नगालैंड में उग्र प्रदर्शन और आगजनी | दुनिया | DW | 03.02.2017
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दुनिया

नगालैंड में उग्र प्रदर्शन और आगजनी

कई सरकारी इमारतें फूंकी जा चुकी हैं. बड़े शहरों में कर्फ्यू लगा है. पूर्वोत्तर भारत का राज्य नगालैंड आरक्षण की आग में झुलस रहा है.

नगालैंड सरकार ने स्थानीय निकाय के चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें रिजर्व करने का एलान किया. दिसंबर 2016 में किये गये इस फैसले के बाद नगालैंड में प्रदर्शन शुरू हो गए. प्रदर्शनकारियों ने पहले नगालैंड के सबसे बड़े शहर दीमापुर में बंद का एलान किया. वहां प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें भी हुई, जिसमें दो लोग मारे गये. इसके बाद प्रदर्शन और हिंसक हो गये. गुरुवार को बड़ी संख्या में जमा हुए लोगों ने राजधानी कोहिमा में कई सरकारी इमारतों को आग लगा दी. हिंसक प्रदर्शनों के देखते हुए दीमापुर और कोहिमा में कर्फ्यू लगा दिया गया है.

नगालैंड पुलिस के डीजी एलएल डोंगल के मुताबिक, "लोग मृतकों के अंतिम संस्कार और उनके लिए शोक जताने जमा हुए थे, तभी वे प्रदर्शन करने लगे. प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़कर 10 से 15,000 हो गई और वे उत्पात मचाने लगे. वे फौरन मुख्यमंत्री टीआर जेलिंग का इस्तीफा मांगने लगे और बाद में स्थानीय निकाय की इमारत में तोड़फोड़ हुई और आग लगा दी गई."

Indien Ausschreitungen & Gewalt, Protest gegen Wahlreservierungen für Frauen (picture-alliance/NurPhoto/C. Mao)

डिमापुर में भी स्थिति तनावपूर्ण

पुलिस कंट्रोल रूम में तैनात अधिकारियों के मुताबिक कई सरकारी इमारतों की सुरक्षा के लिए पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों को तैनात किया गया है. लेकिन इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों ने कई कारों को आग लगा दी. राज्य के मुख्यमंत्री टीआर जेलिंग के रिश्तेदार के घर पर भी हमला किया गया. जेलिंग का कहना है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करवाया है. राज्य में एक फरवरी को स्थानीय निकाय के चुनाव होने थे. लेकिन हिंसा के चलते चुनाव टाल दिये गये हैं. 

नगालैड में एक दर्जन से ज्यादा स्थानीय नागा जनजातियां हैं. इनमें से ज्यादातर जनजातियां स्थानीय चुनावों का विरोध कर रही हैं. उनका कहना है कि 33 फीसदी आरक्षण से नागाओं की पंरपरा खतरे में पड़ेगी. नागाओं के मुताबिक उनकी परंपराओं और स्थानीय रिवाज को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371(ए) के तरह सरंक्षण मिला है.

स्थानीय लोगों का आरोप है कि ऐसे आरक्षण का फायदा नगालैंड में बसे बांग्लादेशी मुसलमानों को मिलेगा. राज्य के कुछ इलाकों में नागाओं से ज्यादा मुस्लिम आबादी है. स्थानीय कबीलों को लगता है कि ऐसी जगहों से जीतने वाले मुसलमान उम्मीद्वार नागाओं के रिवाजों में खलल डालेंगे. राज्य में पहले से ही मुस्लिम समुदाय और नागाओं के बीच संबंध बहुत अच्छे नहीं हैं.

स्थानीय अखबार के संपादकीय के मुताबिक विरोध सीधे तौर पर आरक्षण के खिलाफ नहीं है. असल में प्रदर्शनकारियों को लगता है कि राज्य सरकार ने अपना वादा पूरा नहीं किया. राज्य सरकार ने वादा किया था कि वह चुनावों को दो महीने आगे खिसकाएगी. इस दौरान सरकार, महिलाओं के संगठन और नागा संगठनों से बातचीत कर जरूरी फैसला लेगी.

ओएसजे/एमजे (एएफपी, एपी)

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