमें यहां पहुंचने में आठ दिन लगे. फिर हमें दो दिन एक स्थानीय स्कूल में छिपकर रहना पड़ा ताकि सरकार के नियंत्रण वाले इलाके अलेपो में दाखिल हो सकें." ऐसे सफर में ये भी ध्यान रखना होता है कि आपको खांसी न हो. उम मोहम्मद के मुताबिक, "स्मगलर हमें तीन से चार किलोमीटर पैदल ले जाते हैं. फिर दूसरी तरफ से एक कार आती है जो हमें हमारी मंजिल तक ले जाती है."

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रात में सफर करना भी आसान नहीं था, क्योंकि लड़ाकू विमान अंधेरे में आसपास के गावों पर बमबारी करते हैं. उम बताती हैं, "हम एक साथ जमीन पर लेट जाते थे, कुछ महसूस नहीं होता था. हमारा खून बह रहा होता था लेकिन पता नहीं चलता था कि दर्द कहां पर हो रहा है."

नम आंखों के साथ उम मोहम्मद और अब यासिर अपनी बात खत्म करते हुए कहते हैं, "इस सफर में हमने जो कुछ झेला, उसकी तुलना हम यहां अपने प्रति राष्ट्रपति असद के फौजियों के बर्ताव से करते हैं तो लगता है कि वो तो कुछ भी नहीं था. वो हमें नफरत भी निगाहों से देखते हैं, ये मानसिक और शारीरिक दोनों ही तरह से अपमान है."

रक्का से जो लोग भाग कर दूसरी जगहों पर जाते हैं, उन्हें धोखेबाज और गद्दार माना जाता है. इस्लामिक स्टेट राष्ट्रपति असद और उनकी सेना की नजर में आतकंवादी संगठन है, ऐसे में उसके नियंत्रण वाले इलाके से भागने वाले लोगों को अकसर किसी भी कारण से गिरफ्तार कर लिया जाता है या उन्हें ब्लैकमेल किया जाता है. आम लोग भी उनके साथ कई बार अच्छा बर्ताव नहीं करते हैं. ऐसे में, इन लोगों के लिए जिंदगी मुश्किल ही है, भले ही वो कहीं भी रहें.

एके/वीके (डीपीए)

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