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दुनिया

100 साल पुरानी घोषणा पर ब्रिटेन से भिड़े फलीस्तीनी

फलीस्तीनी नेताओं का कहना है कि ब्रिटेन ने 1917 की उस घोषणा के लिए माफी मांगने से इनकार दिया है जिससे इस्राएल की स्थापना का रास्ता तैयार हुआ. फलस्तीनी नेता अब यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय अदालत में ले जाने की बात कर रहे हैं.

फलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए अपने संबोधन में ब्रिटेन से माफी मांगने को कहा था. लेकिन ब्रिटेन इस्राएल के साथ मिल कर 2 नवंबर को बेलफोर डिकलेरेशन की 100वीं वर्षगाठ मनाने की तैयारी कर रहा है.

ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने इस्राएली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतान्याहू को बेलफोर डिकलेरेशन समारोह में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया है. घोषणा की 100वीं वर्षगांठ के मौके पर इस्राएल में भी इस साल कई कार्यक्रम हो रहे हैं.

ब्रिटेन में फलस्तीनी राजदूत मैनुएल हसनेन ने वॉइस ऑफ पेलेस्टाइन रेडियो से बातचीत में कहा, "फलीस्तीनी विदेश मंत्रालय को लिखित जबाव आया है कि माफी से इनकार किया गया है." उन्होंने कहा, "इसका मतलब है कि महारानी और ब्रिटेन की सरकार फलीस्तीनी लोगों से माफी नहीं मांगेंगे और बेलफोर वादे की 100वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम निर्धारित सयम पर होंगे."

ब्रिटिश विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी इस बात की पुष्टि की है कि माफी नहीं मांगी जाएगी. उन्होंने बेलफोर घोषणा को एक "ऐतिहासिक बयान" बताया. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटेन इस्राएली-फलीस्तीनी शांति समझौते के लिए प्रयास करता रहेगा.

1917 की घोषणा में ब्रिटेन की सरकार ने कहा था कि वह "फलीस्तीन में यहूदियों के लिए राष्ट्रीय आवास की स्थापना को हमदर्दी के साथ देखती है." इसमें यह भी कहा गया कि "ऐसा कुछ भी न किया जाए जिससे वहां रहने वाले गैर यहूदी समुदाय के नागरिक और धार्मिक अधिकारों को नुकसान पहुंचे."

फलीस्तीन उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन था जब ब्रिटेन के विदेश मंत्री आर्थर बेलफोर ने ब्रिटिश यहूदी समुदाय के नेता लॉर्ड रॉथशील्ड को लिखे पत्र में यह नीतिगत बयान दिया.

फलीस्तीनी लोग इस दस्तावेज की निंदा करते हैं. उनके मुताबिक ब्रिटेन ने जमीन उन्हें सौंपने का जो वादा किया था, उसे पूरा नहीं किया.

हसनेन कहते हैं कि जब तक ब्रिटेन माफी नहीं मांगेगा, 100वीं वर्षगांठ के कार्यक्रमों को रद्द नहीं करेगा और फीलस्तीन को मान्यता नहीं देगा, तब तक फलीस्तीनी इस मामले को अदालत तक ले जाने से पीछे नहीं हटेंगे.

इस्राएल ने 1948 में ब्रिटिश शासन खत्म होने के बाद आजादी का एलान किया. इससे पहले 1947 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक योजना पारित कर दी गई जिसके मुताबिक फलीस्तीन को दो हिस्सों में बांटा जाएगा. एक यहूदी राष्ट्र और दूसरा अरब राष्ट्र. फलीस्तीनी प्रतिनिधियों ने इस योजना को खारिज कर दिया था.

इस्राएल ने 1967 के मध्य पूर्व युद्ध में पश्चिमी तट और पूर्वी येरुशलम पर कब्जा कर लिया. गजा पर भी उसका कब्जा हो गया था, लेकिन वह अभी फलीस्तीनी कट्टरपंथी संगठन हमास के नियंत्रण में है. फलीस्तीनी लोग इन इलाकों को मिलाकर एक फलीस्तीनी राष्ट्र बनाना चाहते हैं. इस्राएल और फलीस्तीन के बीच शांति वार्ता 2014 से बंद पड़ी है.

एके/ओएसजे (रॉयटर्स)

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