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दुनिया

स्विस दवा कंपनी को अदालती झटका

स्विट्जरलैंड की विशाल दवा कंपनी नोवार्टिस को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा झटका देते हुए कैंसर की उसकी दवा को पेटेंट देने से इनकार कर दिया. हालांकि कंपनी का कहना है कि वह भारत में रिसर्च जारी रखेगी और फिर पेटेंट की कोशिश करेगी.

हालांकि नोवार्टिस ने कहा है कि भविष्य में वह भारत में निवेश करते वक्त ज्यादा सावधानी बरतेगी. वह कैंसर की ग्लिवेक नाम की दवा को पेटेंट कराना चाहती थी, जिसे भारत की सुप्रीम कोर्ट ने नामंजूर कर दिया. भारत की कुछ कंपनियां इस दवा को बना रही हैं, जिसकी कीमत ग्लिवेक से दसगुनी कम है.

अदालत के इस फैसले से जहां फाइजर और रोशे जैसी विदेशी दवा कंपनियों के लिए घाटे का सौदा हो सकता है, वहीं भारतीय कंपनी सिपला के लिए यह बहुत अच्छा साबित हो सकता है. स्वास्थ्य व्यवस्था विश्लेषक दीपक मलिक का कहना है, "बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में कारोबार के लिए नए रास्ते तलाशने होंगे." उन्होंने सुझाव दिया कि विदेशी कंपनियों को भारतीय कंपनियों के साथ मिल कर काम करना एक अच्छा रास्ता हो सकता है.

नोवार्टिस ने फैसले पर निराशा जताते हुए कहा कि इससे साबित होता है कि भारतीय कानून "बौद्धिक संपत्ति सुरक्षा के लिए सीमित" जगह देता है. भारत के स्वास्थ्य सुधार कार्यकर्ताओं की सरकार से अपील रही है कि देश में सस्ती दवाइयां उपलब्ध हों क्योंकि सवा अरब की आबादी वाले देश में 40 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं और वे बड़ी कंपनियों की दवा खरीदने की हालत में नहीं होते. भारत में सिर्फ 10 फीसदी पेटेंट वाली दवा बिकती है और बाकी जेनेरिक दवाइयां होती हैं.

दसगुनी महंगी

स्विस कंपनी का कहना है कि भारत में करीब 16000 मरीज ग्विवेक दवा का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें से ज्यादातर को यह मुफ्त मिलती है. भारतीय मेडिकल उद्योग की रिपोर्टों के मुताबिक यही दवा जेनेरिक नाम से करीब तीन लाख मरीज इस्तेमाल कर रहे हैं.

भारतीय दवा कंपनी नाटको फार्मा के महासचिव एम आदिनारायण का कहना है, "यह मरीजों और सरकार दोनों की जीत है." फैसले के बाद जहां नोवार्टिस के शेयर 6.8 फीसदी तक गिर गए, वहीं भारतीय कंपनी नाटको के शेयर 11 प्रतिशत और सिपला के ढाई प्रतिशत तक ऊपर चढ़े.

भारत का घरेलू दवा बाजार दुनिया का 14वां सबसे बड़ा दवा बाजार है. लेकिन यह हर साल 13-14 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. दुनिया की दूसरी सबसे ज्यादा आबादी वाले देश होने की वजह से भारत का बाजार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत मायने रखता है.

सचेत हों विदेशी कंपनियां

कानूनी जानकारों का कहना है कि हो सकता है कि इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय कंपनी को थोड़े वक्त के लिए झटका लगे. कोलकाता के वकील एस मजूमदार का कहना है, "लेकिन उन्हें यह सीखना होगा और यह भी समझना होगा कि कानून के साथ कैसे रहा जा सकता है."

पिछले साल फाइजर की कैंसर वाली दवा सूटेंट और रोशे की हेपेटाइटिस सी की दवा पेगासिस भी पेटेंट की कानूनी जंग हार चुकी हैं. इन कंपनियों ने इसके खिलाफ अपील की है लेकिन नोवार्टिस पर हुए फैसले के बाद ऐसा होना मुमकिन नहीं दिखता.

इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को यह सोचना होगा कि भारतीय बाजार में दवा उतारने से पहले वे यह पक्का कर लें कि उनके पेटेंट को भारत में माना जाएगा या नहीं.

लंबी कानूनी लड़ाई

नोवार्टिस 2006 से ही भारत में इस दवा को भारत में पेटेंट कराना चाह रही थी. 2009 में इसने भारत के उस कानून के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसमें नई दिखने वाली लेकिन पुराने रसायनों वाली दवाइयों के पेटेंट का प्रावधान नहीं था. इसके बाद भारत ने ग्लिवेक को पेटेंट देने से मना कर दिया क्योंकि इसका कहना था कि यह कोई नई दवा नहीं, बल्कि पुरानी दवा में ही मामूली फेरबदल करके तैयार किया गया है. दवा में मामूली बदलाव करके पेटेंट कराने के तरीके को एवरग्रीनिंग कहते हैं.

हालांकि अमेरिका, रूस और चीन सहित दुनिया भर के 40 देशों ने ग्लिवेक को पेटेंट दे दिया है. स्विस कंपनी के पास अदालत के फैसले के खिलाफ अपील करने के लिए 90 दिन का वक्त है.

एजेए/एनआर (एएफपी, एपी, रॉयटर्स)

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