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दुनिया

सौ साल पुरानी पुलिस सुधारों की बहस

भारत की पुलिस 155 साल पुराने पुलिस अधिनियम के तहत ही काम कर रही है. आजादी के बावजूद किसी ने 1861 के पुलिस अधिनियम में बदलाव की जरूरत नहीं समझी.

देश में पुलिस सुधारों पर बहस बहुत पुरानी है. वर्ष 1902-03 में ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय पुलिस आयोग ने इस दिशा में पहला प्रयास किया था. उसके बाद इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर छह और राज्य स्तर पर पांच आयोगों का गठन किया जा चुका है. लेकिन उन सबकी सिफारिशें फाइलों में धूल फांक रही हैं. इसके पक्ष में आवाज तो तमाम राजनीतिक दल उठाते हैं. लेकिन जब इससे संबंधित सिफारिशों पर अमल करने की बात आती है तो सब बगलें झांकने लगते हैं. वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद पुलिस सुधार की सिफारिशों के लिए धरमवीर की अध्यक्षता में 15 नवंबर, 77 को राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन किया गया था. आयोग ने चार साल बाद अपनी रिपोर्ट देने की शुरूआत की. मई,1981 तक इसने कुल आठ रिपोर्ट्स दीं. लेकिन उससे पहले वर्ष 1980 में ही जनता पार्टी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई. उसके बाद आयोग पर ही संकट के बादल मंडराने लगे.

पुरानी है बहस

आयोग की रिपोर्ट में हर राज्य में एक प्रदेश सुरक्षा आयोग का गठन करने, उसके जांच कार्यों को शांति व्यवस्था संबंधी कामकाज से अलग करने और पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के लिए एक खास प्रक्रिया अपनाने की सिफारिश की गई थी ताकि इस पद पर योग्यतम उम्मीदवार का चयन किया जा सके. उसने पुलिस प्रमुख का कार्यकाल तय करने और एक नया पुलिस अधिनियम लागू करने का भी सुझाव दिया था. लेकिन इनमें से ज्यादातर सिफारिशों को ठंढे बस्ते में डाल दिया गया. दरअसल, सत्ता में आने वाली हर सरकार पुलिस के पुराने ढांचे को बनाए रखना चाहती थी कि ताकि वह इस सुरक्षा बल का मनमाने तरीके से इस्तेमाल कर सके. हालांकि उसके बाद भी इसी काम के लिए कई समितियों का गठन किया गया.

वर्ष 1997 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त ने तमाम राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासकों को एक पत्र लिख कर पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए कुछ सिफारिशें भेजी थी लेकिन उनकी उपेक्षा कर दी गई. उसके बाद महाराष्ट्र के पुलिस अधिकारी जे.एफ. रिबैरो की अध्यक्षता में एक अन्य समिति का गठन किया गया. उसने भी अगले साल मार्च में अपनी रिपोर्ट सौंप दी. लेकिन उसकी सिफारिशें भी फाइलों में पड़ी धूल फांक रही है. उसके बाद गठित पद्मनाभैया समिति ने भी केंद्र सरकारों को सुधारों की लंबी सूची सौंपी थी. लेकिन नतीजा जस का तस ही रहा.

देश में इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादातियों की जांच के लिए गठित शाह आयोग ने भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति से बचने के लिए पुलिस को राजनैतिक प्रभाव से मुक्त करने की बात कही थी. राज्य स्तर पर गठित कई पुलिस आयोगों ने भी पुलिस को बाहरी दबावों से बचाने की सिफारिशें की थीं.

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

उत्तर प्रदेश व असम में पुलिस प्रमुख और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के महानिदेशक रहे प्रकाश सिंह ने वर्ष 1996 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर अपील की थी कि तमाम राज्यों को राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों को लागू करने का निर्देश दिया जाए. इस याचिका पर एक दशक तक चली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कई आयोगों की सिफारिशों का अध्ययन कर आखिर में 22 सितंबर, 2006 को पुलिस सुधारों पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में राज्यों के लिए छह और केंद्र के लिए एक दिशानिर्देश जारी किए.

इनमें पुलिस पर राज्य सरकार का प्रभाव कम करने के लिए राज्य सुरक्षा आयोग का गठन करने, पुलिस महानिदेशक, आईजी और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों का न्यूनतम कार्यकाल दो साल तय करने, जांच और कानून व्यवस्था की बहाली का जिम्मा अलग-अलग पुलिस इकाइयों को सौंपने, सेवा संबंधी तमाम मामलों पर फैसले के लिए एक पुलिस इस्टैब्लिस्टमेंट बोर्ड का गठन करने और पुलिस अफसरों के खिलाफ शिकायतों की जांच के लिए पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन करने जैसे दिशानिर्देश शामिल थे. अदालत ने केंद्र सरकार को केंद्रीय पुलिस बलों में नियुक्तियों और कर्मचारियों के लिए बनने वाली कल्याण योजनाओं की निगरानी के लिए एक राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के गठन का भी निर्देश दिया था. लेकिन अब तक इसका गठन नहीं हो सका है.

फाइलों में रहा दिशानिर्देश

विडंबना यह है कि किसी भी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तवज्जो नहीं दी. दरअसल, राजनीतिक दलों के आकाओं को लगा कि इन दिशानिर्देशों पर अमल करने के बाद पुलिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा. लेकिन अदालत के आदेश का पालन करने के लिए कई राज्य सरकारों ने वैकल्पिक रास्ता अपनाते हुए अपने-अपने पुलिस अधिनियम बना लिए. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि उसके निर्देश उसी समय तक लागू रहेंगे जब तक सरकारें अपना अलग कानून नहीं बना लेती. सरकारों ने इसी प्रावधान का फायदा उठाया.

इसी तरह सुरक्षा आयोग का गठन करते समय अदालती आदेश को ठेंगा दिखाते हुए राजनीतिक दलों ने अपने लोगों को इसका सदस्य बना दिया. तमाम राज्यों में पुलिस प्रमुख का चयन भी सत्तारुढ़ राजनीतिक पार्टी की मर्जी के आधार पर होता है. सोली सोराबजी समिति ने वर्ष 2006 में पुलिस अधिनियम का प्रारूप तैयार किया था. लेकिन केंद्र या राज्य सरकारों ने उस पर कोई ध्यान ही नहीं दिया है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि देश के बदले हालात और चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए पुलिस अधिनियम में बदलाव बेहद जरूरी है. इसके साथ ही पुलिस के निरंकुश रवैये पर अंकुश लगाने के लिए भी एक तंत्र की स्थापना की जानी चाहिए. आज हालत यह है कि ग्रामीण इलाकों में तो दूर शहरों में भी लोग पुलिस के पास शिकायत लेकर जाने में डरते हैं. उसकी इस छवि में बदलाव जरूरी है. देश में पुलिस बल में लोगों की भी भारी कमी है. 732 लोगों पर एक पुलिस वाले का होना तस्वीर की दयनीयता बखान करता है. संयुक्त राष्ट्र ने हर साढ़े चार सौ व्यक्ति पर एक पुलिसकर्मी होने की सिफारिश की थी. अपने सियासी फायदे के लिए पुलिस को इस्तेमाल करने के मामले में मामले में तमाम राजनीतिक दलों का रवैया समान है. ऐसे में भारत में पुलिस सुधार अभी दूर की कौड़ी ही लगती है.

रिपोर्टःप्रभाकर

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